लोकतंत्र के कुएँ में झाँकते मेंढ़क
लोकतंत्र के कुएँ में झाँकते मेंढ़क रा जनीति बड़ी विचित्र वस्तु है। यहाँ आदमी चुनाव हारने के बाद भी अपने को व…
लोकतंत्र के कुएँ में झाँकते मेंढ़क रा जनीति बड़ी विचित्र वस्तु है। यहाँ आदमी चुनाव हारने के बाद भी अपने को व…
राजनीति का विचित्र मौसम आजकल राजनीति का बड़ा विचित्र मौसम चल रहा है। हर दल अपने-अपने खेत में विकास की ऐसी फसल…
कहा जाता है कि मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता स्वयं होता है, पर आधुनिक युग में यह वाक्य कुछ संशोधित हो गया है—…
कहा गया है कि कर्म मनुष्य के चरित्र का दर्पण होते हैं। यह बात सुनने में जितनी सरल लगती है, व्यवहार में उतनी ह…
धन्य हैं वे महानुभाव जिनकी दिव्य दृष्टि ने यह खोज निकाला है कि भारत में 'त्रेता युग' वापस आ गया है! औ…
जो स्वयं “लाल हिट” की शीशी लेकर समाज के हर कोने में छिड़काव करने निकले थे, आज वही अपने आँगन में पनपते “कॉकरोच…
हमारे लोकतंत्र में न्याय अब तुलसीदास के राम जैसा हो गया है—सबको दिखता है, पर मिलता बिरलों को है। कहते हैं कि …