जो स्वयं “लाल हिट” की शीशी लेकर समाज के हर कोने में छिड़काव करने निकले थे, आज वही अपने आँगन में पनपते “कॉकरोचों” को देखकर ऐसे चकित हैं, मानो दीवारों की दरारों में लोकतंत्र नहीं, तुलसी का पौधा उगना चाहिए था। और आश्चर्य भी कैसा—ये जीव साधारण नहीं हैं जनाब, ये तो दिन दूनी, रात चौगुनी गति से बढ़ते हुए राजनीतिक जीवविज्ञान का नया अध्याय लिख रहे हैं।
जनता बड़ी उदार है। उसे रोटी मिले न मिले, मनोरंजन नियमित चाहिए। सो सत्ता के रंगमंच पर नए-नए पात्र उतारे जा रहे हैं। कभी किसी ओवैसी को ऊँची मीनार पर चढ़ाकर तालियाँ बटोरी गईं, कभी किसी रावण को खड़ा कर दलित राजनीति का नया संस्करण लॉन्च किया गया। और जब मध्यमवर्ग ऊबने लगा तो “नायक” की एंट्री करवा दी गई—मानो लोकतंत्र नहीं, साप्ताहिक धारावाहिक चल रहा हो।
अब बारी युवाओं की है। पटकथा फिर बदल रही है। मंच वही है, अभिनेता नए हैं, संवाद पुराने हैं और दर्शक अब भी टिकट कटाकर बैठे हैं। कुर्सी की पेटी बाँध लीजिए, क्योंकि राजनीति अब विचारधारा से कम और मनोरंजन उद्योग से अधिक संचालित हो रही है।
राहुल गांधी के लिए खेल कठिन होगा या आसान—यह तो समय बताएगा, पर इतना तय है कि इस देश में राजनीति अब मुद्दों से नहीं, “ट्रेलर लॉन्च” से चलती है।
और जो अब भी नहीं समझे, वे चिंता न करें।
हमारे यहाँ समझ से अधिक महत्वपूर्ण है—उत्साहित बने रहना। 💀
आचार्य प्रताप