कर्मों का प्रेस कॉन्फ्रेंस

कहा गया है कि कर्म मनुष्य के चरित्र का दर्पण होते हैं। यह बात सुनने में जितनी सरल लगती है, व्यवहार में उतनी ही असुविधाजनक सिद्ध होती है। कारण यह कि शब्दों को सजाया जा सकता है, लेकिन कर्मों को मेकअप नहीं कराया जा सकता। शब्द मंच पर भाषण देते हैं, कर्म पीछे से माइक बंद करके सच्चाई सुना देते हैं।

आजकल चरित्र का सबसे बड़ा संकट यही है कि आदमी अपने कर्मों से कम और अपने परिचय-पत्र से अधिक पहचाना जाना चाहता है। वह चाहता है कि लोग उसके बारे में वही मानें जो वह कहता है, न कि जो वह करता है। जैसे कोई सज्जन प्रतिदिन सोशल मीडिया पर ईमानदारी के महत्व पर दस पोस्ट लिखें और बिजली का बिल पड़ोसी के मीटर से जोड़कर भरें। उनके शब्द और कर्म के बीच उतनी ही दूरी होती है जितनी चुनावी घोषणा और उसके क्रियान्वयन के बीच।

हमारे समाज में कर्म बेचारे बड़े उपेक्षित प्राणी हैं। शब्दों के पास चमकदार कपड़े हैं, कर्मों के पास केवल प्रमाण हैं। शब्द कहते हैं—"मैं समाज सेवा करता हूँ।" कर्म पूछते हैं—"कब?" शब्द कहते हैं—"मैं पर्यावरण प्रेमी हूँ।" कर्म बताते हैं कि साहब ने कल ही तीन पेड़ कटवाकर अपनी गाड़ी के लिए अतिरिक्त पार्किंग बनवाई है।

बघेली में कहावत है—"बोली मीठ, काम खीझ।" अर्थात बातों में गुड़ घोल देना आसान है, पर काम में मिठास लाना कठिन। आजकल तो कई लोग ऐसे मिल जाते हैं जिनकी वाणी में तुलसीदास और व्यवहार में टैक्स विभाग का नोटिस बसता है। वे सदाचार पर प्रवचन देते हुए इतने भावुक हो जाते हैं कि सुनने वाला प्रभावित हो जाए, पर जैसे ही कोई वास्तविक सहायता माँग ले, उनकी भावुकता मोबाइल की बैटरी की तरह अचानक समाप्त हो जाती है।

एक काल्पनिक प्रसंग याद आता है। एक नगर में "चरित्र सम्मान समारोह" आयोजित हुआ। शर्त थी कि सम्मान उसी व्यक्ति को मिलेगा जिसका चरित्र सर्वश्रेष्ठ हो। मंच पर एक-से-एक वक्ता आए। किसी ने अपने त्याग की कथा सुनाई, किसी ने अपने आदर्शों की। तभी किसी बुद्धिमान ने सुझाव दिया कि भाषणों की जगह उम्मीदवारों के कर्मों को बुलाया जाए।

बस फिर क्या था! कर्म एक-एक कर मंच पर आने लगे।

पहले सज्जन के कर्म बोले—"ये महाशय प्रतिदिन सत्य की बात करते हैं, लेकिन तराजू में आधा किलो को चार सौ पचास ग्राम मानते हैं।"

दूसरे के कर्म बोले—"इन्होंने नारी सम्मान पर पाँच सेमिनार किए हैं, पर घर में चाय देर से मिलने पर लोकतंत्र समाप्त कर देते हैं।"

तीसरे के कर्म बोले—"ये स्वच्छता अभियान के ब्रांड एम्बेसडर हैं और गाड़ी की खिड़की से प्लास्टिक की बोतल फेंकने के राष्ट्रीय रिकॉर्डधारी भी।"

सभा में सन्नाटा छा गया। शब्द बेचारे कोने में खड़े थे और कर्म मंच पर पत्रकारों की तरह प्रश्न पूछ रहे थे।

तभी एक वृद्ध किसान आया। उसने कोई भाषण नहीं दिया। बस उसके कर्म पीछे-पीछे चले आए। उन्होंने बताया कि यह व्यक्ति बिना शोर किए वर्षों से जरूरतमंदों की सहायता करता रहा है, खेत में मेहनत करता है, किसी का हक नहीं मारता और किसी के सामने अपने सद्गुणों का विज्ञापन भी नहीं करता। सभा ने उसी को सम्मानित किया। क्योंकि कर्मों की अदालत में प्रचार नहीं, प्रमाण चलते हैं।

वास्तव में मनुष्य का चरित्र किसी भाषण का विषय नहीं, जीवन का परिणाम होता है। शब्द फूल हो सकते हैं, लेकिन कर्म फल होते हैं। फूलों की सुगंध कुछ समय रहती है, फल का स्वाद देर तक याद रहता है। इसलिए जो लोग अपने व्यक्तित्व की चमक बढ़ाने में लगे हैं, उन्हें कभी-कभी अपने कर्मों का आईना भी साफ कर लेना चाहिए।

आखिरकार संसार हमारे कथनों का नहीं, हमारे कार्यों का हिसाब रखता है। शब्द परिचय देते हैं, पर पहचान कर्म ही बनाते हैं। और जब इतिहास किसी मनुष्य का मूल्यांकन करता है, तब वह उसके भाषणों की फाइल नहीं खोलता, उसके कर्मों की डायरी पढ़ता है।

इसलिए यदि चरित्र को सचमुच सुंदर बनाना है, तो शब्दों के रंग-रोगन से अधिक कर्मों की सफाई पर ध्यान देना होगा। क्योंकि दर्पण को धोखा दिया जा सकता है, प्रतिबिंब को नहीं।

आचार्य प्रताप

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Achary Pratap

समालोचक , संपादक तथा पत्रकार प्रबंध निदेशक अक्षरवाणी साप्ताहिक संस्कृत समाचार पत्र

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