जैसा बोओगे, वैसा काटोगे : कर्मों की खेती और परिणामों का मौसम


कहा जाता है कि मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता स्वयं होता है, पर आधुनिक युग में यह वाक्य कुछ संशोधित हो गया है—"मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता कम और अपनी सफाई का प्रवक्ता अधिक होता है।" जब सफलता मिलती है तो कहते हैं, "देखा, मेरी मेहनत रंग लाई!" और जब असफलता मिलती है तो ग्रह-नक्षत्र, पड़ोसी, सरकार, मौसम, इंटरनेट की स्पीड—सब कटघरे में खड़े कर दिए जाते हैं।
"जैसा बोओगे, वैसा काटोगे" कहावत कर्मफल के सिद्धांत को बड़ी सहजता से समझाती है। किसान यदि खेत में गेहूँ बोएगा तो धान की उम्मीद नहीं करेगा। पर मनुष्य बड़ा आशावादी प्राणी है। वह आलस्य बोता है और सफलता काटना चाहता है। वह कटुता बोता है और सम्मान की फसल की प्रतीक्षा करता है। वह झूठ के बीज डालता है और विश्वास का वृक्ष उगने की आशा रखता है।

आज समाज में कर्मों की खेती का बड़ा विचित्र चलन है। नेता वादों के बीज बोते हैं और चुनाव के बाद भूल जाने की फसल काटते हैं। अधिकारी फाइलों को धूप दिखाते हैं और फिर विकास की रिपोर्ट तैयार कर देते हैं। विद्यार्थी पूरे वर्ष मोबाइल पर अंगूठा चलाते हैं और परीक्षा के समय सरस्वती माता से विशेष कृपा की याचना करते हैं। बघेली में कहें तो, "जऊन खेत मा हलै न चलाय, उहैं भरपूर उपज के सपना देखत हैं।"

एक सज्जन से मेरी भेंट हुई। उन्होंने जीवन भर पड़ोसियों से झगड़ा किया, रिश्तेदारों को अपमानित किया और मित्रों को आवश्यकता पड़ने पर केवल "व्यस्त हूँ" का संदेश भेजा। अब वृद्धावस्था में शिकायत करते हैं कि कोई उनका हालचाल नहीं पूछता। मैंने कहा, "भैया, आपने जो बबूल बोया था, अब आम की मिठास कहाँ से खोज रहे हैं?" वे बोले, "समाज बदल गया है।" अर्थात् अपने कर्मों का हिसाब भी समाज के खाते में डाल दिया गया।

सोशल मीडिया ने तो कर्मफल के सिद्धांत को और रोचक बना दिया है। लोग दिन भर कटाक्ष, अफवाह और नकारात्मकता फैलाते हैं, फिर शिकायत करते हैं कि वातावरण विषाक्त हो गया है। जैसे कोई व्यक्ति पूरे तालाब में कीचड़ घोल दे और फिर पूछे—"पानी इतना गंदा किसने किया?"

सच तो यह है कि कर्म कभी नष्ट नहीं होते। वे हमारे व्यक्तित्व, संबंधों और समाज में किसी न किसी रूप में लौटकर आते हैं। अच्छा व्यवहार सम्मान बनकर लौटता है, परिश्रम सफलता बनकर लौटता है और ईमानदारी विश्वास बनकर लौटती है। उसी प्रकार छल, आलस्य और अहंकार भी ब्याज सहित वापस आते हैं।

जीवन एक विशाल खेत है। प्रत्येक विचार एक बीज है, प्रत्येक शब्द एक पौधा और प्रत्येक कर्म उसकी सिंचाई। इसलिए बोते समय सावधानी आवश्यक है। क्योंकि प्रकृति का लेखा-जोखा बड़ा सटीक होता है; वहाँ न कोई सिफारिश चलती है, न कोई पुनर्मूल्यांकन।

अंततः प्रश्न यह नहीं है कि हमें क्या मिला, बल्कि यह है कि हमने क्या बोया। यदि हम चाहते हैं कि समाज में विश्वास, प्रेम और सद्भाव की फसल लहलहाए, तो उसके बीज भी हमें ही बोने होंगे। अन्यथा बबूल बोकर आम की आशा करना वैसा ही है जैसे बिना पढ़े प्रथम श्रेणी की उम्मीद करना—आशा तो की जा सकती है, पर परिणाम प्रायः हँसकर अपना निर्णय सुना देता है।

कर्मों की धरती कभी पक्षपात नहीं करती; वह वही लौटाती है जो हम उसमें डालते हैं। इसलिए बोने से पहले एक बार अवश्य सोचिए, क्योंकि फसल आने पर पछतावे की खाद भी परिणाम नहीं बदल पाती।
Achary Pratap

समालोचक , संपादक तथा पत्रकार प्रबंध निदेशक अक्षरवाणी साप्ताहिक संस्कृत समाचार पत्र

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