राजनीति का विचित्र मौसम

आजकल राजनीति का बड़ा विचित्र मौसम चल रहा है। हर दल अपने-अपने खेत में विकास की ऐसी फसल उगा रहा है कि लगता है मानो देश नहीं, प्रतियोगिता का कोई विशाल कृषि मेला चल रहा हो। कोई कहता है सड़क मैंने बनाई, कोई कहता है बिजली मैं लाया, कोई दावा करता है कि सूरज भी मेरे कार्यकाल में थोड़ा अधिक चमका था।

अब मेरी समस्या यह है कि मेरे जीवन में जो कुछ भी वास्तविक और ठोस हुआ, उसका श्रेय न तो किसी सरकार ने माँगा और न मैंने दिया। बचपन में फीस भरनी थी तो पिता जी ने भरी, बीमार पड़ा तो माँ रातभर जागी, पढ़ाई करनी थी तो परिवार ने सहयोग किया। नौकरी मिली तो अपनी मेहनत और भाग्य के सहारे मिली। सरकारें आती रहीं, जाती रहीं, घोषणाएँ करती रहीं, पोस्टर बदलते रहे, नारे बदलते रहे; लेकिन सुबह उठकर रोटी कमाने का दायित्व वही पुराना रहा—अपना।

हाँ, इसका अर्थ यह नहीं कि मुझे दिखाई नहीं देता कि कौन क्या कर रहा है। आँखें अभी भी सरकारी विज्ञापन विभाग के हवाले नहीं हुई हैं। सड़क बने तो दिखती है, टूटे तो वह भी दिखती है। अस्पताल खुले तो खबर होती है, बंद पड़े हों तो उसकी भी सूचना रहती है। इसलिए किसी एक पक्ष को समस्त पुण्य और दूसरे को समस्त पाप सौंप देने का ठेका मैंने नहीं लिया है।

मुझे तो यह बड़ा अचरज होता है कि कुछ लोग अपने प्रिय नेता के प्रति ऐसी श्रद्धा रखते हैं जैसे संसार की समस्त उपलब्धियाँ उसी के व्यक्तिगत प्रयास से हुई हों। यदि बारिश हो जाए तो उसकी दूरदर्शिता, यदि धूप निकल आए तो उसकी नेतृत्व क्षमता, और यदि कुछ न हो तो विपक्ष की साजिश!

मैं इतना ही जानता हूँ कि लोकतंत्र में नागरिक का काम जयकारा लगाना नहीं, देखना और परखना है। जो अच्छा करे उसकी प्रशंसा हो, जो गलती करे उसकी आलोचना हो। लेकिन यह मान लेना कि इतिहास की पूरी गाड़ी एक ही व्यक्ति के इंजन से चल रही है, न इतिहास के साथ न्याय है और न बुद्धि के साथ।

इसलिए मैं किसी विशेष पक्ष का भक्त नहीं, दर्शक भी नहीं, बल्कि एक साधारण नागरिक हूँ। तालियाँ भी बजाऊँगा, सवाल भी पूछूँगा। क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ा अधिकार वोट देने का नहीं, सोचने का होता है।

आचार्य प्रताप

Achary Pratap

समालोचक , संपादक तथा पत्रकार प्रबंध निदेशक अक्षरवाणी साप्ताहिक संस्कृत समाचार पत्र

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