धन्य हैं वे महानुभाव जिनकी दिव्य दृष्टि ने यह खोज निकाला है कि भारत में 'त्रेता युग' वापस आ गया है! और वह भी कैसे? केवल जन्म-प्रमाण पत्र और मतदाता सूची में दर्ज नामों के सहारे। हम अज्ञानी खामखां विकास, रोजगार, शिक्षा और अस्पतालों के आंकड़ों में रामराज्य ढूंढ रहे थे, जबकि असली क्रांति तो नामकरण पंजिका में हो चुकी थी।
तर्क बड़ा ही अकाट्य और सुविधाजनक है। जब देश के मुखिया 'नरेंद्र' हों, राष्ट्रपति 'द्रौपदी' हों और राज्यों की कमान विष्णु, मोहन, भजन, आदित्य और पुष्कर जैसे नामों के हाथों में हो, तो युग को त्रेता होने से भला कौन रोक सकता है? इस अद्भुत लॉजिक के हिसाब से तो हमारे मोहल्ले का 'रामखेलावन' भी किसी महाकाव्य का नायक होना चाहिए, जो रोज सुबह दूध में बाल्टी भर पानी मिलाते हुए चुपचाप 'धर्म' की स्थापना कर रहा है।
“सत्ता जब कर्म के पन्ने कोरी छोड़ देती है, तब वह शब्दों के चमत्कार से युग बदलने का दावा करती है।” सचमुच, कितनी मासूमियत है इस विचार में कि इन नामों के सत्ता में बैठते ही 'असुरों' की नींद हराम हो गई है। भई, आजकल के असुर सींग लगाकर या भयानक अट्टहास करते हुए नहीं घूमते; वे तो सूट-बूट में एसी कमरों में बैठते हैं। महंगाई, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी रूपी दानव भी इन पवित्र नामों की सूची देखकर डरने के बजाय शायद मुस्कुरा ही रहे होंगे कि चलो, जनता का ध्यान नामों के जाप में तो लगा!
यह कितनी अद्भुत राजनीतिक उपलब्धि है न! यथार्थ के धरातल पर रामराज्य लाना कठिन था, पसीने छूट जाते, इसलिए 'नेमप्लेट' बदलकर ही काम चला लिया गया। तो आइए, इस नई व्यवस्था का मुदित मन से स्वागत करें। अब से सड़क के गड्ढों में गिरें, तो नगर निगम को न कोसें; बस सोचें कि त्रेता युग में मार्ग शायद ऐसे ही रोमांचक हुआ करते होंगे।
बस डर केवल एक ही बात का है... कल को अगर किसी बड़े घोटालेबाज का नाम 'हरिश्चंद्र' या 'युधिष्ठिर' निकल आया, तो हमें सत्य और धर्म की नई डिक्शनरी लिखनी पड़ेगी।
फिलहाल, आप केवल नामों की माला जपिए और मुग्ध रहिए; क्योंकि 'कर्मों' का युग अभी शायद 5G नेटवर्क पर डाउनलोड हो रहा है!
आचार्य प्रताप