अनुभव बाबू की गुमशुदगी और ट्राइबलपुर का न्याय विभाग

हमारे लोकतंत्र में न्याय अब तुलसीदास के राम जैसा हो गया है—सबको दिखता है, पर मिलता बिरलों को है।
कहते हैं कि “व्यवस्था सबको समान अवसर देती है”, पर यह वाक्य भी अब सरकारी दीवारों पर चिपके उस पोस्टर जैसा हो गया है, जिसे बरसात में केवल गोंद याद रहती है, शब्द बह जाते हैं।

इन दिनों “ट्राइबलपुर” नामक एक काल्पनिक जिले में बड़ा विचित्र तमाशा चल रहा है। वहाँ के अतिथि शिक्षक अपने “अनुभव” को ढूँढ़ रहे हैं।
अब आप सोचेंगे कि अनुभव कोई आदमी है क्या, जो खो गया?

अरे साहब! आजकल सरकारी दफ्तरों में अनुभव आदमी से ज्यादा संवेदनशील प्राणी है।
कभी फाइल में जीवित रहता है, कभी पोर्टल में मर जाता है।

ट्राइबलपुर के मास्टर लोग सुबह स्कूल में बच्चों को “समानता का अधिकार” पढ़ाते हैं और दोपहर बाद स्वयं शिक्षा विभाग के बरामदे में खड़े होकर पूछते हैं—
“महाराज, जब शिक्षा विभाग वाले गुरुजी का अनुभव मान्य है, तो हमार अनुभव कौन गटर में गिर गओ?”

इस प्रश्न पर अधिकारी लोग ऐसा मौन धारण कर लेते हैं, जैसे संसद में विपक्ष का माइक्रोफोन बंद हो गया हो।

डीपीआई बाबू कहते हैं—
“भाई, ट्राइबल विभाग से पूछो।”

ट्राइबल विभाग कहता है—
“हम क्या करें? नियम ऊपर से आया है।”

ऊपर कौन है?
यह आज तक कोई नहीं जान पाया।
सरकारी व्यवस्था में “ऊपर” एक ऐसा अदृश्य देवता है, जो हर गलती का पिता और हर समाधान का अनाथ होता है।

ट्राइबलपुर के अतिथि शिक्षक बेचारे वर्षों से पहाड़, जंगल, नदी, टूटी सड़क और आधी तनख्वाह के बीच बच्चों को पढ़ाते रहे।
बरसात में स्कूल पहुँचे तो कभी जूते भीग गए, कभी वेतन।
लेकिन सेवा जारी रही।
क्योंकि गुरुजी को बताया गया था कि “अनुभव अमूल्य होता है।”

अब पता चला कि अनुभव अमूल्य इसलिए था क्योंकि उसकी कोई कीमत ही नहीं लगनी थी।

सरकारी पोर्टल पर उनका नाम है, सेवा है, नियुक्ति है, उपस्थिति है, फोटो है, हस्ताक्षर है…
बस अनुभव के अंक नहीं हैं।

यानी आदमी पूरा है, केवल आत्मा निकाल ली गई है।

एक दिन ट्राइबलपुर के मास्टरों ने तय किया कि वे सामूहिक रूप से “अनुभव बाबू” की खोज करेंगे।
सब लोग शिक्षा भवन पहुँचे।

वहाँ एक लंबा गलियारा था, जिसमें फाइलें इस तरह रखी थीं जैसे इतिहास की लाशें कतार में सो रही हों।

एक बाबू पान दबाकर बोले—
“देखिए, आपका अनुभव तो सिस्टम में दिख रहा है।”

गुरुजी खुश हो गए—
“तो अंक मिल जइहैं?”

बाबू मुस्कुराए। वह मुस्कान वैसी थी जैसी चुनाव से पहले नेता मुस्कुराते हैं।

बोले—
“दिखना और मिलना, दोनों अलग-अलग प्रक्रिया हैं।”

यह सुनकर एक गुरुजी बेहोश होते-होते बचे।
उन्होंने धीरे से कहा—
“तब तो हमार शादी भी सरकारी प्रक्रिया निकली… बीवी दिखती है, पर सुख नहीं मिलता!”

पूरा कमरा हँसी से भर गया, लेकिन व्यवस्था का चेहरा वैसे ही गंभीर रहा।
व्यवस्था को हँसना पसंद नहीं।
हँसी सवाल पैदा करती है।

अब ट्राइबलपुर में नया खेल शुरू हुआ है—
“जिम्मेदारी पास करो।”

डीपीआई गेंद ट्राइबल विभाग के पाले में फेंकता है।
ट्राइबल विभाग उसे मंत्रालय की छत पर उछाल देता है।
मंत्रालय उसे नियमावली में दबा देता है।

और अतिथि शिक्षक?
वे अब भी बच्चों को पढ़ा रहे हैं कि “भारत एक लोकतांत्रिक गणराज्य है।”

सच पूछिए तो हमारे देश में सबसे ज्यादा सहनशील जीव अगर कोई है, तो वह अतिथि शिक्षक है।
न उसे स्थायित्व मिलता है, न सम्मान, न समय पर वेतन…
फिर भी हर सुबह वह बच्चों को भविष्य का पाठ पढ़ाने चला आता है।

सरकारें बदलती हैं, घोषणाएँ बदलती हैं, पोर्टल बदलते हैं, लेकिन अतिथि शिक्षक की दशा नहीं बदलती।
उसे हर बार यही कहा जाता है—
“आप शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ हैं।”

रीढ़ बेचारा सोचता है—
“जब हम ही रीढ़ हैं, तो कुर्सी पर बैठा कौन है?”

ट्राइबलपुर के एक बुजुर्ग मास्टर ने बड़ी मार्मिक बात कही—
“बाबू, हमका अनुभव के अंक नहीं चाहिए… बस इतना बता दो कि जंगल में पढ़ाना सेवा है कि सरकारी तपस्या?”

कमरे में फिर सन्नाटा छा गया।

दरअसल समस्या अंक की नहीं है।
समस्या उस मानसिकता की है, जहाँ व्यवस्था काम तो बराबर करवाती है, लेकिन अधिकार बाँटते समय जाति, विभाग, फाइल और सुविधा का तराजू निकाल लेती है।

एक ही प्रदेश।
एक ही पोर्टल।
एक ही नौकरी।
एक ही चाक और ब्लैकबोर्ड।
फिर भी एक शिक्षक का अनुभव “योग्यता” और दूसरे का “तकनीकी त्रुटि” बन जाता है।

वाह रे न्याय!

लगता है आने वाले समय में संविधान में नया अनुच्छेद जोड़ना पड़ेगा—
“सभी नागरिक समान हैं, किंतु कुछ विभाग अधिक समान हैं।”

और अंत में…

ट्राइबलपुर के अतिथि शिक्षक अब भी पढ़ा रहे हैं।
बच्चों को गणित में बराबरी का चिन्ह समझा रहे हैं— “=”

पर भीतर ही भीतर वे सोच रहे हैं कि
काश!
सरकारी व्यवस्था भी इस चिन्ह का अर्थ समझ पाती।

आचार्य प्रताप 
Achary Pratap

समालोचक , संपादक तथा पत्रकार प्रबंध निदेशक अक्षरवाणी साप्ताहिक संस्कृत समाचार पत्र

Enregistrer un commentaire

आपकी टिप्पणी से आपकी पसंद के अनुसार सामग्री प्रस्तुत करने में हमें सहयता मिलेगी। टिप्पणी में रचना के कथ्य, भाषा ,टंकण पर भी विचार व्यक्त कर सकते हैं

Plus récente Plus ancienne