राजनीति बड़ी विचित्र वस्तु है। यहाँ आदमी चुनाव हारने के बाद भी अपने को विजेता मानता है और जीतने वाला पाँच वर्ष बाद जनता को समझाता फिरता है कि वास्तव में वह हार गया था क्योंकि जनता ने उसका काम समझा ही नहीं। लोकतंत्र का यही सौंदर्य है कि यहाँ हर कोई अपने-अपने आईने में स्वयं को महात्मा और विरोधी को महापापी देखता है।
कुछ समय पहले नगर के एक वरिष्ठ राजनीतिक पुरोधा ने सामाजिक माध्यम पर ऐसा उपदेश प्रसारित किया मानो वे सीधे स्वर्ग की जनसंपर्क शाखा से नियुक्त होकर आए हों। मैंने भी विनम्रतापूर्वक अपनी बात रख दी। भाषा में नमक था, मिर्च नहीं। पर राजनीति में समस्या यही है कि लोग विचारों से नहीं, विचार रखने वालों से असहमत होते हैं। फलतः संवाद वहीं समाप्त हो गया जहाँ लोकतंत्र का आरंभ होना चाहिए था।
अब उस नगर की कथा सुनिए जहाँ विकास का इतिहास भी चुनाव चिह्नों के अनुसार लिखा जाता है।
नगर के एक पूर्व शासक थे। उनके समर्थकों का विश्वास था कि उनके आने से पहले नगर में सड़कें नहीं थीं, पेड़ नहीं थे, सूरज समय पर नहीं निकलता था और बरसात भी अनुमति लेकर होती थी। सच यह है कि उनके कार्यकाल में कुछ अच्छे काम हुए। सड़कें बनीं, कुछ सुविधाएँ बढ़ीं और जनता को लगा कि चलो, सरकार नाम की कोई चीज़ धरती पर भी मौजूद है।
लेकिन सत्ता की सबसे बड़ी बीमारी यह है कि वह आदमी को यह विश्वास दिला देती है कि जनता उसकी जेब में रखी रसीद है। धीरे-धीरे संवाद कम हुआ, समन्वय कम हुआ और जनता को याद आ गया कि लोकतंत्र में वोटर नाम का एक प्राणी भी होता है। परिणाम यह हुआ कि जनादेश ने दिशा बदल ली।
फिर दूसरे महाशय आए। जनता ने सोचा था कि अब परिवर्तन आएगा। परिवर्तन आया भी—लेकिन वैसा ही जैसा किसी पुराने मकान में नया ताला लगाने से आता है। घर वही रहता है, बस चाबी बदल जाती है। जिन सपनों की थैली लेकर जनता मतदान केंद्र तक गई थी, वे धीरे-धीरे हवा में ऐसे उड़ गए जैसे बरसात में कागज़ की नाव।
राजनीति का एक नियम है—जो जितना कम करता है, उसका विज्ञापन उतना बड़ा होता है। नगर में पोस्टर बढ़ते गए और उम्मीदें घटती गईं। जनता को लगा कि वह विकास नहीं, विकास के विज्ञापन का उद्घाटन देख रही है।
इसी बीच परिषद में एक ऐसे जनप्रतिनिधि उभरे जिन्होंने राजनीति को केवल चुनाव जीतने का साधन नहीं माना। यह बात अलग है कि राजनीति में अच्छे काम की चर्चा कम और अच्छे काम करने वाले की आलोचना अधिक होती है। उन्होंने पक्ष-विपक्ष के झगड़ों के बीच नगर के कामों को आगे बढ़ाने का प्रयास किया।
नगर चिकित्सालय का निर्माण हो, जलभराव की समस्या हो या सफाई व्यवस्था—इन विषयों पर उन्होंने कम से कम यह सिद्ध किया कि नगर परिषद केवल प्रस्ताव पारित करने की मशीन नहीं होती। आज बरसात में गलियाँ नदी बनने से बच जाती हैं तो यह किसी चमत्कार से अधिक प्रशासनिक इच्छाशक्ति का परिणाम है।
हालाँकि राजनीति में सफलता का सबसे बड़ा प्रमाण काम नहीं, विरोध होता है। यदि आपके विरोधी नहीं हैं तो समझिए आप अभी महत्वहीन हैं। इसलिए परिषद के कुछ असंतुष्ट चेहरे समय-समय पर कमियाँ खोजते रहते हैं। वे उस विद्यार्थी की तरह हैं जो परीक्षा में पूरे वर्ष अनुपस्थित रहा हो और परिणाम आने पर मूल्यांकन प्रक्रिया पर प्रश्न उठाने लगे।
परंतु उनके प्रति भी सहानुभूति रखनी चाहिए। लोकतंत्र में विपक्ष का अस्तित्व उतना ही आवश्यक है जितना भोजन में नमक। बस अंतर इतना है कि कभी-कभी नमक स्वयं को पूरी सब्ज़ी समझ बैठता है।
सबसे रोचक दृश्य तब दिखाई देता है जब पुराने और नए शासक विकास की विरासत पर बहस करते हैं। एक कहता है—“सब मैंने किया।” दूसरा कहता है—“जो कुछ हुआ, मेरे कारण हुआ।” जनता चुपचाप सुनती रहती है क्योंकि उसे पता है कि नगर की सड़कें किसी नेता की पैतृक संपत्ति नहीं होतीं। वे उसके करों से बनती हैं।
राजनीति का दुर्भाग्य यह है कि यहाँ श्रेय लेने वालों की संख्या काम करने वालों से अधिक होती है। कुआँ किसी और ने खोदा होता है, रस्सी कोई और लाता है और फोटो खिंचवाने तीसरा पहुँच जाता है।
अंततः जनता को भी समझना होगा कि लोकतंत्र कोई धार्मिक अनुष्ठान नहीं है जिसमें पाँच वर्ष में एक बार बटन दबाकर मोक्ष मिल जाए। यह निरंतर जागरूकता की प्रक्रिया है। नेता बदलने से व्यवस्था नहीं बदलती, जब तक जनता अपने प्रश्न पूछने का अधिकार जीवित न रखे।
और नेताओं को भी याद रखना चाहिए कि कुर्सियाँ स्थायी नहीं होतीं। कल जिनकी जय-जयकार हो रही थी, आज वे इतिहास के फुटनोट में हैं। इसलिए सत्ता को सिंहासन नहीं, जिम्मेदारी समझना चाहिए।
क्योंकि लोकतंत्र में अंतिम निर्णय जनता का होता है। और जनता की स्मृति भले अल्पकालिक हो, उसका हिसाब-किताब बहुत लंबा होता है।
आचार्य प्रताप
#व्यंग्य, #राजनीति, #लोकतंत्र, #कोटर, #सतना, #आचार्यप्रताप, #जनप्रतिनिधि