समीक्षक: आचार्य प्रताप
पुस्तक-परिचय
- पुस्तक का नाम: प्रियोम गीत अमृत
- लेखक: डॉ. प्रियंका दुबे 'प्रबोधिनी'
- विधा: गीत – संग्रह
- प्रकाशक: मधुशाला प्रकाशन प्राईवेट लिमिटेड
- कुल पृष्ठ: 106
- प्रकाशन वर्ष: अक्टूबर 2025
- ISBN: 978-93-48422-94-1
- मूल्य: 250 रुपये
हिंदी साहित्य की समकालीन गीत-परंपरा में जहाँ एक ओर प्रयोगवादिता के नाम पर छंद और लय को विखंडित करने का प्रयास किया जा रहा है, वहीं ‘प्रबोधिनी’ जी का प्रथम गीत-संग्रह 'प्रियोम गीत अमृत' अपनी सांगीतिक लय, मात्रिक अनुशासन और गहरी मानवीय संवेदनाओं के कारण ध्यान आकृष्ट करता है। एक समालोचक के रूप में जब मैं इस कृति के अंतस में प्रवेश करता हूँ, तो मुझे इसमें पौराणिक आख्यानों की नव-व्याख्या, राष्ट्रप्रेम, वात्सल्य, शृंगार और सामाजिक विद्रूपताओं का एक विस्तृत फलक दिखाई देता है। प्रस्तुत समीक्षा में मैंने इस संग्रह की रचनाओं का उनके गुण-दोष, शिल्प, बिंब विधान और दार्शनिक दृष्टि के आधार पर तटस्थ और शोधपरक विवेचन किया है।
संग्रह का आरंभ 'सरस्वती वंदना-1' से होता है। कवयित्री लिखती हैं,
"कर विराजे वाद्य वीणा, हंस की करती सवारी।
पुष्प उत्पल हस्त धारे, शारदे महिपर पधारी।।"
इन पंक्तियों में वाग्देवी का पारंपरिक और अत्यंत सुघड़ चित्र उकेरा गया है। भाषा में तत्सम शब्दों का प्राचुर्य है, जो स्तुति के अनुकूल गांभीर्य उत्पन्न करता है, किंतु शिल्प की दृष्टि से यहाँ कोई नवीन बिंब नहीं उभरता; यह एक सामान्य परिपाटी की वंदना प्रतीत होती है। इसके विपरीत,
'सरस्वती वंदना-2' में कवयित्री ने अपनी मौलिक मेधा का अद्भुत परिचय दिया है।
"पाँव में 'दोहा' महावर, 'सोरठा' बिछिए की रुनझुन।
पैजनी 'बरवै' सी छम-छम, 'सार छन्दो' से सजी धुन।।"
इन पंक्तियों में छंदों को ही देवी के आभूषणों का रूप दे देना कवयित्री की काव्यशास्त्रीय समझ और रूपक अलंकार के उत्कृष्ट प्रयोग को दर्शाता है। यहाँ भाव-सौंदर्य अपने चरम पर है, यद्यपि 'सार छन्दो' जैसी शब्दावली में व्याकरणिक दृष्टि से हल्की शिथिलता है, जिसे अधिक परिमार्जित किया जा सकता था।
पौराणिक आख्यानों को नवीन मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखने का जो प्रयास 'राम व्यथा' कविता में हुआ है, वह स्तुत्य है। कवयित्री लिखती हैं,
"क्रुर निर्णय कर प्रभु ने सिय विरह अंतस उतारे।
हैं स्वयं जग के विधाता क्यों नहीं विधिलेख टारे।।"
यहाँ राम केवल ईश्वर नहीं, बल्कि एक विवश राजा और प्रेमी के रूप में चित्रित हैं, जो राजधर्म और व्यक्तिगत प्रेम के द्वंद्व में फँसे हैं। 'विधिलेख टारे' में जो दार्शनिक विवशता है, वह राम के मानवीयकरण को पुष्ट करती है। इसी शृंखला में 'सिय वेदना' कविता सीता के मूक रुदन का अत्यंत कारुणिक आख्यान है।
"मौन मुखरित हो रहा सिय नैन हँसते अश्रु धारे।
खोल दूँ साँकल हृदय की कौन फिर मनको सम्हारे।।"
विरोधाभास अलंकार 'नैन हँसते अश्रु धारे' के माध्यम से सीता के उस चरम धैर्य को उकेरा गया है जहाँ होंठों पर स्मित है परंतु आँखों में वेदना का सागर है। यह पंक्तियाँ भारतीय नारी की उस सनातन सहनशीलता का प्रतीक हैं जो सामाजिक मर्यादाओं की 'साँकल' में बँधी है।
'शिव माह' कविता में सावन के प्राकृतिक सौंदर्य और शिव-भक्ति का सुंदर समन्वय है।
"पावस ऋतु शिव से हुआ, पावन सावन माह।
अन्तर्मन शिव पैठकर, उचित दिखाते राह।।"
यद्यपि यहाँ प्रकृति का मानवीकरण किया गया है, तथापि 'उचित दिखाते राह' जैसी शब्दावली काव्यात्मकता को किंचित गद्यात्मक बना देती है, जहाँ शिल्प अधिक गीतात्मक हो सकता था। महाभारत के प्रसंगों पर आधारित 'कवच कुण्डल' और 'केशव-कर्ण संवाद' इस संग्रह की वैचारिक रूप से अत्यंत सशक्त कविताएँ हैं। कर्ण की मनोव्यथा को उकेरते हुए कवयित्री लिखती हैं,
"भानु का मैं पुत्र हूँ प्रारब्ध के हर दाँव तोडूं!
या कि, अपने कर्म से मैं पितृ यश में कीर्ति जोडूं?"
यहाँ नियतिवाद और कर्मवाद का दार्शनिक द्वंद्व प्रस्तुत हुआ है। कर्ण का यह प्रश्न केवल सूर्यपुत्र का नहीं, बल्कि समाज में अपनी पहचान के लिए संघर्षरत प्रत्येक उस व्यक्ति का है जो जन्मना वर्ण-व्यवस्था का शिकार है। 'केशव-कर्ण संवाद' में जब कर्ण कहते हैं,
"दोष क्या मेरा भला था भाग्य के यह खेल सारे।
आप क्या कहते हैं माधव? पाण्डवों का ज्येष्ठ मैं हूँ?"
तो इसमें छलने जाने की जो पीड़ा है, वह व्यंजना शक्ति के माध्यम से पाठक के हृदय को बेध देती है।
'कैकेयी-दशरथ संवाद (कोपभवन)' में दशरथ की करुणा का सजीव चित्रण है।
"कांता!! जीवन श्वास माँग लो, मुझपर यह उपकार करो।
करुणा की सागर कैकेयी! कहो चरण में शीष झुका लूँ!"।
इन पंक्तियों में एक चक्रवर्ती सम्राट का अपनी पत्नी के समक्ष असहाय होकर गिड़गिड़ाना मानवीय संबंधों की जटिलता और नियति की क्रूरता का सटीक बिंब प्रस्तुत करता है। भाषा यहाँ अत्यंत प्रवाहपूर्ण और भावानुकूल है। 'बसंत ऋतु' कविता में 'चामर एवं पंच चामर' छंद का आधार लेकर प्रकृति का भव्य चित्रण किया गया है।
"कौन चित्र को उकेर रंग भर गया अनन्त,
कौन ये अदृश्य चित्रकार है?"
यहाँ रहस्यवाद की स्पष्ट झलक मिलती है, जहाँ दृश्यमान प्रकृति के पीछे किसी अलौकिक सत्ता का आभास होता है।
शृंगार और विरह के गीतों में डॉ. प्रियंका की लेखनी विशेष रूप से रसवंती सिद्ध हुई है। 'प्राण मैं गंगा तुम्हारी'
में प्रणय का जो उदात्त रूप उभरता है, वह लौकिक होकर भी पारलौकिक लगता है।
"मैं धरा पर मोक्षदात्री,
तुम प्रलय के सार हो।
मैं विरल तुलसी सदन की, तुम सघन से हो अरण्यक।"
यहाँ शिव और गंगा के रूपक के माध्यम से स्त्री और पुरुष की पूरकता को दर्शाया गया है। तुलसी (घरेलू पवित्रता) और अरण्यक (वन्य विस्तार) का विरोधाभासी बिंब एक अद्भुत साहित्यिक सौंदर्य रचता है।
'नयन कहने लगे हैं पीर प्रियतम'
पूर्णतः विप्रलंभ शृंगार की कविता है।
"हृदय की वेदना कैसे छुपाऊँ?
सहज बहने लगे हैं नीर प्रियतम !
नयन कहने लगे हैं पीर प्रियतम!!"
इन पंक्तियों में अनुप्रास की छटा के साथ-साथ अश्रुओं का सहज प्रवाह विरहिणी की उस मनःस्थिति का परिचायक है जहाँ वाणी मौन हो जाती है और नेत्र ही संवाद का माध्यम बन जाते हैं। 'वेदना के मेह पुष्पक' में कवयित्री का बिंब-विधान अत्यंत नवीन है:
"वेदना के मेहपुष्पक,
नैन को छलने लगे हैं।।"
वेदना को 'मेहपुष्पक'
(वर्षा के फूलों) का रूप देना एक सर्वथा मौलिक प्रयोग है जो पीड़ा की निरंतरता और उसकी चुभन दोनों को एक साथ ध्वनित करता है।
'हाथ की मेहंदी न छूटी'
एक अत्यंत मर्मस्पर्शी रचना है।
"हाथ की मेंहदी न छूटी,
छूटा क्यों साथ तुम्हारा?
लौट आओ तुम दुबारा"।
एक नवविवाहिता वीर-पत्नी की इस करुण पुकार में जो सामाजिक सत्य और व्यक्तिगत क्षोभ है, वह पाठक को विचलित कर देता है। इसी से जुड़ी कविता 'वीर वधू' में शोक को शक्ति में बदलते हुए दिखाया गया है।
"रहूंगी वीर की पत्नी मुझे विधवा नही बोलो।
मुझे रहने सुहागन दो ये मंगलसूत्र मत खोलो।।"
यहाँ वीर रस और करुण रस का अद्भुत सम्मिश्रण है; यह पंक्तियाँ भारतीय स्त्री के उस आत्मसम्मान को रेखांकित करती हैं जहाँ पति का बलिदान उसके लिए असीम गर्व का विषय बन जाता है। 'चाहते हैं अमन इस वतन के लिए' में भी राष्ट्रप्रेम मुखर हुआ है:
"चाहते हैं अमन इस वतन के लिए।
हम करेंगे जतन इस वतन के लिए।।"
यद्यपि भाव पवित्र हैं, परंतु यहाँ भाषा और शिल्प में वह नवोन्मेष नहीं दिखता जो उनकी अन्य रचनाओं में है; यह एक पारंपरिक देशभक्ति गीत की सीमाओं में बंधा प्रतीत होता है।
"नैन में दिखती उनीदी,
भूख से है पेट खाली।
है कहाँ उसकी दिवाली?"
इन पंक्तियों में बाल-श्रम और वर्ग-भेद की समस्या को उठाया गया है। समाज के हाशिए पर खड़े उस वर्ग की पीड़ा को कवयित्री ने बिना किसी अलंकारिक लाग-लपेट के सीधे शब्दों में प्रस्तुत किया है, जिससे इसका प्रभाव द्विगुणित हो जाता है। 'माँ सिखाई क्यों न लड़ना?' में एक बेटी का अपनी माँ से विद्रोह और पितृसत्तात्मक ढाँचे पर तीखा प्रश्न है।
"सब्र करना क्यों सिखायी,
माँ सिखाई क्यों न लड़ना ?
जो कहे अपशब्द उसके
मुँह पे थप्पड़ चार जड़ना।"
यह कविता स्त्री विमर्श के एक नए और आक्रामक रूप को प्रस्तुत करती है, जहाँ बेटी अब केवल सहने को प्रस्तुत नहीं है। यहाँ भाषा में जानबूझकर जो आक्रामकता ('थप्पड़ चार जड़ना') लाई गई है, वह सदियों के दमित आक्रोश का सटीक काव्यात्मक रूपांतरण है।
"गीत का एक ग्रंथ लिख दूँ,
मैं तुम्हारे नाम बाबू।
तुम हृदय के धाम बाबू।।"
छोड़ कर जाते अनोखे काल के सपने खलेंगे।।"
समग्रता में विचार करें तो, 'प्रियोम गीत अमृत' केवल एक गीत-संग्रह नहीं, अपितु जीवन के विविध रंगो का एक बहुरूपदर्शक है। ‘प्रबोधिनी’ जी की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उन्होंने गीत-विधा के पारंपरिक अनुशासन (लय, तुक, ताल) को खंडित किए बिना उसमें आधुनिक जीवन के यथार्थ, मनोवैज्ञानिक द्वंद्वों और सामाजिक विमर्शों को सफलतापूर्वक पिरोया है। जहाँ 'कितने राम', 'वैदेही की तृष्णा जागी', और 'केशव-कर्ण संवाद' जैसी कविताएँ उनकी गहरी पौराणिक समझ और दार्शनिक दृष्टि को प्रमाणित करती हैं, वहीं 'विज्ञान दिवस', 'पृथ्वी दिवस' और 'हिन्दी' जैसी रचनाएँ उनके समसामयिक और वैचारिक सरोकारों को पुष्ट करती हैं।
अपनी संवेदनाओं और शिल्पगत परिपक्वता के बल पर यह कृति निःसंदेह सहृदय पाठकों के अंतस में स्थायी स्थान बनाने में सफल होगी।
लेखन शैली मन को भाती, सारे जग में फैले प्यारा।
मानव मन के भावों वाला, दर्पण इसमें मोती बोता।
कौशल इसमें उत्तम झलके, अक्षर-अक्षर अमृत होता।
लेकिन कुछ तो बासी बातें, रचना का स्वर लगता भारी।
पीड़ा वाली बातें सारी, कम है इसमें नूतनकारी।
शैली सीधी सादी भाषा, गीतों में है कम ही आशा।
शिक्षा वाली बातें ज्यादा, फीकी लगती मन की भाषा।
नूतन बिंबों को भी लाओ, शब्दों की नव आभा पाओ।
कविता का पथ ऊँचा होगा, आगे बढ़ते चलते जाओ।
गहरे भावों को तुम ढूँढ़ो, गढ़ना सुंदर-सुंदर गहना।
पावन रचना करते रहना, प्रबोधिनी तुम बढ़ती रहना।
-आचार्य प्रताप


बहुत सुंदर और सटीक समीक्षा भाई! निश्चिंत ही आप ्एक मझे हुए समीक्षक हैं!🎉🎉🌷🙏
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