चरण पादुका : डॉ. प्रियंका दुबे प्रबोधिनी

16. चरण पादुका : डॉ. प्रियंका दुबे प्रबोधिनी

समीक्षक: आचार्य प्रताप
पुस्तक का नाम: चरण पादुका
लेखक: डॉ. प्रियंका दुबे 'प्रबोधिनी'
विधा: गीत – संग्रह
प्रकाशक: मधुशाला प्रकाशन प्राईवेट लिमिटेड
कुल पृष्ठ: 110
प्रकाशन वर्ष: 2026
ISBN: 978-93-7428-397-4
मूल्य: 250 रुपये

समीक्ष्य पुस्तक का नाम 'चरण पादुका' है, जिसकी सर्जक डॉ. प्रियंका दुबे 'प्रबोधिनी' है। मैं, आचार्य प्रताप, समकालीन हिंदी साहित्य की वाचिक और लिखित परंपरा का एक सघन अध्येता होने के नाते, डॉ. प्रियंका दुबे 'प्रबोधिनी' के इस नव-प्रकाशित गीत-संग्रह 'चरण पादुका' की एक विस्तृत, निष्पक्ष और शोधपरक समीक्षा प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह संग्रह केवल

छंदबद्ध शब्दों का संयोजन नहीं है, बल्कि इसमें पौराणिक आख्यानों, समसामयिक सामाजिक विसंगतियों, शृंगारिक अनुभूतियों और दार्शनिक चेतना का एक विस्तृत फलक मौजूद है। कवयित्री ने इस संग्रह में तिरसठ गीतों को समाहित किया है। एक समीक्षक के रूप में मेरा यह दायित्व है कि मैं केवल स्तुतिगान न करूँ, बल्कि कृति के शिल्प, रस, अलंकार, बिंब-विधान और उसकी वैचारिक सीमाओं का भी तटस्थ मूल्यांकन करूँ।
संग्रह का आरंभ 'सरस्वती वंदना' और 'प्रार्थना के भाव' से होता है, जहाँ कवयित्री ने अपनी शब्द-साधना को माँ वाणी के चरणों में समर्पित किया है। 'प्रार्थना के भाव' कविता में कवयित्री की दृष्टि अत्यंत स्पष्ट है। वे लिखती हैं:

"शुद्ध सात्विक भाव मेरे हृद निलय के मध्य भर दो-
शास्त्र के प्रतिकूल लिक्खूँ इस विषय की वर्जना हो।।"

इन पंक्तियों में कवयित्री का दर्शन झलकता है। वे स्वच्छंदतावाद के नाम पर शास्त्रीय मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं करना चाहतीं। यहाँ भाषा प्रांजल और तत्सम-प्रधान है। 'हृद निलय' जैसे शब्दों का प्रयोग उनके शब्द-चयन की गंभीरता को दर्शाता है। हालाँकि, इसी गीत में "उन्वान गढ़ते जा रहे हैं" जैसे प्रयोग में 'उन्वान' (शीर्षक/उपाधि) शब्द का प्रयोग तत्सम शब्दावली के बीच थोड़ा अटपटा लगता है, जो शिल्प की एक हल्की त्रुटि मानी जा सकती है।
इस संग्रह का एक बड़ा हिस्सा पौराणिक चरित्रों के पुनर्मूल्यांकन को समर्पित है। शीर्षक गीत 'चरण पादुका' भ्रातृ-प्रेम और त्याग का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। भरत के चरित्र को केंद्र में रखकर कवयित्री ने करुण रस की जो धारा बहाई है, वह अत्यंत मार्मिक है:

"राम के नैन से अश्रु बहते रहे,
ले चले शीश धारे चरण पादुका।
मौन संवाद करते सहज चल रही,
प्रिय भरत को सम्हारे चरण पादुका ।।"

यहाँ 'मौन संवाद' का बिंब मानवीकरण अलंकार का सुंदर प्रयोग है। पादुकाएँ यहाँ केवल लकड़ी का एक निर्जीव वस्तु नहीं हैं, बल्कि वे राम की उपस्थिति और उनके स्नेह की प्रतिनिधि हैं जो भरत को संभाल रही हैं। भाषा अत्यंत सहज और प्रवाहमयी है।

इसी शृंखला में 'लक्ष्मण रेख' गीत सीता-हरण के प्रसंग को एक नए मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से प्रस्तुत करता है। कवयित्री ने सीता के अंतर्द्वंद्व और उनके क्रोध को बहुत सजीवता से उकेरा है:
"रक्त अंगार सा मुख सिया का हुआ,

बात मुझसे नही तुम बनाओ लखन।
रेख लक्ष्मण चले खींचने वेग से,
माँ सिया कह रहीं शीघ्र जाओ लखन ।।"

इन पंक्तियों में सीता का उग्र रूप ('रक्त अंगार सा मुख') उपमा अलंकार के माध्यम से उनके मानसिक संताप और पति की सुरक्षा के प्रति उनकी चिंता को दर्शाता है। शिल्प की दृष्टि से यहाँ दृश्य बिंब अत्यंत शक्तिशाली है।
पौराणिक आख्यानों में ही 'अहिल्या' और 'उर्मिला' जैसी उपेक्षित नारी पात्रों की पीड़ा को भी कवयित्री ने स्वर दिया है। 'अहिल्या' गीत में नारी-विमर्श का एक प्राचीन संदर्भ उभरता है:

"एक कामी खल पुरुष की कु-प्रवृत्ति का नतीजा।
भोगती अनभिज्ञ नारी क्यों न ऋषिवर मन पसीजा ।।"

यहाँ समाज की उस दोहरी मानसिकता पर तीखा प्रहार है जहाँ पुरुष के अपराध का दंड एक निर्दोष स्त्री को भोगना पड़ता है। प्रश्नवाचक शैली का प्रयोग कविता में बौद्धिक विमर्श को जन्म देता है। इसी प्रकार 'उर्मिला' गीत में कवयित्री ने सीता के त्याग के समक्ष उर्मिला के मौन त्याग को स्थापित करने का प्रयास किया है। यह गीत विप्रलंभ शृंगार और करुण रस का अनूठा संगम है।

कवयित्री केवल अतीत के आख्यानों में ही नहीं जीतीं, बल्कि उनका यथार्थ बोध भी अत्यंत प्रखर है। सामाजिक सरोकारों से जुड़े गीतों में उनकी लेखनी आग उगलती है। 'नारी' शीर्षक कविता में वे स्त्री की अस्मिता और उसकी शक्ति का जयगान करती हैं:

"निर्णय की क्षमता तुममें है, शक्ति स्वयं की तुम पहचानों।
निज से निज का पंथ चुनो तुम, निज मन की इच्छा भी जानों"
यह मात्र एक गीत नहीं, बल्कि स्त्री-सशक्तिकरण का उद्घोष है। प्रसाद की 'कामायनी' की तरह यहाँ स्त्री को 'श्रद्धा' माना गया है, परंतु उसे केवल देवी या दया की मूर्ति बनाकर नहीं छोड़ा गया, बल्कि उसे अंतरिक्ष की उड़ान भरने वाली और 'क्रीड़ांगन' में अव्वल आने वाली आधुनिक नारी के रूप में भी चित्रित किया गया है।
परंतु जब यथार्थ की धरातल पर सबसे निचले तबके की बात आती है, तो कवयित्री का स्वर बदल जाता है। 'बेच रही है फूल' कविता महानगरीय जीवन की उस नग्न सच्चाई को उद्घाटित करती है, जहाँ बचपन भूख की वेदी पर बलि चढ़ जाता है:

"मुरझाई कलियों सी बेटी, चुभती बनकर शूल।
घूम-घूम कर बेच रही है, फुटपाथों पर फूल।।"
"भूख मिटाने भर के बदले, मिटता मान समूल।"

इन पंक्तियों में 'मुरझाई कलियों सी बेटी' में पूर्णोपमा अलंकार है। यह कविता खोखले राजनीतिक नारों ('बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ') पर एक व्यंग्यात्मक तमाचा है। यह सामाजिक विमर्श की दृष्टि से संग्रह की सबसे सशक्त कविताओं में से एक है।
अब यदि हम निष्पक्ष आलोचना की बात करें, तो जहाँ कवयित्री शृंगार, करुणा और पौराणिक विषयों पर लिखती हैं, वहाँ उनका शिल्प और लय-विधान अत्यंत सुगठित रहता है। परंतु जब वे प्रत्यक्ष राजनीतिक विषयों पर आती हैं, तो कविताओं में काव्यात्मक लालित्य कम हो जाता है और वे गद्य या सीधे भाषण जैसी लगने लगती हैं। उदाहरण के लिए 'यूजीसी बिल २०२६' और 'कपटी सरकार' गीतों को देखा जा सकता है।

"यूजीसी का कौन करेगा खुलकर आज विरोध?
सभी पार्टियां मौन धरी हैं, करती चिंतन शोध।"

और,

"जाति पाति की खाई गहरी, खोद रही कपटी सरकार।
लिखकर लानत भेज रही हूँ, भेज रही सौ सौ धिक्कार।।"

आलोचनात्मक दृष्टि से देखा जाए तो इन पंक्तियों में सामाजिक आक्रोश तो है, परंतु वह काव्यात्मक बिंबों या प्रतीकों के आवरण में नहीं, बल्कि सपाटबयानी के रूप में सामने आया है। कविता जब नारा बन जाती है, तो उसकी शाश्वतता खंडित होती है। 'सरकार', 'धिक्कार', 'पार्टियां' जैसे शब्दों का सीधा प्रयोग कविता की लय और रस को बाधित करता है। यहाँ कवयित्री का भाव-पक्ष उनके कला-पक्ष पर इतना हावी हो गया है कि वे कलात्मक संयम खो बैठी हैं।

इसके विपरीत, जब कवयित्री पुनः शृंगार और मानवीय भावनाओं के कोमल धरातल पर लौटती हैं, तो उनकी लेखनी का जादू फिर से सिर चढ़कर बोलता है। 'आखिरी इच्छा यही है' एक ऐसा गीत है जो किसी भी सहृदय पाठक की आँखों में आँसू ला सकता है। यह मृत्यु के समक्ष प्रेम के शाश्वत रूप का गान है:

"लाल जोड़े में विदा करना,
सजा सिंदूर साजन।
जब चलूँ मैं दूर साजन ।।"

"अस्थियों को भर कलश, मंदाकिनी में तुम बहाना।
एक दीपक आखिरी बस शांति हित में रख जलाना।।"

इन पंक्तियों में मृत्यु का भय नहीं है, बल्कि एक शांतिपूर्ण समर्पण है। लाल जोड़ा और सिंदूर यहाँ सौभाग्य और अमर प्रेम के शाश्वत प्रतीक हैं। भाषा में अद्भुत मिठास और लयात्मकता है। इसी प्रकार 'बैरी यह तन्हाई साजन' गीत में विरह का अत्यंत मार्मिक वर्णन है:

"बहती जब-जब पीर जगाती, 
डंसती यह परुछाई साजन।
बैरी यह तनहाई साजन।।"

परछाईं का 'डँसना' यहाँ रूपक और मानवीकरण का मिला-जुला और उत्कृष्ट प्रयोग है। विरह की अवस्था में अपनी ही परछाईं शत्रु लगने लगती है, यह मनोवैज्ञानिक सत्य यहाँ बड़ी सुंदरता से पिरोया गया है।
प्रकृति के मानवीकरण और ऋतु-वर्णन में भी कवयित्री सिद्धहस्त हैं। 'आने वाले हैं ऋतुराज' और 'मनहर है मधुमाह' गीतों में बसंत का पारंपरिक परंतु अत्यंत जीवंत चित्रण हुआ है:

"इंद्रधनुषी उपवन लगता, महक उठी अँगनाई।
मन्मथ मारें पुष्पवाण से, निखर रही तरुणाई।।"

मधुकर, मन्मथ, पुष्पबाण—ये सभी शब्द छायावादी और रीतिकालीन काव्य-परंपरा की याद दिलाते हैं।

समग्र रूप से विचार करें तो, डॉ. प्रियंका दुबे 'प्रबोधिनी' का गीत-संग्रह 'चरण पादुका' समकालीन हिंदी गीत-परंपरा में एक महत्त्वपूर्ण हस्तक्षेप है। इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि यह संग्रह जीवन के किसी एक रंग तक सीमित नहीं है। इसमें यदि 'बुद्ध वैराग्य' का दार्शनिक चिंतन है, तो 'कपटी सरकार' का राजनीतिक आक्रोश भी है; यदि 'पार्वती परिणय' का अलौकिक शृंगार है, तो 'बेच रही है फूल' का नग्न यथार्थ भी है। सीमाओं की बात करें तो, यत्र-तत्र गद्यात्मकता का प्रवेश और सपाटबयानी इस संग्रह के कलात्मक उत्कर्ष को कहीं-कहीं बाधित करते हैं, परंतु भावों की ईमानदारी और विविधता इस कमी को ढँक लेती है। समकालीन साहित्य में जहाँ गीत विधा हाशिए पर जा रही है, वहाँ छंद, लय और ताल से युक्त ऐसा सुगठित संग्रह आना अत्यंत सुखद है।

अंततः, आचार्य प्रताप के रूप में मेरी पाठकों को यह स्पष्ट सलाह है कि इन गीतों की मूल भावना, उनकी पूरी कथाभूमि और उनके पीछे छिपे व्यापक अर्थों को समग्रता से समझने के लिए आप इन गीतों को अवश्य पढ़ें। उत्कृष्ट साहित्य वही है जो पाठक को अपने संपूर्ण रूप को खोजने और समझने के लिए प्रेरित करे।

-आचार्य प्रताप
Achary Pratap

समालोचक , संपादक तथा पत्रकार प्रबंध निदेशक अक्षरवाणी साप्ताहिक संस्कृत समाचार पत्र

3 Commentaires

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  1. अद्भुत समीक्षा भाई! आपने बहुत ईमानदारी से पूरी पुस्तक को पढ़ा और फिर गीतों के भाव को आत्मसात कर अपनी बात रखी! आपको इस उत्कृष्ट समीक्षा के लिए हार्दिक बधाई!🌷🙏🎉

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    1. मैंने केवल एक समकालीन पाठक होने का दायित्व निभाया है। आज के समय में रचना को मनोयोगपूर्वक पढ़ने वाले पाठक विरल होते जा रहे हैं; ऐसे में मैंने बस एक सजग पाठक का उत्तरदायित्व निभाते हुए रचना को पढ़ा, समझा और अपनी अनुभूति अभिव्यक्त की है। सादर नमन

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  2. अति उत्तम अनुपम समीक्षा प्रस्तुत की आपने,चरण पादुका आज के समय में प्रिय अनुजा की अद्भुत कृति है।

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