समीक्षक: आचार्य प्रताप
पुस्तक का नाम: श्रीकृष्ण की अद्भुत बाल लीलाएंलेखक: जगदीश शर्मा 'सहज'
विधा: काव्य (धार्मिक खण्डकाव्य / पद्यात्मक संकलन)
प्रकाशक का नाम: प्रिन्सेप्स प्रकाशन
कुल पृष्ठ: 73 (कवर पृष्ठ सहित)
प्रकाशन वर्ष: 2026
ISBN संख्या: 978-81-69484-00-8
पुस्तक का मूल्य: मात्र 120/- रुपये
साहित्य की आलोचना कोई यांत्रिक प्रक्रिया नहीं है, अपितु यह सर्जक की चेतना, उसके शिल्प और युगबोध का निर्मम परंतु न्यायपूर्ण परीक्षण है। वर्तमान कालखंड में, जहाँ कविता छंदों के अनुशासन को त्यागकर गद्य की उच्छृंखलता और महानगरीय संत्रास में भटक रही है, वहीं जगदीश शर्मा 'सहज' की कृति 'श्रीकृष्ण की अद्भुत बाल लीलाएं' हमें पुनः उस रागात्मक और भक्ति-प्रवण युग की ओर ले जाने का प्रयास करती है, जहाँ कविता नाद-सौंदर्य और आध्यात्मिक चेतना का पर्याय हुआ करती थी। द्वापर युग के महानायक श्रीकृष्ण की लीलाओं का पद्यात्मक गान करना कोई नूतन प्रयोग नहीं है; सूरदास, रसखान, और नन्ददास जैसे महाकवियों ने इस विषय पर लेखनी की जो पराकाष्ठा स्थापित की है, उसके समक्ष किसी भी नवीन कृति का मूल्यांकन अत्यंत कठोर निकष पर ही संभव है।
प्रस्तुत कृति में कवि ने भगवान श्रीकृष्ण के जन्म से लेकर कंस वध तक की कथाओं को विविध छंदों में पिरोने का स्तुत्य प्रयास किया है। कवि की आस्था, उनका समर्पण और भगवद्भक्ति असंदिग्ध है, जिसका प्रमाण उन्होंने आमुख में ही दे दिया है, जहाँ वे अस्वस्थता के काल में इस काव्य के सृजन की बात स्वीकारते हैं। तथापि, एक समीक्षक का धर्म केवल आस्था का वंदन करना नहीं, बल्कि कृति के साहित्यिक, भाषिक और शैल्पिक अवयवों का शल्य-परीक्षण करना है। आइए, इस काव्य-संग्रह की प्रमुख रचनाओं का उनके गुण-दोषों के आधार पर विस्तृत और शोधपरक विवेचन करें।
काव्य का आरंभ पारंपरिक रूप से प्रभु की स्तुति से होता है। कवि ने 'प्रार्थना' शीर्षक के अंतर्गत इष्टदेव का स्मरण किया है।
बाँके कन्हैया, जग के खिवैया।
बलराम भैया, हलधर उठैया ।।
प्रतिपाल गैया, बंशी बजैया।
विषधर नथैया, लीला रवैया ।।
इन पंक्तियों का सबसे बड़ा गुण इनका नाद-सौंदर्य और अन्त्यानुप्रास है। 'खिवैया', 'उठैया', 'बजैया' जैसे शब्दों का प्रयोग ब्रजभाषा की लोक-धुनों का स्मरण कराता है। इसमें गेयता है और यह पद कीर्तन के लिए पूर्णतः उपयुक्त है। स्वर-मैत्री के कारण यह पंक्तियाँ पाठक को सीधे भक्ति-भाव से जोड़ती हैं। एक आलोचक की दृष्टि से देखें तो यह स्तुति वर्णनात्मक अधिक और भावात्मक कम है। कवि ने भगवान के विभिन्न नामों और कार्यों की केवल एक सूची प्रस्तुत कर दी है। इसमें किसी नवीन बिंब का सर्वथा अभाव है। 'लीला रवैया' जैसे शब्दों का प्रयोग व्याकरणिक दृष्टि से किंचित शिथिल प्रतीत होता है, जो केवल तुकबंदी की पूर्ति के लिए गढ़ा गया लगता है।
कारागार में भगवान के प्राकट्य और वसुदेव-देवकी के प्रसंग को कवि ने वसंत तिलका छंद में बाँधने का प्रयास किया है, जो उनकी छंद-साधना का परिचायक है।
श्री कृष्ण आज व्रज में अवतार लेंगे।
दुर्दात शत्रुजन का वध वो करेंगे।।
संतप्त भक्तजन की विपदा हरेंगे।
संसार के भँवर से वह तार देंगे।।
वर्णिक छंद (त. भ. ज. ज. ग. ग.) का चुनाव इस गंभीर और ऐतिहासिक प्रसंग के लिए सर्वथा उपयुक्त है। कवि ने यहाँ प्रांजल खड़ी बोली का आश्रय लिया है, जिससे दृश्य की गरिमा और ईश्वरीय अवतरण का गांभीर्य स्थापित होता है वसंत तिलका के कठोर नियमों का निर्वाह करते समय भाषा में एक प्रकार की कृत्रिमता आ गई है। 'दुर्दात' जैसे शब्दों का प्रयोग खटकता है; मूल शब्द 'दुर्दांत' है, जिसे मात्रिक या वर्णिक गणना के लिए विकृत किया गया प्रतीत होता है। इसके अतिरिक्त, "वध वो करेंगे" जैसी शब्दावली काव्यात्मक न होकर सामान्य बोलचाल की भाषा लगती है, जो छंद की शास्त्रीय गरिमा को खंडित करती है।
नन्दोत्सव का प्रसंग कृष्ण-काव्य का प्राण है। 'सहज' जी ने इसे बधाई गीत की तर्ज पर रचा है।
यशोदा को दुलारो वीर,
ललन मेरो छोटो सो ।
बड़ो भोलो, बड़ो मतिधीर,
ललन मेरो छोटो सो ।।
यह कृति का सर्वाधिक सरस और प्रामाणिक अंश है। वात्सल्य रस अपने पूर्ण उत्कर्ष पर है। यहाँ कवि ने शास्त्रीयता के बोझ को दरकिनार कर विशुद्ध लोकगीत की शैली अपनाई है, जो ब्रजभूमि की माटी की गंध से ओत-प्रोत है। "नवरत्नों के खम्भ जड़े हैं, कंचन कोट कँगूर मढ़े हैं" जैसी पंक्तियों में दृश्य-विधान (चाक्षुष बिंब) अत्यंत समृद्ध और मनोहारी है। लोक-तत्व के इस उत्कृष्ट प्रवाह के बीच, कवि कई स्थानों पर लय को संभाल नहीं पाए हैं। पंक्तियों के विस्तार और संकुचन में जो विषमता है, वह गाते समय बाधक सिद्ध होती है। भावों में सूरदास जैसी सूक्ष्म मनोवैज्ञानिकता का अभाव है; माता यशोदा के मातृत्व की अतल गहराइयों में उतरने के बजाय कवि केवल बाहरी उत्सव और सजावट के वर्णन तक सीमित रह गए हैं।
पूतना उद्धार, शकट भंजन, तृणावर्त और बकासुर वध जैसे प्रसंगों में कवि ने कथा को तीव्र गति प्रदान करने का प्रयास किया है। हरिगीतिका छंद का प्रयोग प्रबंधात्मक आख्यानों के लिए मुफीद रहा है।
विषधर भयानक पूतना तन से बड़ी विकराल थी।
नवजात शिशुओं के लिए ममता रहित वह काल थी।।
रख रूप सुंदर यौवना फिरती अहीरों की गली।
परिचारिका वह कंस का आदेश पा गोकुल चली।।
यहाँ कथा-प्रवाह अत्यंत सहज और अबाध है। १६ और १२ मात्राओं (कुल २८) के यति-विधान का कवि ने सम्यक निर्वाह किया है। राक्षसी के भयंकर स्वरूप और उसके छद्म वेश का विरोधाभास बहुत ही सटीक शब्दों में उकेरा गया है। भयानक रस की निष्पत्ति सफलतापूर्वक हुई है। इन आख्यानक कविताओं में सबसे बड़ी दुर्बलता यह है कि ये घटना-प्रधान हो गई हैं, भाव-प्रधान नहीं। 'सहज' जी कथा तो सुनाते हैं, किंतु उन कथाओं के भीतर छिपे दार्शनिक या मनोवैज्ञानिक सत्य को अनावृत करने से चूक जाते हैं। इसके अतिरिक्त, वत्सासुर और बकासुर वध के प्रसंगों में शब्दावली प्रायः दोहराई गई है, जिससे एक ही प्रकार के कथ्य का बोध होता है।
कालिय नाग दमन की लीला में कवि ने अपने शिल्प का बेहतरीन प्रदर्शन किया है।
कृष्णचन्द्र कालिय के, फण पर चढ़कर।
छोटे-छोटे तलवों से, नृत्य करने लगे।।
लाल-लाल मणियों की, आभा ज्वाल ज्योतियों सी ।
नाग के सिरों पे प्रभु, भार धरने लगे।।
इन पंक्तियों में अद्भुत चित्रोपमता (Pictorial quality) है। एक ओर भयंकर विषधर नाग की लाल मणियों की ज्वाला है, तो दूसरी ओर बाल-कृष्ण के सुकोमल चरण हैं। यह 'कंट्रास्ट' (विरोध-सौंदर्य) काव्य को उच्च कोटि पर ले जाता है। अनुप्रास और उपमा (ज्वाल ज्योतियों सी) का प्रयोग दृश्य को अत्यंत सजीव बना देता है। छंद के विन्यास में यहाँ अत्यधिक स्वतंत्रता ली गई है, जिससे लय बीच-बीच में टूटती है। पंक्तियों का विखंडन इस प्रकार किया गया है कि वे किसी सुनिश्चित मात्रिक या वर्णिक सांचे में ठीक से नहीं बैठतीं। इसके कारण पाठक को यति (विराम) लेने में भ्रांति उत्पन्न होती है।
कृष्ण काव्य गोपी-विरह के बिना अपूर्ण है। कवि ने 'गोपी विरह' खण्ड में वियोग शृंगार की छटा प्रस्तुत की है।
उद्धव ! हम विरहन दुखियारी ।
वृन्दा वन अनमने मदन बिन, सुधि भूले बनवारी।
कुंज कदंब सघन वन सूने, तुम बिन कुंजविहारी।
शुक्लपक्ष की शरद यामिनी, चन्द्र बिना अँधियारी।
इन पंक्तियों में वियोग रस की सच्ची तड़प है। 'शुक्लपक्ष की शरद यामिनी, चन्द्र बिना अँधियारी' एक उत्कृष्ट रूपक है जो गोपियों के हृदय के गहन अंधकार और शून्य को बाह्य प्रकृति के माध्यम से अभिव्यक्त करता है। यहाँ ब्रजभाषा का पुट कविता को अतिरिक्त मिठास प्रदान करता है। यह प्रसंग अत्यंत संक्षिप्त है। जहाँ भ्रमरगीत परंपरा में निर्गुण और सगुण का विराट बौद्धिक और भावनात्मक संघर्ष होता है, वहाँ प्रस्तुत कृति में गोपियों का विरह केवल एक शिकायत बनकर रह गया है। दार्शनिक विवेचन, जो उद्धव-गोपी संवाद की मूल आत्मा है, उसका यहाँ पूर्णतः अभाव है।
'श्री राधा परमेश्वरी' शीर्षक गीत में कवि ने शक्ति स्वरूपा श्री राधा की आराधना की है।
भवन में विराजी महादेवियाँ हैं ।
कई रूप में सृष्टि की शक्तियाँ हैं ।।
यही अम्बिका हैं यही चण्डिका हैं,
यही हैं शिवानी यही कालिका हैं ।
यह एक ओजस्वी स्तुति-गान है। राधा को केवल कृष्ण की ह्लादिनी शक्ति या प्रेयसी न मानकर, उन्हें दुर्गा, चंडिका, शिवानी और संपूर्ण सृष्टि की आदिशक्ति के रूप में स्थापित करना कवि की अद्वैत और शाक्त-वैष्णव समन्वयवादी दार्शनिक दृष्टि का परिचायक है। साहित्यिक दृष्टि से, राधा के मूल माधुर्य भाव का यहाँ लोप हो गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि कवि ने किसी प्रचलित दुर्गा-स्तुति में केवल राधा का नाम जोड़ दिया है। राधा के विशुद्ध प्रेम-तत्व (जो वृंदावन की निकुंज लीलाओं का आधार है) और महाकाली के संहारक तत्व को एक ही पलड़े में तौलने से रस-दोष (विरुद्ध रस का समावेश) उत्पन्न हो गया है।
उपदेशात्मकता का अतिक्रमण और साधारणीकरण में बाधा
समीक्षा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और चिंताजनक पहलू है—कृति में प्रयुक्त गद्यात्मक उपदेश। कवि ने लगभग प्रत्येक कविता के अंत में तारांकन (*) लगाकर जीवनोपयोगी सूत्र दिए हैं।
प्राणायाम करें । तनाव कम करें ।
जीवन में अच्छे लोगों की तलाश मत करो खुद अच्छे बन जाओ...
मोबाईल का अच्छे कार्य के लिये उपयोग करें ।
सोशल मीडिया पर रहो लेकिन अच्छे दोस्तों के साथ ।
एक समाज-सुधारक के रूप में कवि की नीयत निर्विवाद रूप से पवित्र है। वे नई पीढ़ी को भटकाव से बचाना चाहते हैं और पौराणिक कथाओं को आधुनिक संदर्भ देना चाहते हैं। एक आलोचक होने के नाते मैं इसे घोर 'शिल्प-दोष' और 'रस-भंग' की संज्ञा दूँगा। काव्य का उद्देश्य उपदेश देना अवश्य होता है, परंतु वह उपदेश शक्कर में लिपटी कुनैन की तरह 'कान्ता-सम्मित' होना चाहिए। भगवान की दिव्य रासलीला या कालिय दमन के आनंद में डूबे पाठक को अचानक "मोबाईल का उपयोग" या "तनाव कम करें" जैसे नीरस और गद्यात्मक वाक्यों का थपेड़ा मारना काव्य के साधारणीकरण (Universalization) को नष्ट कर देता है। यह ऐसा है मानो किसी शास्त्रीय संगीत के मध्य में कोई समाचार पढ़ने लगे। कविता को नीति-शास्त्र की पाठ्यपुस्तक बनाने का यह प्रयास साहित्यिक दृष्टि से सर्वथा अनुचित और काव्य-प्रवाह के लिए घातक है।
जगदीश शर्मा 'सहज' द्वारा रचित 'श्रीकृष्ण की अद्भुत बाल लीलाएं' आस्था और साहित्य का एक मिश्रित आलेख है। इस कृति की सबसे बड़ी उपलब्धि इसकी सरलता और जन-सामान्य तक पहुँचने की क्षमता है। कवि ने विभिन्न लीलाओं का चयन बहुत सूझ-बूझ के साथ किया है, जिससे कृष्ण का संपूर्ण बाल-चरित्र उद्घाटित होता है। छंदों की विविधता (हरिगीतिका, सवैया, घनाक्षरी, वसंत तिलका) कवि के भाषा-अधिकार और शास्त्रीय ज्ञान को प्रमाणित करती है। भक्ति-भाव, विशेषकर नन्दोत्सव और चीरहरण प्रसंगों में, अकृत्रिम और निर्मल है, जो सहृदय पाठक के अंतर्मन को स्पंदित करता है।
कृति की प्रमुख सीमा इसका 'कथ्य' पर अत्यधिक निर्भर होना और 'शिल्प' के प्रति कहीं-कहीं बरती गई असावधानी है। शब्दों की कांट-छांट और जबरन तुकबंदी कई स्थानों पर काव्यात्मक लालित्य को कम करती है। सबसे बड़ी त्रुटि कवि द्वारा पन्नों के अंत में दिए गए सीधे, सपाट और नितांत आधुनिक उपदेश हैं, जो पौराणिक आभामंडल को खंडित करते हैं। यदि कवि इन उपदेशों को कविताओं के भीतर प्रतीकों और बिंबों के माध्यम से गूंधते, तो कृति का साहित्यिक मूल्य कहीं अधिक होता है।
इन सीमाओं के बावजूद, समकालीन हिंदी साहित्य में जहाँ पाश्चात्य अनुकरण और विमर्शों का शोर है, वहाँ यह पुस्तक एक शीतल जलधारा के समान है। यह उस खोती हुई परंपरा का पुनर्जागरण है जहाँ साहित्य का उद्देश्य केवल बौद्धिक व्यायाम नहीं, अपितु आत्मा का परिष्कार था। जगदीश शर्मा 'सहज' जी की यह पुस्तक मंदिरों, सत्संगों और धर्म-प्राण पाठकों के लिए एक बहुमूल्य निधि है। साहित्यिक आलोचक के रूप में मेरा मत है कि यह कृति अपने भाषाई और शैल्पिक दोषों के बावजूद, अपने उदात्त भाव-सौंदर्य और निष्कपट ईश-वंदना के कारण समकालीन धार्मिक साहित्य में अपना एक विशिष्ट स्थान सुरक्षित करती है।
- आचार्य प्रताप
कृति समीक्षा हेतु आभार आदरणीय प्रताप जी !💐सुन्दर समीक्षा
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