प्रचलन महाराज की जय!
आजकल भाषा बड़ी लोकतांत्रिक हो गई है। जो जितनी बार बोला जाए, वही उतनी शीघ्र "सही" घोषित हो जाता है। व्याकरण बेचारा किसी पुराने पीपल के नीचे बैठा अपने पन्ने उलटता रहता है और समाज उसके सामने से यह कहते हुए निकल जाता है— "बाबा, अब आपका समय गया। अब तो प्रचलन ही प्रमाण है।"
मुझे एक दिन लगा कि क्यों न व्याकरणाचार्य का हालचाल पूछ लिया जाए। पहुँचा तो देखा, वे धूल झाड़ते हुए केंद्रीय हिंदी निदेशालय की मानक हिंदी वर्तनी और राजभाषा विभाग के निर्देशों को सहला रहे थे। पास ही मानक हिंदी शब्दकोश और ऑक्सफोर्ड हिंदी-अंग्रेज़ी शब्दकोश ऐसे पड़े थे जैसे किसी वृद्धाश्रम में बैठे पुराने गुरुजन, जिनसे मिलने अब कोई शिष्य नहीं आता। मैंने पूछा— "गुरुदेव, उदास क्यों हैं?"
वे मुस्कराए। बोले— "अब मेरे निर्णय पुस्तकों से नहीं, मोबाइल के कुंजीपटल से होते हैं। जो अंगूठा लिख दे, वही भाषा का संविधान बन जाता है।"
उधर समाज का दृश्य भी बड़ा मनोरम है। क्यों को क्यूँ बनाकर लोग ऐसे प्रसन्न हैं मानो दो अक्षर बचाकर राष्ट्र का आर्थिक भार हल्का कर दिया हो। लिए ने अपना चंद्रबिंदु नहीं, अपना स्वरूप खो दिया और लिये बन बैठा। चाहिए को चाहिये, कीजिए को कीजिये, दीजिए को दीजिये, आइए को आईये, जाइए को जाइये, बताइए को बताईये बना देने से लोगों को लगता है कि उन्होंने हिंदी का आधुनिकीकरण कर दिया है। मैं का माथा झुकाकर मै, में का अनुस्वार हटाकर मे, नहीं का चंद्रबिंदु उड़ाकर नही, हूँ को हुं, यहीं को यहीँ और वहीं को वहीँ बना दिया गया। भाषा सोचती रह गई— "अरे भाई, मेरा अपराध क्या था?"
अब तो संबंध भी बदल गए हैं। मुझे ने धीरे-धीरे अपना परिचय खो दिया और मेरे को बन गया। तुम्हें तथा तुझे ने भी हार मान ली; अब तेरे को ही सम्मान मिल रहा है। इसे और उसे भी चैन कहाँ! वे इसके को और उसके को बनकर घूम रहे हैं। लगता है, शब्द नहीं, पंचायत का चुनाव लड़ रहे हों— जो अधिक मत ले आए, वही विजयी।
इतने पर भी संतोष कहाँ! अब चर्चा यह भी है कि "छह" लिखें या "छः"। चर्चा होना अच्छी बात है, पर चर्चा का निष्कर्ष यदि शोध, व्याकरण और प्रामाणिक शब्दकोशों के स्थान पर टिप्पणी-पट्टिका के विद्वानों से निकले, तो फिर कल कोई यह भी सिद्ध कर देगा कि वर्णमाला में जितने अक्षर मोबाइल में समा जाएँ, उतने ही पर्याप्त हैं।
किसी सज्जन ने बड़ी गंभीरता से कहा— "साहित्य को समाज के पीछे चलना चाहिए।" मैंने कहा— "निश्चय ही चलना चाहिए, पर आँखों पर पट्टी बाँधकर नहीं।" यदि समाज में प्रचलन ही अंतिम प्रमाण है, तो फिर विद्यालयों में व्याकरण की पुस्तकें हटाकर उनकी जगह सामाजिक माध्यमों की टिप्पणियाँ रख दीजिए। परीक्षाओं में प्रश्न पूछिए— "सबसे अधिक चलने वाली वर्तनी कौन-सी है?" और उत्तर लिखिए— "जो सबसे अधिक दिखाई दे, वही सही।"
तब न भाषाविज्ञान की आवश्यकता बचेगी, न व्याकरण की, न प्रामाणिक शब्दकोशों की और न साहित्य की। सबका एक ही विभाग बना दीजिए— "लोकप्रियता मंत्रालय।" वहाँ नियम भी सरल होगा— "जो जितना प्रचलित, वही उतना प्रमाणित।"
पर भाषा इतनी भोली नहीं है। वह जानती है कि नदी का जल बहता रहता है, पर उसका तट बना रहे तभी नदी पहचानी जाती है। यदि तट ही मिट जाएँ, तो जल केवल बाढ़ बन जाता है। भाषा का व्याकरण, उसकी मानक वर्तनी और उसकी साहित्यिक परंपरा वही तट हैं, जिनके कारण अभिव्यक्ति सभ्यता का रूप धारण करती है।
केंद्रीय हिंदी निदेशालय, राजभाषा विभाग, प्रामाणिक हिंदी व्याकरण, मानक हिंदी शब्दकोश तथा प्रतिष्ठित साहित्यकारों की दीर्घ परंपरा किसी शब्द को इसलिए स्वीकार नहीं करती कि वह अधिक बोला जा रहा है; वे उसे इसलिए स्वीकार करते हैं कि वह भाषा की संरचना, व्याकरणिक सिद्धांतों और साहित्यिक अनुशासन की कसौटी पर खरा उतरता है।
इसलिए अगली बार यदि कोई कहे— "भाई साहब! सब लोग ऐसा ही लिखते हैं।" तो मुस्कराकर इतना ही कह दीजिए— "भैया, सब लोग खेत की मेड़ पर चलें तो वह राजमार्ग नहीं हो जाती। बैलगाड़ी के पहिए की लीक और राजपथ में अंतर होता है।"
भाषा भी यही कहती है— लोकप्रियता से ताली मिल सकती है, पर प्रमाण नहीं। प्रमाण आज भी व्याकरण देता है, प्रामाणिक शब्दकोश देते हैं, भाषावैज्ञानिक परंपरा देती है और साहित्य अपनी गंभीर स्वीकृति से देता है। प्रचलन हवा है, किंतु मानक भाषा वटवृक्ष है; हवा प्रतिदिन बदलती है, वटवृक्ष पीढ़ियों तक खड़ा रहता है।
आचार्य प्रताप
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