जंगल दर्पण : आशीष पाण्डेय ज़िद्दी

समीक्षात्मक आलेख: प्रकृति, पर्यावरण और मानवीय संवेदना का प्रामाणिक दस्तावेज़ - 'जंगल दर्पण'
समीक्षक: आचार्य प्रताप
पुस्तक-परिचय
पुस्तक का नाम: जंगल दर्पण
लेखक: आशीष कुमार पाण्डेय 'जिद्दी'
विधा: काव्य-संग्रह
प्रकाशक: दक्षिण पन्ना वनमण्डल, मध्य प्रदेश वन विभाग
कुल पृष्ठ: 84
प्रकाशन वर्ष: अप्राप्य (उल्लेखित नहीं)
ISBN: अप्राप्य (विभागीय प्रकाशन)
मूल्य: निःशुल्क (प्रायोजित प्रकाशन)


मैं, आचार्य प्रताप, समकालीन हिंदी साहित्य में पारिस्थितिकीय विमर्श (इको-क्रिटिसिज्म) के अंतर्गत रचित इस अनूठी कृति 'जंगल दर्पण' का आलोचनात्मक अनुशीलन प्रस्तुत कर रहा हूँ। हिंदी साहित्य में प्रकृति का चित्रण छायावाद से लेकर आज तक विविध रूपों में हुआ है, किंतु एक वनरक्षक द्वारा वर्दी के भीतर धड़कते कवि-हृदय से रचित यह कृति अपने भोगे हुए यथार्थ और प्रत्यक्ष अनुभवों के कारण विशिष्ट बन जाती है। आशीष कुमार पाण्डेय 'जिद्दी' का यह संकलन केवल कविताओं का पुलिंदा नहीं है, बल्कि जल, जंगल, वन्यजीव और मानवीय स्वार्थ के बीच चल रहे द्वंद्व का एक शोधपरक और जीवंत दस्तावेज़ है। इस समीक्षा में मैं संकलन की प्रत्येक कविता के कथ्य, शिल्प, भाषा, भाव-सौंदर्य और दार्शनिक दृष्टि का तटस्थ और गहन विश्लेषण प्रस्तुत करूँगा।

कृति का आरंभ 'पन्ना के जंगलों का परिचय' कविता से होता है। कवि ने क्षेत्रीय जैव-विविधता का प्रामाणिक खाका खींचते हुए लिखा है-

"पन्ना के जंगल की महिमा, सुनो तुम्हें बतलाते हैं।
पावन नदियां कल-कल बहती, झरने शोर मचाते हैं।।" 
तथा 
"हीरा भी पन्ना में निकले, बाघ यहां की शान बनें।
जंगल के हर दृश्य मनोरम, सबका मन हर्षाते हैं।।"

 इन पंक्तियों में पन्ना की भौगोलिक और प्राकृतिक संपदा का अभिधात्मक वर्णन है। यहाँ कवि का उद्देश्य काव्यात्मक चमत्कार उत्पन्न करना नहीं, बल्कि परिचयात्मक बिंब प्रस्तुत करना है। कविता में सतावर, हड़जोड़, कुल्लू, शीशम जैसी वनस्पतियों का उल्लेख इसे एक वानस्पतिक शोध-पत्र जैसी तथ्यात्मकता प्रदान करता है, यद्यपि इस कारण कविता में प्रतीकात्मकता और लाक्षणिकता का अभाव खटकता है।
'अनुभूति कार्यक्रम की रुपरेखा एवं उद्देश्य' तथा 

'आओ बच्चों चलें घूमने जंगल में हम तुम एक बार'

कविताएँ पूर्णतः उपदेशात्मक और बाल-मनोविज्ञान पर आधारित हैं।

 "बच्चों को जंगल ले जाएं।
जीव जंतु झरने दिखलाएं।।" 

जैसी पंक्तियों में भाषा अत्यंत सरल, सहज और प्रवाहपूर्ण है। यहाँ कवि का सामाजिक सरोकार स्पष्ट है—भावी पीढ़ी को प्रकृति से जोड़ना। शिल्प की दृष्टि से ये तुकांत रचनाएँ हैं, जिनमें बाल-गीत की शैली अपनाई गई है।

'वनकर्मियों का अपने कर्तव्यों के प्रति समर्पण', 'रक्षण वन का कर रहे' और 'जंगल की रखवाली करना, यह कर्तव्य हमारा है' कविताओं में एक वनरक्षक के आत्मसंघर्ष और गर्व की व्यंजना हुई है।

 "रात दिवस तज नींद चैन सब, 
जंगल-जंगल भटके हम,
वनरक्षक हम कहलाते हैं,
 तन मन वन पे वारा है।।"

पंक्तियों में वीर रस और उत्साह का भाव मुखर हुआ है। यहाँ 'तन मन वन पे वारा है' में अनुप्रास अलंकार की छटा है। कवि ने वन्यजीवों को अपना परिवार मानकर जो मानवीय संवेदना प्रकट की है, वह स्तुत्य है। "कभी-कभी ये पशु भी हमको, मानवता सिखलाते हैं" पंक्ति के माध्यम से कवि ने मानव के गिरते नैतिक स्तर और पशुओं की निश्छल प्रकृति के मध्य एक दार्शनिक तुलना प्रस्तुत की है।

'वनों में आग लगने से होने वाली हानियां' कविता करुण रस से ओतप्रोत है। कवि का हृदय दावानल से नष्ट होती संपदा को देखकर द्रवित हो उठता है। 

"राख हो जाती है प्राकृतिक उर्वरक,
सूखे तरु में बने जल रहे घोंसले ।।"

इन पंक्तियों में 'जल रहे घोंसले' का बिंब इतना सजीव और मार्मिक है कि पाठक सिहर उठता है। यहाँ कवि की दृष्टि केवल पेड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह उस संपूर्ण पारिस्थितिक तंत्र (इकोसिस्टम) के प्रति चिंतित है जो एक आग में भस्म हो जाता है। यद्यपि, शिल्प के स्तर पर यहाँ छंदात्मक अनुशासन में थोड़ी शिथिलता दिखाई देती है, शब्दों का चयन अधिक काव्यात्मक हो सकता था।

'प्रकृति एवं पर्यावरण दोहन के दुष्प्रभाव' और 'बहे नयन से नीर' में कवि ने मानवीकरण अलंकार का सुंदर प्रयोग किया है।
 "देखो जननी प्रकृति हमारी।
अश्रु बहाती है बेचारी।।" 
और 
"बहे नयन से नीर, देख जंगल की काया।
काटे वृक्ष अनेक, दया का भाव न आया।।"

प्रकृति को जननी के रूप में चित्रित कर कवि ने भारतीय दर्शन की उस मूल भावना को रेखांकित किया है जहाँ पृथ्वी को माता माना गया है (माता भूमिः पुत्रो अहम् पृथिव्याः)। इन कविताओं में मानवीय स्वार्थ और अंधाधुंध कटाई के विरुद्ध तीव्र आक्रोश (रौद्र रस) भी परोक्ष रूप से विद्यमान है।
संकलन की एक अत्यंत शोधपरक और ऐतिहासिक कविता 'वत्सला हथिनी का जीवन परिचय' है। 
"नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ड में, 
हथिनी आयु दर्ज सौ पार। 
दुनिया की सबसे बुजुर्ग ये, 
हथिनी गई छोड़ संसार ।।"
 यह कविता किसी वन्यजीव की जीवनी को काव्य रूप में प्रस्तुत करने का एक विरल और अभिनव प्रयास है। केरल से मध्य प्रदेश तक वत्सला की यात्रा और पन्ना राष्ट्रीय उद्यान में उसके योगदान का यह काव्यात्मक दस्तावेजीकरण हिंदी साहित्य में सर्वथा नवीन है। हालांकि, आलोचनात्मक दृष्टि से देखें तो यह रचना कविता से अधिक पद्यबद्ध रिपोर्ताज प्रतीत होती है; इसमें गद्यात्मकता का प्रभाव आ गया है।
'वन्यजीव संरक्षण संकल्प', 'धरती का श्रृंगार', 'मनोहारी प्रकृति' और 'प्रकृति के उपहार' कविताओं में कवि ने प्रकृति के सात्विक और मनोरम रूप का चित्रण किया है।

"हरी-भरी वसुधा लगे,
दुल्हन सा परिधान।
हरियाली बिखरी जहाँ,
भूमि लगे वरदान।।"

 यहाँ उपमा अलंकार (दुल्हन सा परिधान) का प्रयोग अत्यंत सटीक है। श्रृंगार रस (प्रकृति-श्रृंगार) की निष्पत्ति इन पंक्तियों में सहजता से हुई है। 'दुल्हन सी सजी धरती' में भी इसी भाव-सौंदर्य का विस्तार है, जहाँ मानवीकरण और दृश्य बिंब का सुंदर समन्वय है।

इसके विपरीत, 'प्रकृति का क्रोध', 'प्रकृति की वेदना', और 'कराहती प्रकृति' कविताओं में भयानक और करुण रस का प्राधान्य है। "ढह रहे घर लोग बेघर डूबते प्राणी सभी। ये प्रलय है या प्रकृति का क्रोधमय व्यवहार है।।"। इन पंक्तियों में प्राकृतिक आपदाओं (बाढ़, सुनामी) का यथार्थवादी चित्रण है। कवि आधुनिक सभ्यता पर तीखा व्यंग्य करता है:

"लोग ज़िद्दी सभी आज बेशर्म हैं।
माँ के सीने पे खंज़र चलाने लगे।।"

यह रूपक अत्यंत सशक्त है। 'खंजर चलाना' यहाँ उत्खनन, वनों की कटाई और प्रदूषण का प्रतीक है। भाषा में तल्खी है जो विषय की गंभीरता के अनुकूल है।

'वसुधा का प्यार' और 'प्रकृति का सावन' कविताओं में गीति-काव्य की शैली परिलक्षित होती है। सावन का वर्णन करते हुए कवि लोक-परंपरा की ओर मुड़ता है।

"रिमझिम बूँदे प्यास जगाती।
 साजन की यादें तड़पाती।।"
तथा
"गोरी बैठी नदी किनारे।
अपने पिय की राह निहारे ।।"

यहाँ विप्रलंभ श्रृंगार (वियोग) का पुट है। प्रकृति यहाँ उद्दीपन विभाव के रूप में उपस्थित है। लोक-संस्कृति, नागपंचमी और रक्षाबंधन के त्योहारों का प्रकृति के साथ जो अंतर्संबंध कवि ने स्थापित किया है, वह उसकी गहरी सामाजिक और सांस्कृतिक समझ का परिचायक है।

'नदियों का संदेश', 'झरने का जीवन' और 'कौन प्रकृति से बढ़कर दानी' में दार्शनिक दृष्टि प्रधान है।

"परहित परसेवा का सबको,
सरिता पाठ पढ़ाती है। 
जग कल्याण करो हे मानव,
यही हमें सिखलाती है।।"
सरिता (नदी) को परोपकार के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत कर कवि ने कबीर और रहीम की नीतिकाव्य परंपरा को आगे बढ़ाया है। यहाँ भाषा शांत रस से युक्त और प्रांजल है।

'प्रकृति दोहन के दुष्परिणाम', 'प्रकृति के यक्ष प्रश्न', 'स्वार्थ हित काटे जंगल', और 'मानव लोभ के परिणाम' कविताएँ समकालीन वैश्विक संकट (क्लाइमेट चेंज) पर सीधा प्रहार करती हैं। 
"बढ़ती जाए अब ये गर्मी, कोई कारण तो बतलाय।
मत काटो तुम जंगल लोगों, कोई तो यह पाठ पढ़ाय॥"
 
प्रश्नवाचक शैली में लिखी गई ये पंक्तियाँ मनुष्य की चेतना को झकझोरती हैं।

"बनके पत्थर गिर रहा, अंबर से जल रूप।
गर्मी ऋतु बरसात हो, बरसा ऋतु में धूप॥"

ऋतु चक्र के इस विपर्यय का वर्णन करते हुए कवि ने विरोधाभास और विसंगति का जो चित्रण किया है, वह वैज्ञानिक यथार्थ पर आधारित है।

'कृषकों को संदेश', 'हर मानव अब माली हो', 'पेड़ लगाए कौन', और 'वृक्षारोपण ही पर्यावरण संतुलन का आधार' नितांत व्यावहारिक और संदेशपरक रचनाएँ हैं। 

"अपने खेतों की मेड़ों पर, पौधे अगर लगाओगे।
पांच साल तक पौधों का यदि, संरक्षण कर पाओगे॥"

इन कविताओं का शिल्प बहुत साधारण है, इनमें काव्यात्मक कसावट और लाक्षणिकता की कमी है। ये कविताएँ नारे (स्लोगन) के अधिक निकट प्रतीत होती हैं, किंतु जन-जागरूकता के उद्देश्य से रची जाने के कारण इनकी सामाजिक उपयोगिता असंदिग्ध है।

'गौरैया संरक्षण' एक अत्यंत मार्मिक कविता है।

"फुदके घर-घर में नही, गौरैया अब लुप्त।
छप्पर में नहि घोसले, लगता आँगन सुप्त॥"

 आंगन के सूनेपन का यह श्रव्य और दृश्य बिंब शहरीकरण की अंधी दौड़ पर एक करारी चोट है। यहाँ अनुप्रास और पद-मैत्री का अच्छा प्रयोग हुआ है। इसी प्रकार 'सर्पों का संरक्षण एवं सर्प दंश से बचाव' कविता एक वैज्ञानिक मार्गदर्शिका के रूप में सामने आती है।

"त्याग दीजिए सोच पुरानी,
सर्प मारना अब छोड़ो।
खाद्य श्रृंखला की कड़ियों को,
हे मानव अब मत तोड़ो॥

यद्यपि यह गद्यवत है और काव्य-गुणों से क्षीण है, किंतु अंधविश्वासों पर प्रहार करने की दृष्टि से यह ग्रामीण अंचलों के लिए बहुमूल्य है।

कवि ने दोहा छंद का भी सफल प्रयोग किया है। 'जल संरक्षण के दोहे', 'आषाढ़ के दोहे' और 'पर्यावरण संरक्षण के दोहे' इसी कोटि में आते हैं। 

"जल संरक्षण कीजिये,
जल है सोम समान।
जल बिन जीवन शून्य है,
रहे बात यह ध्यान।।"

यद्यपि कई स्थानों पर मात्राओं की गणना और यति-भंग का दोष दृष्टिगोचर होता है, तथापि भावों की स्पष्टता और संप्रेषणीयता में कोई बाधा नहीं आती।

'सुहाना मौसम बरसात का', 'प्राकृतिक सौंदर्य' और 'हरियाली श्रृंगार है' में पुनः कवि का प्रकृति-प्रेमी हृदय मुखर हुआ है। "मिट्टी से आने लगी, चन्दन जैसी बास।। नदियां पोखर भर गए, ताल तलैया कूप।"। 'चन्दन जैसी बास' में उपमा अलंकार और सोंधी सुगंध का घ्राण बिंब (Olfactory Image) अत्यंत प्रभावकारी है।

'वन संरक्षण का संकल्प', 'वृक्षों का महत्तव', 'प्रकृति संरक्षण का प्रयास', 'करुण पुकार धरा की', 'जीवन शैली में बदलाव', और 'वर्तमान दोहन से भविष्य की कल्पना' लंबी विवरणात्मक कविताएँ हैं। भविष्य की भयावहता का चित्रण करते हुए कवि लिखता है: 

"दो हज़ार यह तीस ईस्वी,
नए रूप में आनी है।
प्रकृति हमारी रोएगी यह,
पूर्ण विदित सच वानी है।।"

यह एक भविष्योन्मुखी चेतावनी है। कवि का विज़न स्पष्ट है, वह केवल वर्तमान का रोना नहीं रोता, बल्कि भविष्य के खतरे को भाँपकर समाज को सचेत करता है।
'वन विभाग के वानिकी कार्य', 'ग्रामीणों के उत्थान हेतु कार्य', 'जन सहयोग एवं जागरुकता से वन सुरक्षा', और 'जन जागरुकता हेतु संदेश' कविताएँ विभागीय कार्यों और जन-संपर्क का पद्यात्मक विवरण हैं।

"निर्धारित जो माप उसी पर,
गड्ढे हम खुदवाते हैं।
गड्ढों में फिर गोबर मिट्टी
खाद मिला डलवाते है।।"

आलोचनात्मक प्रतिमानों पर कसने पर ये रचनाएँ काव्य की परिधि से बाहर जाकर एक सरकारी नियमावली या कार्य-योजना का रूप ले लेती हैं। इनमें कलात्मकता, रस और बिंब का नितांत अभाव है। फिर भी, "जंगल दर्पण" के समग्र उद्देश्य (वन-संरक्षण का व्यावहारिक ज्ञान देना) को देखते हुए इन्हें कृति का एक आवश्यक अंग माना जा सकता है।
'पंछियों के पलायन में मानव का दोष' और 'पंछियों की वेदना' कविताओं में पक्षियों का मानवीकरण कर उनके दृष्टिकोण से मानवीय सभ्यता की आलोचना की गई है।

"हम परिंदे हैं अब हमें उड़ जाना चाहिए,
किसी घोषले की ओर मुड़ जाना चाहिए।
ये इंसान नहीं छोडेंगे हमारे आशियाने को..."।

यहाँ विस्थापन का दर्द है। विकास के नाम पर जो विनाश हो रहा है, उस पर पक्षियों की यह टिप्पणी मनुष्य के अहंकार पर सीधा आघात करती है।

"एक ही घर में दीवारें खींच लो।
पेड़ कम हैं हम परिंदे हैं बहुत,
कुछ इन्हीं से चाल चलना सीख लो।।"

 यह पंक्तियाँ संयुक्त परिवारों के टूटने और मानव के संकुचित होते हृदय पर तीखा सामाजिक व्यंग्य हैं।

'मत कर नाश वनों का प्राणी', 'वन का करो विकास', और 'वन्यजीव संरक्षण गीत' लोक-धुनों और संगीतात्मकता से युक्त हैं। 
"मत कर नाश वनों का प्राणी, 
बाद समय पछतायेगा। 
जल भी पाना दूभर होगा, 
प्यासा ही मर जायेगा।"

 इन रचनाओं में गेयता है, जो इन्हें जन-सामान्य के बीच गाने और नुक्कड़ नाटकों आदि में प्रयोग करने के लिए सर्वथा उपयुक्त बनाती है।

'काव्यमय परिचय' में कवि ने अपने जीवन-संघर्ष और साहित्यिक यात्रा को स्वर दिया है।
 "रीवा विंध्य क्षेत्र की धरती, 
त्योंथर लगती है तहसील।"
 से लेकर 
"डूब नहीं जाए सागर में,
मित्रों मिलकर लेना थाम।।"

 तक, कवि की विनम्रता और अपनी जड़ों से जुड़ाव स्पष्ट झलकता है।
निष्कर्षतः, एक आलोचक के रूप में मेरा यह स्पष्ट मत है कि आशीष कुमार पाण्डेय 'जिद्दी' का यह काव्य-संग्रह 'जंगल दर्पण' शिल्प और भाषा के शास्त्रीय मानदंडों (जैसे सूक्ष्म लाक्षणिकता, जटिल बिंब-विधान और कठोर छंद-अनुशासन) पर भले ही यत्र-तत्र शिथिल प्रतीत हो, परंतु अपनी विषयवस्तु, प्रामाणिकता और उद्देश्य की पवित्रता में यह सर्वथा अद्वितीय है। जहाँ समकालीन हिंदी कविता बंद वातानुकूलित कमरों में बैठकर प्रकृति के बौद्धिक विमर्श रच रही है, वहीं यह कृति जंगल की खाक छानते, दावानल बुझाते और वन्यजीवों को बचाते हुए पसीने से भीगे हाथों द्वारा रची गई है।

इस कृति की सबसे बड़ी उपलब्धि इसका 'जीवांत यथार्थ' और 'सकारात्मक सक्रियता' है। यह केवल समस्याएँ नहीं गिनाती, बल्कि समाधान भी सुझाती है। पर्यावरण असंतुलन, ग्लोबल वार्मिंग, और वन्यजीव-विलुप्ति जैसे गंभीर वैश्विक संकटों को जिस सरल, सुबोध और स्थानीय भाषा में आम जनमानस तक पहुँचाने का प्रयास किया गया है, वह इस पुस्तक का सर्वोच्च साहित्यिक और सामाजिक मूल्य है। समकालीन हिंदी के पारिस्थितिकीय विमर्श (इको-लिटरेचर) में 'जंगल दर्पण' को एक आधारभूत संदर्भ-ग्रंथ और जन-जागरण के एक सशक्त माध्यम के रूप में अनिवार्य रूप से रेखांकित किया जाना चाहिए।


आचार्य प्रताप
Achary Pratap

समालोचक , संपादक तथा पत्रकार प्रबंध निदेशक अक्षरवाणी साप्ताहिक संस्कृत समाचार पत्र

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