संसद : जनता के धन से चलता मौन का महोत्सव

संसद : जनता के धन से चलता मौन का महोत्सव

लोकतंत्र को जनमानस की आकांक्षाओं का मंदिर कहा जाता है। यहाँ जनता अपने प्रतिनिधियों को भेजती है, इस आशा से कि वे देश की समस्याओं पर विचार करेंगे, जनजीवन की कठिनाइयों का उपाय खोजेंगे और शासन से प्रश्न करेंगे। परंतु हमारे लोकतंत्र का एक अद्भुत दृश्य यह है कि मंदिर बना रहता है, दीपक जलते रहते हैं, पुजारी भी उपस्थित रहते हैं और फिर भी पूजा स्थगित हो जाती है।

कारण? किसी को घंटी की ध्वनि पसंद नहीं आई!

संसद का सत्र आरंभ होता है। जनता सोचती है—अब महँगाई, शिक्षा, बेरोजगारी, कृषक, सीमा, उद्योग और साधारण नागरिक के जीवन पर चर्चा होगी। तभी किसी विषय पर मतभेद होता है और देखते-देखते सदन की कार्यवाही ठप। जनता दूर बैठी सोचती रह जाती है कि जिनके हाथ में प्रश्न रखने का अवसर था, उन्होंने प्रश्न ही रोक दिया।

यह कुछ वैसा ही है जैसे गाँव में कुआँ हो, रस्सी हो, बाल्टी हो, प्यासे लोग खड़े हों और कुएँ के मालिक आपस में इस बात पर लड़ते रहें कि पहले बाल्टी कौन डालेगा।

संसद का एक-एक क्षण जनता के धन से चलता है। यह धन किसी राजा के खजाने से नहीं आता। इसमें उस किसान का पसीना मिला है जिसने धूप में खेत जोता, उस श्रमिक की हथेली की कठोरता मिली है जिसने दिन-रात श्रम किया, उस छोटे दुकानदार की कमाई मिली है जिसने वर्षा में भी दुकान खोली और उस कर्मचारी की आय मिली है जिसकी वेतन-पर्ची से कर काट लिया गया।

अर्थात संसद में व्यर्थ गया समय केवल घड़ी की सुई नहीं रोकता, जनता की गाढ़ी कमाई भी रोक देता है।

विचित्र बात यह है कि हमारे यहाँ काम रोकना भी कभी-कभी काम करने का प्रमाण समझ लिया जाता है। कोई कहता है—हमने सरकार को घेर दिया। दूसरा कहता है—हमने सदन नहीं चलने दिया। जनता पूछती है—भैया, चलाया किसलिए था?

विपक्ष का धर्म प्रश्न करना है, सरकार का धर्म उत्तर देना। विपक्ष यदि प्रश्न ही न पूछे और सरकार यदि प्रश्न से बचती ही रहे, तो लोकतंत्र की गाड़ी के दोनों पहिए एक-दूसरे को देखकर प्रसन्न होते रहेंगे और गाड़ी वहीं खड़ी रहेगी।

बघेली में कहें तो—“गाड़ी के पहिया दुई, फेर चलै न बाट!”
कारण यह कि एक पहिया कहता है, “पहिले तू चल”; दूसरा कहता है, “नइ, पहिले तू।”

लोकतंत्र में मतभेद आवश्यक हैं। बिना मतभेद के संसद सभा कम और विवाह-मंडप अधिक लगने लगेगी। किंतु मतभेद का अर्थ यह तो नहीं कि संवाद का द्वार ही बंद कर दिया जाए। असहमति लोकतंत्र की शक्ति है, किंतु लगातार अवरोध उसकी दुर्बलता बन जाता है।

एक काल्पनिक गाँव की कल्पना कीजिए। वहाँ पंचायत में नाली बननी है। सरपंच और पंचों में मतभेद हो गया। बैठक बुलाई गई। कोई बोलने को तैयार नहीं। कोई कुर्सी छोड़कर बाहर चला गया। कोई बैठक स्थगित करवा गया। शाम को ग्रामीण पूछते हैं—“नाली कब बनेगी?” उत्तर मिलता है—“बैठक सफल रही, क्योंकि हमने अपना विरोध दर्ज करा दिया।”

गाँव का बच्चा भी पूछ देगा—“नाली में पानी आएगा या केवल विरोध बहेगा?”

संसद भी अंततः जनता की पंचायत ही है, बस भवन बड़ा है और खर्च भी बड़ा। वहाँ शोर से अधिक संवाद चाहिए, आरोप से अधिक तर्क चाहिए और राजनीतिक विजय से अधिक राष्ट्रीय हित।

सरकार और विपक्ष दोनों को यह समझना होगा कि संसद किसी दल की जागीर नहीं, जनता की धरोहर है। सत्ता पक्ष यदि अहंकार में प्रश्नों से आँख चुराए और विपक्ष यदि आवेश में सदन को ही रोक दे, तो दोनों मिलकर उस जनता को निराश करते हैं जिसके नाम पर राजनीति की जाती है।

जनता ने प्रतिनिधि इसलिए नहीं चुने कि वे सदन की कुर्सियाँ भरें; इसलिए चुने हैं कि वे देश की समस्याओं पर विचार करें।

संसद चलना चाहिए—केवल घंटों की गणना के लिए नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा को जीवित रखने के लिए। प्रश्न हों, प्रतिप्रश्न हों, असहमति हो, तर्क हो, तीखी बहस हो; पर अंततः निर्णय की ओर कदम बढ़ें।

क्योंकि जनता अब इतना अवश्य पूछ सकती है—“हमरे पसीना के पैसा से चलत सभा में, काम भी होई कि खाली तकरार?”

यह प्रश्न सरल है, किंतु लोकतंत्र की पूरी परीक्षा इसी में छिपी है।

आचार्य प्रताप 

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Achary Pratap

समालोचक , संपादक तथा पत्रकार प्रबंध निदेशक अक्षरवाणी साप्ताहिक संस्कृत समाचार पत्र

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