मेरा जीवन-परिचय

 

मेरा जीवन-परिचय : शब्दों की यात्रा

मैं ‘आचार्य प्रताप’—एक ऐसा नाम, जिसे मैंने किसी उपाधि के रूप में नहीं, बल्कि भाषा, साहित्य और शिक्षा के प्रति अपनी साधना के साथ अर्जित किया है। मेरा जीवन किसी एक निश्चित पथ पर चलने वाली यात्रा नहीं रहा। समय ने मुझे कभी तकनीक की दुनिया में पहुँचाया, कभी अध्यापन के कक्ष में बैठाया, कभी साहित्य की चौपाल तक ले गया और कभी शिक्षा के प्रशासनिक दायित्वों के बीच खड़ा किया। इन सभी पड़ावों के बीच यदि कोई सूत्र निरंतर मेरे साथ रहा, तो वह है—ज्ञान की जिज्ञासा, हिंदी के प्रति अनुराग और साहित्य के प्रति समर्पण।

जन्म और पारिवारिक संस्कार: मेरा जन्म 20 जनवरी 1989 को मध्य प्रदेश के सतना जनपद के कोटर ग्राम  में हुआ। मेरे पिता श्री नरेन्द्र सिंह कृषक रहे और मेरी माता श्रीमती प्रतिमा सिंह गृहिणी। मेरा बचपन एक सामान्य ग्रामीण कृषक परिवार के उस परिवेश में बीता, जहाँ जीवन को समझने के लिए बहुत बड़े ग्रंथों की आवश्यकता नहीं थी। खेत, श्रम, परिवार, संस्कार और लोकजीवन ही मेरे आरंभिक शिक्षक रहे। मेरे माता-पिता ने मुझे जीवन में परिश्रम, सरलता, अनुशासन और आत्मसम्मान का महत्व समझाया। आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो अनुभव करता हूँ कि मेरे व्यक्तित्व में जो कुछ भी सहज, सरल और भारतीयता है, उसकी जड़ें उसी मिट्टी में हैं जिसमें मेरा बचपन बीता।
शिक्षा-दीक्षा: मेरी प्रारंभिक शिक्षा सरस्वती शिशु मंदिर, कोटर में हुई। मैंने वहाँ वर्ष 2003 तक अध्ययन करते हुए कक्षा अष्टम उत्तीर्ण की। संस्कारप्रधान वातावरण में मिली इस शिक्षा ने मेरे मन में भारतीय संस्कृति, भाषा और जीवन-मूल्यों के प्रति प्रारंभिक अनुराग उत्पन्न किया। इसके बाद मैंने माध्यमिक शिक्षा पूर्ण की और वर्ष 2005 में कक्षा दसवीं की परीक्षा उत्तीर्ण की। वर्ष 2008 में मैंने उच्चतर माध्यमिक शिक्षा पूर्ण की। मेरी रुचि धीरे-धीरे कंप्यूटर और तकनीक की ओर बढ़ी। इसी क्रम में मैंने बैचलर ऑफ कंप्यूटर एप्लीकेशंस (BCA) की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2011 में स्नातक की उपाधि अर्जित की। तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ भाषा के प्रति मेरा आकर्षण भी निरंतर बढ़ता रहा। और आगे मैंने हिंदी भाषा में एम.ए. तथा अंग्रेजी भाषा में एम.ए. की शिक्षा पूर्ण की। शिक्षा के क्षेत्र में अपनी समझ को और व्यापक बनाने के लिए मैंने विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन से एकीकृत शिक्षाशास्त्री–शिक्षाचार्य (B.Ed.-M.Ed. Integrated Course) का अध्ययन भी आरंभ किया। मेरी शिक्षा-यात्रा की एक सीधी रेखा नहीं रही। कंप्यूटर से भाषा, भाषा से साहित्य और साहित्य से शिक्षाशास्त्र तक पहुँचते हुए मैंने यह अनुभव किया कि ज्ञान की कोई सीमा नहीं होती; विषय बदल सकते हैं, किंतु सीखने की भूख बनी रहनी चाहिए।
हैदराबाद : जहाँ जीवन ने दिशा बदली:  मेरे जीवन की दिशा बदलने वाला एक महत्वपूर्ण पड़ाव मई 2011 में आया, जब मैं पहली बार हैदराबाद पहुँचा। मेरा उद्देश्य सॉफ्टवेयर में प्रयुक्त होने वाली प्रोग्रामिंग भाषा ‘जावा’ सीखना था। मैं तकनीक की दुनिया में अपना भविष्य तलाश रहा था। जावा का अध्ययन उस समय पूर्ण नहीं हो सका और मुझे वापस अपने शहर सतना लौटना पड़ा। लेकिन जीवन ने मुझे फिर बुलाया। फरवरी 2012 में मैं पुनः हैदराबाद आया और इस बार धीरे-धीरे यह नगर मेरे जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गया। तकनीक का ज्ञान अर्जित करते हुए मेरी दृष्टि यहाँ के भाषाई परिवेश पर भी पड़ी। मैंने देखा कि आधुनिक तकनीकी ज्ञान तो अनेक लोगों के पास है, किंतु हिंदी भाषा का गंभीर ज्ञान रखने वाले लोग अपेक्षाकृत कम हैं। इस अनुभव ने मेरे भीतर एक प्रश्न जन्म दिया—यदि अपनी भाषा के लिए कुछ किया जा सकता है, तो क्यों न उसी दिशा में अपना जीवन लगाया जाए? शायद उस समय मुझे स्वयं भी यह ज्ञात नहीं था कि यह छोटा-सा प्रश्न आगे चलकर मेरे जीवन की दिशा ही बदल देगा।

रोजगार से हिंदी-साधना तक:  मैंने कुछ विद्यालयों में हिंदी पढ़ाना आरंभ किया। प्रारंभ में यह मेरे जीवन-निर्वाह का माध्यम था, लेकिन धीरे-धीरे हिंदी मेरे लिए नौकरी से आगे बढ़कर सेवा और साधना बन गई। मैंने साईं विवेकानंद उच्च विद्यालय में लगभग एक वर्ष सेवा की। इसके बाद दा प्रोग्रेस उच्च विद्यालय में दो वर्ष और सेंट अलबन्स उच्च विद्यालय में लगभग तीन वर्षों तक हिंदी भाषा के शिक्षक के रूप में कार्य किया। कक्षा में हिंदी पढ़ाते-पढ़ाते मुझे अनुभव हुआ कि भाषा केवल व्याकरण, पाठ और परीक्षा का विषय नहीं है। भाषा मनुष्य की स्मृति है, उसकी संस्कृति है, उसके अनुभवों का दस्तावेज है और उसके हृदय की आवाज है। यही वह समय था जब मेरे भीतर का लेखक धीरे-धीरे जागने लगा।

भाषाओं की ओर मेरा विस्तार: हिंदी के अध्यापन और गंभीर साहित्य-चिंतन के समानांतर मैंने अपने ज्ञान के क्षितिज को कभी किसी एक भाषा या भौगोलिक सीमा में आबद्ध नहीं होने दिया। मेरी यह स्पष्ट मान्यता रही है कि भाषाएँ परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे की पूरक होती हैं। ​मेरी भाषाई यात्रा की नींव मातृ-बोली बघेली की सोंधी माटी और लोक-संवेदना से जुड़ी है। विंध्य अंचल की मिठास और लोक-मुहावरों ने आपके भीतर भाषा की स्वाभाविक पकड़ और अभिव्यक्ति की सहजता को गढ़ा। ​मातृभाषा बघेली के संस्कार के साथ-साथ मैंने विभिन्न भाषाओं के अध्ययन, अध्यापन और सृजन में अप्रतिम निपुणता अर्जित की:
  • ​हिंदी:  आत्मा, संस्कृति, वैचारिक चेतना और प्राथमिक साहित्यिक अभिव्यक्ति की मुख्य भाषा।
  • ​संस्कृत: देववाणी के प्रति अगाध निष्ठा; शास्त्रीय व्याकरण, छंद-शास्त्र और सनातन ज्ञान-परंपरा की आधारशिला।
  • ​अंग्रेजी: वैश्विक ज्ञान-विज्ञान, आधुनिक अकादमिक विमर्श और अंतरराष्ट्रीय संवाद में दक्षता।
  • ​फ्रांसीसी (French): विदेशी भाषाओं के लालित्य, व्याकरणिक सूक्ष्मताओं और यूरोपीय साहित्यिक विमर्श पर अधिकार।

​इस बहुआयामी भाषाई अधिकार के साथ-साथ मेरी जिज्ञासु प्रवृत्ति ने मुझको अन्य समृद्ध भाषाओं के संपर्क में भी रखा। सामाजिक संवाद और व्यावहारिक समझ को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से बोलचाल के स्तर पर उर्दू, तेलुगू तथा जर्मन (German) भाषाओं का भी उपयोगी एवं व्यावहारिक अल्प ज्ञान अर्जित किया। हैदराबाद के प्रवास ने जहाँ बोलचाल को उर्दू के नफ़ासत भरे शब्दों और तेलुगू के स्थानीय परिवेश से समृद्ध किया, वहीं यूरोपीय भाषाओं के प्रति आकर्षण ने मुझको जर्मन भाषा के व्यावहारिक पक्षों से जोड़ा। विभिन्न भाषाओं और बोलियों का यह समन्वय भाषाई दृष्टिकोण को अत्यंत व्यापक बनाता है। भाषाओं के अध्ययन ने मेरे दृष्टिकोण को व्यापक बनाया और मुझे यह समझने में सहायता दी कि भाषाएँ मनुष्यों को विभाजित नहीं करतीं; सही अर्थों में वे एक-दूसरे को समझने के मार्ग खोलती हैं।

हिंदी प्रचार सभा और उच्च अध्ययन: इसी अवधि में मुझे हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद से जुड़ने और हिंदी के विद्वानों की संगति प्राप्त करने का अवसर मिला। इस संगति ने मेरी भाषा-साधना को गंभीरता प्रदान की। मैंने हिंदी भाषा में एम.ए. तथा अंग्रेजी भाषा में एम.ए. की शिक्षा पूर्ण की। हिंदी के प्रति बढ़ती हुई मेरी जिज्ञासा ने मुझे शोध की दिशा में भी सोचने के लिए प्रेरित किया। मैंने हिंदी भाषा के माध्यम से भाषा वैज्ञानिकी-शिक्षा-शास्त्र में पीएच.डी. करने का विचार बनाया। यद्यपि जीवन की परिस्थितियाँ उस दिशा में आगे नहीं बढ़ सकीं, लेकिन ज्ञान की खोज कभी रुकी नहीं।
मेरे साहित्यिक गुरु और दोहा-साधना: मेरे साहित्यिक जीवन का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब फेसबुक के माध्यम से मेरी पहचान मेरे गुरुदेव आदरणीय डॉ. बिपिन पाण्डेय जी से हुई। उन्होंने मेरे भीतर छिपे रचनाकार को पहचाना और मुझे दोहा-सृजन की ओर प्रेरित किया। मैं मानता हूँ कि किसी भी रचनाकार के जीवन में गुरु का मिलना एक सौभाग्य होता है। मेरे लिए डॉ. पाण्डेय जी का सान्निध्य वही सौभाग्य रहा। उनके मार्गदर्शन और विभिन्न विद्वानों की संगति से मैंने धीरे-धीरे हिंदी की अनेक काव्य-विधाओं और छंदों का अभ्यास किया। दोहा, कह-मुकरी, सोरठा, रोला, कुंडलिया, कुण्डलिनी तथा अनेक आधारभूत छंदों का अध्ययन किया। छंद मेरे लिए केवल मात्रा और गणना का अनुशासन नहीं रहे। मैंने उनमें जीवन को संक्षेप में कहने की कला देखी। सीमित शब्दों में व्यापक अनुभूति को बाँध देना मुझे सदैव आकर्षित करता रहा।
मेरा साहित्यिक सृजन: वर्ष 2018 मेरे साहित्यिक जीवन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव बना। मैंने ‘रसास्वाद—अटल-धारा’ नामक साहित्यिक पत्रिका का संपादन एवं ई-प्रकाशन किया। चार माह तक इसके सफल प्रकाशन ने मुझे साहित्यिक संपादन और रचनात्मक पत्रकारिता का अनुभव दिया। इसके बाद मुझे संस्कृत भाषा की राष्ट्रीय पत्रिका ‘संस्कृत-निनादः’ में सह-संपादक के रूप में कार्य करने का अवसर मिला। हिंदी के साथ संस्कृत की सेवा ने मेरी भाषाई और साहित्यिक दृष्टि को और व्यापक किया। साहित्य के साथ-साथ मैंने साहित्यिक पत्रकारिता को भी अपनी कर्मभूमि का हिस्सा बनाया। ‘अक्षरवाणी’ संस्कृत समाचार-पत्र के हिंदी साहित्यिक पृष्ठ के संपादन से मेरा जुड़ाव हुआ। आगे चलकर मुझे प्रमुख संपादक का दायित्व मिला।

संस्कृत सेवा और अक्षरवाणी...

20 जनवरी 2019 को संस्कृत भाषा की सेवा के लिए ‘संस्कृतरसास्वाद’ नामक राष्ट्रीय संस्था द्वारा मुझे ‘आचार्य’ की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया। उसी दिन मुझे ‘अक्षरवाणी’ साप्ताहिक संस्कृत समाचार-पत्र का प्रांतीय प्रभार भी सौंपा गया।वर्ष 2020 के सितंबर माह में मुझे अक्षरवाणी संस्कृत समाचार-पत्र के प्रबंध निदेशक का दायित्व प्रदान किया गया। तब से मैं इस उत्तरदायित्व का निर्वहन कर रहा हूँ। मेरे लिए यह पद केवल एक प्रशासनिक दायित्व नहीं है। संस्कृत भारतीय ज्ञान-परंपरा की महत्वपूर्ण भाषा है और उससे जुड़े किसी भी कार्य को मैं अपनी सांस्कृतिक जिम्मेदारी के रूप में देखता हूँ।

प्राचार्य के रूप में :  वर्ष 2022 में मैंने प्राचार्य के रूप में कार्यभार संभाला। यह मेरे लिए एक नया अनुभव था। अब मेरी भूमिका केवल शिक्षक अथवा साहित्यकार की नहीं रही; मुझे शैक्षिक नेतृत्व और प्रशासन की व्यापक जिम्मेदारियाँ भी निभानी थीं।मैंने शिक्षा को सदैव केवल पाठ्यक्रम पूरा करने की प्रक्रिया के रूप में नहीं देखा। मेरे लिए शिक्षा का उद्देश्य विद्यार्थी के भीतर ज्ञान के साथ विवेक, अनुशासन, संवेदना और उत्तरदायित्व का विकास करना है। पारिवारिक एवं व्यक्तिगत परिस्थितियों के कारण आगे चलकर मैंने पुनः फ्रांसीसी भाषा शिक्षक के रूप में अध्यापन आरंभ किया।
मेरा वैवाहिक एवं पारिवारिक जीवन:: मेरे जीवन में 11 मार्च 2024 एक अत्यंत महत्वपूर्ण और आत्मीय दिन के रूप में आया, जब मेरा विवाह श्रीमती शीतल सिंह के साथ हुआ। विवाह के पश्चात् जीवन के अर्थ और भी विस्तृत हुए। दिसंबर 2024 में मेरी सुपुत्री स्वरात्मिका सिंह का जन्म हुआ। उसके आगमन ने मेरे जीवन में एक ऐसी मधुरता जोड़ी, जिसे शब्दों में बाँधना मेरे लिए संभव नहीं। ‘स्वरात्मिका’ मेरे लिए केवल मेरी पुत्री का नाम नहीं, बल्कि मेरे जीवन में आए एक नए स्वर का नाम है।
दिल्ली पब्लिक स्कूल, गैंगटोक:: मेरी कर्मयात्रा का वर्तमान अध्याय फरवरी 2026 में आरंभ हुआ, जब मैंने दिल्ली पब्लिक स्कूल, गैंगटोक में अकादमिक समन्वयक एवं फ्रांसीसी भाषा शिक्षक के रूप में कार्यभार ग्रहण किया। आज मैं शिक्षा के अकादमिक और प्रशासनिक दोनों पक्षों से जुड़ा हूँ। अकादमिक नियोजन, समन्वय, भाषा-शिक्षण और विद्यालयीन गतिविधियों के विभिन्न आयामों में कार्य करते हुए मैं अपने अब तक के अनुभवों को शिक्षा के व्यापक उद्देश्य से जोड़ने का प्रयास कर रहा हूँ।

मेरी साहित्यिक उपलब्धियाँ : मेरी साहित्यिक साधना को अनेक अवसरों पर सम्मान और प्रोत्साहन प्राप्त हुआ। दिसंबर 2017 में आयोजित दोहा शिरोमणि प्रतियोगिता में मुझे ‘दोहा शिरोमणि’ सम्मान से विभूषित किया गया। इसके अगले ही दिन, 1 जनवरी 2018, मुझे उसी आयोजन के निर्णायक मंडल में निर्णायक के रूप में दायित्व प्रदान किया गया। फरवरी 2018 में दिल्ली में आयोजित ‘काव्य-दंगल’ में मुझे ‘काव्य-साधक’ तथा ‘काव्य-श्री’ सम्मान प्राप्त हुआ। 22 मार्च 2018 को साहित्य संगम संस्थान द्वारा दोहा-साधना के लिए मुझे ‘अन्नपूर्णा सम्मान’ से विभूषित किया गया। 14 सितंबर 2019 को हिंदी दिवस के अवसर पर साहित्य संगम संस्थान द्वारा मुझे ‘साहित्य-साधक सम्मान’ प्रदान किया गया। इसके पश्चात् जनवरी 2020 के प्रथम सप्ताह में इसी संस्था द्वारा मुझे ‘साहित्य गौरव सारथी सम्मान’ से सम्मानित किया गया। इन सम्मानों को मैं अपनी साहित्यिक यात्रा का अंत नहीं, बल्कि आगे और अधिक गंभीरता से लिखने का आह्वान मानता हूँ।
मेरी प्रकाशित कृतियाँ:  मेरी साहित्यिक यात्रा विभिन्न विधाओं में निरंतर आगे बढ़ती रही है।

‘प्रताप-सहस्त्र’ — दोहा-संग्रह (2018)
दोहा-विधा के प्रति मेरी साधना और जीवनानुभवों की अभिव्यक्ति से जुड़ा यह मेरा महत्वपूर्ण दोहा-संग्रह है।

‘मेरी बगिया के फूल’ — काव्य-मञ्जरी (2020)
इस कृति में विविध भावों, अनुभूतियों और जीवन-संवेदनाओं को काव्यात्मक रूप देने का प्रयास किया गया है।

‘स्वरात्मिका’ — गीत-मञ्जरी (2025)
गीत-सृजन की मेरी यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव। इसमें भाव, लय और अनुभूति के माध्यम से जीवन के विविध पक्षों को स्वर देने का प्रयास है।

‘अर्णिका’ — सृजन-मञ्जरी (2026)
यह मेरी गीत-साधना की अगली कड़ी है, जिसमें सृजन के विविध भाव-पक्ष गीतात्मक रूप में अभिव्यक्त हुए हैं।

‘सुलोचना : मौन की महागाथा’ — धार्मिक उपन्यास (2026)
यह धार्मिक-पौराणिक संवेदना से जुड़ी कृति है, जिसमें नारी-मन, त्याग, धैर्य और मौन की शक्ति को कथा के माध्यम से अभिव्यक्त करने का प्रयास किया गया है।

‘शबरी : प्रतीक्षा की पूर्णाहुति’ — धार्मिक उपन्यास
यह कृति प्रकाशनार्थ है। इसमें शबरी के चरित्र के माध्यम से प्रतीक्षा, भक्ति, समर्पण और आध्यात्मिक उत्कंठा को कथात्मक रूप देने का प्रयास किया गया है।

इसके अतिरिक्त ‘लुप्त होती विधा—कहमुकरी’ विषयक मेरा आलेख हिंदी मिलाप में प्रकाशित हुआ, जिसके माध्यम से मैंने कहमुकरी जैसी पारंपरिक साहित्यिक विधा की ओर ध्यान आकर्षित करने का प्रयास किया।

मेरी साहित्यिक दृष्टि: मैं साहित्य को केवल शब्दों की सजावट नहीं मानता। मेरे लिए साहित्य जीवन का साक्षात्कार है। जो कुछ समाज में घटता है, जो कुछ मनुष्य भीतर अनुभव करता है और जो कुछ समय अपनी स्मृति में सुरक्षित रखना चाहता है—साहित्य उन सबका साक्षी बनता है। दोहा ने मुझे संक्षिप्तता का अनुशासन सिखाया, गीत ने भावों को स्वर देना सिखाया, कविता ने संवेदना को विस्तार दिया और उपन्यास ने पात्रों के भीतर उतरकर जीवन को देखने का अवसर दिया। मैंने कभी स्वयं को किसी एक साहित्यिक विधा तक सीमित नहीं किया। मेरी दृष्टि में साहित्य एक विराट आकाश है और विधाएँ उसमें चमकते हुए अलग-अलग नक्षत्र हैं।

मेरी कर्म-दृष्टि : मेरी जीवन-यात्रा को यदि एक वाक्य में कहना हो तो मैं कहूँगा— मैं तकनीक सीखने हैदराबाद गया था, किंतु वहाँ मुझे हिंदी मिल गई। मैं रोजगार की तलाश में निकला था, पर भाषा ने मुझे सेवा का मार्ग दिखाया। अध्यापन करते-करते साहित्य मिला, साहित्य में गुरु मिले, गुरु से छंद-साधना मिली और उसी साधना ने मुझे अपनी पहचान खोजने का अवसर दिया। आज मेरे जीवन में शिक्षा, भाषा, साहित्य और संस्कृति चार अलग-अलग विषय नहीं हैं। ये मेरे जीवन की चार धाराएँ हैं, जो एक ही प्रवाह में मिलती हैं। मैं आज भी स्वयं को पूर्ण साहित्यकार नहीं, बल्कि साहित्य का एक साधक मानता हूँ। मुझे अभी बहुत कुछ पढ़ना है, बहुत कुछ सीखना है और बहुत कुछ लिखना है। मेरी सबसे बड़ी आकांक्षा सम्मान या प्रसिद्धि नहीं, बल्कि यह है कि मेरे शब्द किसी एक पाठक के मन में भी कोई विचार जगा सकें, किसी संवेदना को स्पर्श कर सकें अथवा भारतीय भाषा और संस्कृति के प्रति थोड़ा-सा अनुराग उत्पन्न कर सकें। मेरे लिए साहित्य साधना है, शिक्षा सेवा है और भाषा संस्कार। और मेरी अब तक की यात्रा शायद इसी एक पंक्ति में सबसे अधिक स्वाभाविक रूप से समा जाती है—

जावा खोज आया साथ हिंदी सजी। 

हिंदी पाठ बाँटा मगन जीवन रची॥

काव्य राह चलना निशी गुरुवर जगी।

पाकर गुरूं जीवन साध बनती लगी॥


“पाकर गुरु का ज्ञान, मिटा उर का अंधियारा।
 साहित्यिक रसधार, बना जीवन सुखसारा॥
 सतपथ पर ले जाय, दिखावे मार्ग सुहावन।
 गुरु चरणन की धूल, करे यह जीवन पावन॥”

 

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