प्रवेश पत्र है, यात्रा की व्यवस्था कहाँ है?

प्रवेश पत्र है, यात्रा की व्यवस्था कहाँ है?

एक परीक्षा का प्रवेश पत्र हाथ लगा। देखकर मन प्रसन्न हुआ कि व्यवस्था सचमुच बहुत आगे निकल चुकी है। मध्यप्रदेश का नागरिक परीक्षा देने दिल्ली जाएगा, दिल्ली का परीक्षार्थी चेन्नई जाएगा और न जाने चेन्नई वाला किस पुण्यभूमि की यात्रा करेगा। शिक्षा की परीक्षा है या देश-दर्शन की योजना—यह समझना कठिन है।

सरकारी व्यवस्था को इस अभिनव प्रयोग के लिए जितना धन्यवाद दिया जाए, कम है। सचमुच, ऐसी दूरदर्शिता को बार-बार प्रणाम!

पहले जमाने में परीक्षा केंद्र निकट होता था, विद्यार्थी समय पर पहुँचता था, परीक्षा देता था और लौट आता था। अब लगता है कि परीक्षा के साथ सहनशीलता, यात्रा-कौशल और भाग्य-परीक्षण भी अनिवार्य कर दिया गया है। पढ़ाई कितनी हुई, यह बाद की बात है; पहले यह सिद्ध करो कि तुम अपने परीक्षा केंद्र तक पहुँच सकते हो।

मान लीजिए मध्यप्रदेश का कोई विद्यार्थी दिल्ली परीक्षा देने जा रहा है। प्रवेश पत्र परीक्षा से पाँच दिन पहले मिलता है। अब पाँच दिन में वह रेलगाड़ी का आरक्षण कराए, बस खोजे, ठहरने की व्यवस्था करे या घरवालों को समझाए कि “चिंता मत करो, सरकार ने परीक्षा केंद्र तो दिल्ली में दिया है, पहुँचाने की जिम्मेदारी अभी भगवान की है।”

रेलगाड़ी का आरक्षण तो जैसे परीक्षार्थी के भाग्य में ही लिखा हो। पाँच दिन पहले आरक्षण कहाँ मिलेगा? तत्काल में भी तत्काल भाग्य चाहिए। और यदि टिकट नहीं मिली तो विद्यार्थी परीक्षा दे या रेलवे के द्वार पर बैठकर अपनी योग्यता सिद्ध करे?

सरकार ने प्रवेश पत्र दे दिया—मानो कह रही हो, “लो बेटा, अब तुम्हारी परीक्षा शुरू। प्रश्नपत्र तो दो घंटे का है, लेकिन वहाँ पहुँचने की परीक्षा तुम्हारी।”

और यदि किसी तरह टिकट मिल भी गई तो किराया कौन देगा? विद्यार्थी अपने घर से परीक्षा देने जा रहा है, पर्यटन करने नहीं। यदि व्यवस्था इतनी ही महान है कि एक प्रदेश के विद्यार्थी को दूसरे प्रदेश में भेजना आवश्यक है, तो कम-से-कम प्रवेश पत्र को यात्रा-पत्र तो बना दिया जाता। ऐसा प्रावधान होना चाहिए कि जिसके हाथ में प्रवेश पत्र हो, वह किसी भी श्रेणी में बैठकर किसी भी उपलब्ध साधन से परीक्षा केंद्र तक पहुँच सके।

अभी स्थिति यह है कि सरकार कहती है—“तुम परीक्षा दो।”

यात्री पूछता है—“कैसे पहुँचूँ?”

सरकार कहती है—“यह तुम्हारी समस्या है।”

यात्री कहता है—“टिकट?”

सरकार मुस्कराती है—“वह भी तुम्हारी समस्या है।”

परीक्षार्थी पूछता है—“आरक्षण?”

व्यवस्था कहती है—“पाँच दिन पहले प्रवेश पत्र मिला है, पाँच दिन में चमत्कार करो।”

वाह री व्यवस्था! साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे—बस यहाँ साँप की जगह परीक्षार्थी है और लाठी की जगह सरकारी नियम।

यदि यही व्यवस्था इतनी उपयोगी है तो चुनाव भी इसी प्रकार करा लेने चाहिए। भोपाल का प्रतिनिधि चेन्नई से चुनाव लड़े, चेन्नई वाला कोलकाता से और कोलकाता वाला जयपुर से। प्रचार के लिए पाँच दिन मिलें और आने-जाने के लिए कहा जाए—“भैया, अपने साधन से जाइए, लोकतंत्र में भाग लेना है तो थोड़ा कष्ट तो सहना ही पड़ेगा।”

देखिए तब कितने जनप्रतिनिधि जनता की सेवा करने के लिए आगे आते हैं!

परीक्षार्थी से अपेक्षा है कि वह सैकड़ों-हजारों किलोमीटर की यात्रा करे, धन लगाए, समय लगाए, अनिश्चितता सहे और अंततः परीक्षा दे। लेकिन यदि वह समय पर नहीं पहुँच पाया तो परिणाम सरल है—“अनुपस्थित।”

व्यवस्था की ओर से कोई अनुपस्थिति नहीं।

न केंद्र निर्धारण की भूल, न विलंबित प्रवेश पत्र की चिंता, न यात्रा की कठिनाई का उत्तरदायित्व।

अर्थात् गलती व्यवस्था की हो सकती है, किंतु उसका दंड परीक्षार्थी को ही मिलेगा। यही तो वह अद्भुत गणित है जिसमें जोड़ने वाला कोई और है और घटने वाला विद्यार्थी।

और कभी-कभी मन में एक और भोला-सा प्रश्न उठता है—यदि किसी विद्यार्थी की परीक्षा छूट गई, पद रिक्त रह गया, फिर अगली बार आवेदन निकला, फिर शुल्क लिया गया, फिर परीक्षा हुई, फिर वही यात्रा हुई—तो इसमें सबसे अधिक सुविधा किसे है? विद्यार्थी को तो नहीं, यह बात निश्चित है।

जनता कहती है—“हम तो पढ़कर आए थे।”

व्यवस्था कहती है—“पहले व्यवस्था को पढ़ो।”

यह कैसी परीक्षा है जिसमें प्रश्नपत्र से पहले व्यवस्था प्रश्न बनकर सामने खड़ी हो जाती है?

बघेली में कहें तो परीक्षार्थी की दशा देखकर मन कह उठता है—“का हो भैया, पढ़ाई करे आए रहे कि तीर्थयात्रा?”

व्यवस्था का उद्देश्य यदि योग्य व्यक्ति चुनना है तो परीक्षा केंद्र ऐसा होना चाहिए जहाँ विद्यार्थी पहुँच सके। परीक्षा किसी की आर्थिक क्षमता, यात्रा-सौभाग्य या आरक्षण मिलने की योग्यता की नहीं होनी चाहिए। देश में प्रतिभा गाँवों, कस्बों और छोटे नगरों में भी रहती है; वह हर बार महानगरों की चौखट पर सिर पटकने के लिए बाध्य क्यों हो?

सरकार से बस इतनी विनम्र प्रार्थना है—परीक्षा को परीक्षा ही रहने दीजिए, उसे यात्रा-सहनशक्ति प्रतियोगिता मत बनाइए।

जिस विद्यार्थी ने वर्षों पढ़कर परीक्षा की तैयारी की है, उसकी योग्यता का निर्णय उसके उत्तर-पत्र से होना चाहिए, इस बात से नहीं कि वह समय पर दूसरे शहर पहुँच पाया या नहीं।

व्यवस्था का काम रास्ता बनाना है, रास्ते में काँटे बिछाकर फिर यह पूछना नहीं कि “तुम पहुँचे क्यों नहीं?”

अंततः प्रश्न केवल एक परीक्षा का नहीं है। प्रश्न उस सोच का है जिसमें सुविधा व्यवस्था की और कठिनाई नागरिक की मानी जाती है। यदि व्यवस्था सचमुच जनहित में है तो उसे नागरिक से यह नहीं कहना चाहिए—“तुम किसी तरह पहुँचो”; उसे कहना चाहिए—“हमने तुम्हारे पहुँचने की भी व्यवस्था की है।”

वरना कल को कहीं ऐसा न हो कि प्रवेश पत्र पर परीक्षा केंद्र के साथ एक पंक्ति और लिखी मिले—

“परीक्षा में उपस्थित होना आपकी जिम्मेदारी है; वहाँ तक पहुँच पाना आपकी व्यक्तिगत उपलब्धि।”

और तब हम सचमुच कह सकेंगे—देश बदल रहा है, बस नागरिक को पहले यह पता नहीं कि किस दिशा में जाना है।

आचार्य प्रताप

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Achary Pratap

समालोचक , संपादक तथा पत्रकार प्रबंध निदेशक अक्षरवाणी साप्ताहिक संस्कृत समाचार पत्र

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