साहित्य का नया मुफ्त व्यापार

साहित्य में कभी किताबें पढ़ने के लिए मँगाई जाती थीं, अब कभी-कभी इसलिए मँगाई जाती हैं कि लेखक को लगे—पुस्तक किसी योग्य हाथ में पहुँची है। हाथ योग्य हो या न हो, यह बात पुस्तक पहुँचने के बाद ही पता चलती है। उससे पहले तो हर हाथ में साहित्यिक आत्मीयता की गर्मी होती है—“आप तो अपने हैं”, “आप मेरे बड़े भाई जैसे हैं”, “आपसे छोटा हूँ, आशीर्वाद चाहिए”, “आपकी पुस्तक पर कुछ लिखना ही है।” लेखक भावुक हो जाता है। पुस्तक पैक होती है, कूरियर जाता है और साहित्यिक संबंधों की डोर अचानक इतनी मजबूत हो जाती है कि अगले ही दिन टूटकर अदृश्य हो जाती है।

साहित्य में यह नया फ्री ट्रेड बड़ा विचित्र है। यहाँ माल लेखक का, पैसा लेखक का, कूरियर का खर्च लेखक का और उम्मीद भी लेखक की! बदले में सामने वाला कभी समीक्षा का आश्वासन देता है, कभी फेसबुक पोस्ट का, कभी पत्रिका में चर्चा कराने का। पुस्तक पहुँचते ही साहित्यिक वायदे उसी तरह उड़ जाते हैं जैसे चुनाव के बाद घोषणापत्र।

आजकल कुछ कवि-लेखक ऐसे भी हैं जिनकी अपनी रचनाएँ भले ही अलमारी में करवट बदल रही हों, पर दूसरों की किताबें घर पहुँचाने की उनकी साहित्यिक भूख अद्भुत है। कोई रिश्ते का हवाला देगा—“आप तो मेरे अपने हैं।” कोई विद्वता की गठरी खोल देगा—“मैं साहित्य को बहुत गंभीरता से पढ़ता हूँ।” कोई अचानक बड़ा भाई बन जाएगा, कोई बहन। ऐसा आत्मीय संबोधन कि लेखक को लगे—पुस्तक न भेजी तो कहीं पारिवारिक संपत्ति से बेदखल न कर दिया जाए!
फिर पुस्तक चली गई। अब लेखक प्रतीक्षा करता है—आज पढ़ेंगे, कल पढ़ेंगे, परसों समीक्षा आएगी। सप्ताह बीतता है, महीना निकल जाता है। पुस्तक शायद मेज पर हो, अलमारी में हो, किसी और अलमारी के पीछे हो या साहित्यिक पुनर्जन्म लेकर किसी तीसरे व्यक्ति के पास पहुँच चुकी हो—कुछ पता नहीं।

फोन मिलाइए तो घंटी बजती रहती है। दूसरी बार मिलाइए तो वही घंटी। तीसरी बार ऐसा लगता है जैसे आप पुस्तक की समीक्षा नहीं, उधार की रकम माँग रहे हों। सामने वाला फोन ऐसे नहीं उठाता जैसे दूसरी तरफ लेखक नहीं, बैंक का रिकवरी एजेंट बैठा हो—“सर, आपकी पुस्तक पर दो शब्द चाहिए।” और उधर से मौन का उत्तर आता है—“ऋणग्रस्त व्यक्ति उपलब्ध नहीं है।”

विडंबना यह है कि लेखक भी इस खेल से मुक्त नहीं। उसे भी पुस्तक छपते ही फेसबुक पर घोषणा करनी है—“आज मेरी नई कृति आपके हाथों में।” फिर मित्रों के कमेंट, बधाइयाँ, इमोजी और साहित्यिक आत्मीयता की आतिशबाजी। किसी ने पुस्तक पढ़ी या नहीं, इससे अधिक महत्वपूर्ण है कि उसने टिप्पणी की या नहीं। आजकल कई बार ‘वाह’ पुस्तक से अधिक मूल्यवान हो गया है और ‘अद्भुत’ पूरी समीक्षा का काम कर देता है।

समीक्षा भी अब कभी-कभी साहित्यिक श्रम नहीं, सामाजिक लेन-देन बन गई है। तुमने मेरी पुस्तक पर लिखा, मैं तुम्हारी पुस्तक पर लिखूँगा। तुमने मुझे टैग किया, मैं तुम्हें शेयर करूँगा। तुमने मेरी पुस्तक खरीदी नहीं तो कम-से-कम उसकी तस्वीर तो डाल दो। साहित्य के इस बाजार में भावनाएँ भी थोक में बिकती हैं और प्रशंसा खुदरा में।

लेकिन सच्चा साहित्य इस बाजार से बाहर जन्म लेता है। वह न रिश्तेदारी की रसीद माँगता है, न समीक्षा की दलाली। पुस्तक यदि सचमुच अच्छी है तो उसे किसी कृत्रिम प्रशंसा की बैसाखी नहीं चाहिए। और यदि पुस्तक पढ़े बिना समीक्षा लिखी जा रही है तो वह समीक्षा नहीं, साहित्यिक प्रसाद का वितरण है।

लेखक को अब शायद एक नया नियम बना लेना चाहिए—पुस्तक उसी को भेजिए जो पढ़ने का वादा नहीं, पढ़ने का संस्कार रखता हो। क्योंकि किताबें डाक से पहुँचती हैं, मगर पाठक तक पहुँचने के लिए उन्हें आँखों, समय और ईमानदारी की जरूरत होती है।

वरना साहित्य का यह फ्री ट्रेड चलता रहेगा—लेखक किताब भेजता रहेगा, समीक्षक आश्वासन देता रहेगा और पुस्तक कहीं किसी अलमारी में चुपचाप लेखक की समीक्षा का इंतजार करती रहेगी।

आचार्य प्रताप



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Achary Pratap

समालोचक , संपादक तथा पत्रकार प्रबंध निदेशक अक्षरवाणी साप्ताहिक संस्कृत समाचार पत्र

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