नौकरी माँगने वाला युवक कोई अनुग्रह नहीं माँगता। वह अपना श्रम बेचने के लिए बाजार में खड़ा है। उसके पास शिक्षा है, योग्यता है, परीक्षा का अनुभव है और सबसे बड़ी बात—काम करने की इच्छा है। मगर व्यवस्था उसे काम देने से पहले प्रतीक्षा करना सिखाती है। इतनी प्रतीक्षा कि कभी-कभी लगता है, नियुक्ति-पत्र नहीं, तपस्या का प्रमाणपत्र मिलने वाला है।
सरकारों की एक बड़ी विशेषता होती है—वे जनता की माँग को तुरंत अस्वीकार नहीं करतीं। अस्वीकार करने में स्पष्टता होती है और स्पष्टता से प्रश्न पैदा होते हैं। इसलिए आश्वासन अधिक सुविधाजनक है। कहा जाता है—“विचार चल रहा है।”
यह “विचार” बड़ा अद्भुत जीव है। न उसका जन्म दिखाई देता है, न मृत्यु। वह वर्षों तक कार्यालयों की मेज पर पड़ा रहता है और बीच-बीच में किसी फाइल को देखकर करवट बदल लेता है।
एक युवक ने पूछा—“महाराज, पद कब बढ़ेंगे?”
उत्तर आया—“प्रक्रिया चल रही है।”
उसने पूछा—“नियुक्ति कब होगी?”
उत्तर आया—“प्रक्रिया चल रही है।”
उसने तीसरी बार पूछा—“मेरी उम्र निकल रही है।”
उत्तर फिर वही—“प्रक्रिया चल रही है।”
तब युवक बोला—“तो प्रक्रिया से ही विवाह करा दीजिए, कम से कम घर में कोई तो होगा जो साथ निभाए!”
व्यवस्था को यह हास्य शायद अच्छा न लगे, पर जनता को हँसना इसलिए पड़ता है कि रोने के लिए आँसू भी सीमित होते हैं।
हमारे गाँव में कहा जाता है—“बैल चराय बर भेजे रहे, ऊ खेतवा चरि के लौट आए।” यहाँ भी कभी-कभी लगता है कि व्यवस्था को समस्या सुलझाने भेजा गया था और वह समस्या को ही चरकर लौट आई।
पद रिक्त हैं, कार्यरत लोगों पर काम का भार है, विद्यालयों को शिक्षक चाहिए, विद्यार्थियों को शिक्षक चाहिए, योग्य लोग प्रतीक्षा में हैं; फिर भी नियुक्ति की राह में ऐसी गाँठें लगाई जाती हैं कि खोलने वाला स्वयं भूल जाए कि गाँठ किसने बाँधी थी।
और पद वृद्धि? वह तो जैसे सरकारी शब्दकोश का ऐसा शब्द है जिसे पढ़ते ही कई विभागों को नींद आने लगती है।
पर प्रश्न केवल नौकरी का नहीं है। प्रश्न यह है कि क्या योग्यता का मूल्य केवल परीक्षा तक है? क्या वर्षों तक तैयारी करने वाला युवक केवल परिणाम की सूची में एक क्रमांक है? क्या उसके पीछे खड़े माता-पिता की आशा, घर की आर्थिक कठिनाई और उसके जीवन के बीतते वर्ष किसी गणना में नहीं आते?
सरकार चाहे कोई भी हो, समय चाहे कोई भी हो, यह प्रश्न बना रहेगा—सत्ता जनता की सेवा के लिए है या जनता को प्रतीक्षा सिखाने के लिए?
जनता का धैर्य बहुत बड़ा होता है। वह सूखे खेत की तरह आसमान को देखती रहती है। बादल आते हैं, गरजते हैं, कभी-कभी घोषणा की वर्षा भी होती है; पर खेत में पानी तब पहुँचता है जब नहर सचमुच खुलती है।
इसलिए अधिकार माँगना व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह नहीं, व्यवस्था को उसके दायित्व की याद दिलाना है। एकजुट होकर अपनी बात रखना लोकतंत्र की मर्यादा है। चुप रहना सद्गुण तभी है जब सामने वाला न्याय कर रहा हो; अन्यथा चुप्पी धीरे-धीरे सहमति का रूप धारण कर लेती है।
नीलम पार्क में उठने वाली आवाज किसी एक दिन की आवाज नहीं होनी चाहिए। वह हर उस नागरिक की आवाज होनी चाहिए जो मानता है कि काम का सम्मान हो, योग्यता का मूल्य हो और शासन का उत्तरदायित्व केवल घोषणा करना नहीं, परिणाम देना भी हो।
क्योंकि सत्ता बदलती रहती है। चेहरे बदलते हैं। पट्टिकाएँ बदलती हैं। घोषणाओं के शब्द बदलते हैं। मगर यदि जनता का प्रश्न वही रहे—“हमरा हक कब मिली?”—तो समझना चाहिए कि समस्या किसी एक व्यक्ति में नहीं, उस व्यवस्था की आदत में है जो जनता को उत्तर देने के बजाय प्रतीक्षा देती है।
कहा जाता है—“जागे बिना भोर नहीं होती।”
अतः आवाज उठाइए, पर विवेक के साथ। माँग रखिए, पर मर्यादा के साथ। एकजुट होइए, पर उद्देश्य के साथ।
क्योंकि लोकतंत्र में जनता केवल वोट देने वाली भीड़ नहीं है।
वह वह शक्ति है जिसके कारण कुर्सी को चार पाये मिले हैं।
और कुर्सी कितनी ही ऊँची क्यों न हो—
उसके नीचे की जमीन जनता की ही रहती है।
आचार्य प्रताप
#पदवृद्धि_दो, #नियुक्ति_दो, #रोजगार_का_अधिकार, #युवा_की_आवाज, #शिक्षा_और_रोजगार, #जनता_का_अधिकार, #व्यवस्था_पर_व्यंग्य, #लोकतंत्र_में_जवाबदेही, #अधिकार_की_आवाज, #जागो_और_जगाओ