प्यारी अपनी धरती है : डॉ पुरी

पुस्तक-समीक्षा : एक आलोचनात्मक एवं शोधपरक दृष्टि
पुस्तक-परिचय
पुस्तक का नाम: प्यारी अपनी धरती है
लेखक: डॉ. विजय कुमार पुरी
विधा: काव्य-संग्रह (गीत एवं छन्दमुक्त कविताएँ)
प्रकाशक: निखिल पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स, 37, 'शिवराम कृपा' विष्णु कालोनी शाहगंज, आगरा
कुल पृष्ठ: 124 (कवर पृष्ठ सहित)
प्रकाशन वर्ष: 2023 (प्रथम संस्करण)
ISBN: 978-93-5552-176-7
मूल्य: 125.00 रुपये ($10)
आज सोलह अगस्त, दो हज़ार छब्बीस की इस शांत और कुछ-कुछ सर्द रात्रि में, जब गंगटोक की पर्वत-श्रृंखलाओं पर धुंध की एक महीन चादर लिपटी हुई है, मेरे अध्ययन-कक्ष में की मेज पर रखे  मेरे टैबलेट पर रखी PDF डॉ. विजय कुमार पुरी की सद्यः प्रकाशित कृति 'प्यारी अपनी धरती है' मेरे भीतर अनेक साहित्यिक और आलोचनात्मक प्रश्नों को जन्म दे रही है। एक पाठक होने के नाते, मेरा यह दायित्व है कि मैं किसी भी कृति को केवल उसकी भावुकता के तराजू पर न तौलूँ, बल्कि शिल्प, कथ्य, बिंब, और युगबोध के कठोर निकष पर कसकर उसकी वास्तविक साहित्यिक कीमत का आकलन करूँ। डॉ. विजय कुमार पुरी पेशे से एक शिक्षक हैं, और उनकी यह शिक्षकीय चेतना उनकी कविताओं में बार-बार झाँकती है। यह काव्य-संग्रह देशभक्ति, प्रकृति-प्रेम, सामाजिक विद्रूपताओं और मानवीय संवेदनाओं का एक ऐसा विस्तृत फलक प्रस्तुत करता है, जहाँ कवि कभी लोक-मंगल की कामना करता है तो कभी व्यवस्था की क्रूरता पर क्षुब्ध होकर विद्रोह का स्वर अपनाता है। प्रस्तुत समीक्षा में, मैं इस संग्रह की महत्त्वपूर्ण कविताओं का पृथक और गहन पाठ-सापेक्ष विवेचन कर रहा हूँ, ताकि इस कृति की उपलब्धियों और सीमाओं का समग्र मूल्यांकन किया जा सके।

शीर्षक कविता : 'प्यारी अपनी धरती है' का विश्लेषणात्मक पाठ

संग्रह की प्रथम और शीर्षक कविता 'प्यारी अपनी धरती है' पर्यावरण-संरक्षण और प्रकृति-प्रेम के लोकमंगलकारी भाव को स्वर देती है। यह एक गेय गीत है, जिसमें कवि ने सीधे और सरल शब्दों में अपनी बात कही है।

प्यारी अपनी धरती है और प्यारा अपना देश है।
हरे-भरे पेड़ों से सजता सुंदर ये परिवेश है।।

इन पंक्तियों का अर्थ अत्यंत पारदर्शी है। कवि अपनी मातृभूमि और उसके प्राकृतिक सौंदर्य के प्रति अपना अनुराग व्यक्त कर रहा है। यहाँ भाव-सौंदर्य की दृष्टि से एक निश्छल बाल-सुलभ प्रेम है। साहित्यिक महत्त्व के दृष्टिकोण से देखें तो कवि ने 'अभिधा' शब्द-शक्ति का प्रयोग किया है। यहाँ कोई लाक्षणिक या व्यंजनात्मक घुमाव नहीं है। गुण-दोष की बात करें तो, इसका सबसे बड़ा गुण इसकी संप्रेषणीयता है; यह सीधे जनमानस तक पहुँचती है। किंतु आलोचनात्मक दृष्टि से, इन पंक्तियों में वह काव्यात्मक गहराई या नवोन्मेष नहीं है जो एक गंभीर कविता से अपेक्षित होता है। 'देश' और 'परिवेश' का तुक-मिलान पारंपरिक है। शिल्प के स्तर पर यह कविता बहुत ही साधारण धरातल पर खड़ी दिखाई देती है, जहाँ संदेश तो मुखर है, किंतु कलात्मक वक्रता का सर्वथा अभाव है। यह एक उपदेशात्मक गीत बनकर रह जाता है, जो स्कूली बच्चों के पर्यावरण-दिवस के लिए तो सर्वथा उपयुक्त है, किंतु गंभीर साहित्यिक विमर्श में इसकी व्याप्ति सीमित है।
मानवीय त्रासदी और करुण रस का चरम : 'दृश्य, जो भूलता ही नहीं'
इस संग्रह की सबसे सशक्त, विस्तृत और मार्मिक रचना 'दृश्य, जो भूलता ही नहीं' है। यह एक छन्दमुक्त और लंबी नैरेटिव कविता है, जो संभवतः केदारनाथ की भीषण जल-प्रलय (आपदा) की पृष्ठभूमि पर रची गई है। इस कविता में कवि का स्वानुभूतिपरक आख्यान इतना सजीव और दारुण है कि पाठक की चेतना सिहर उठती है।

क्या? मैं अपना जीवन बचाता...?
या फिर पुत्र धर्म निभाता
हाय! मैं कुछ भी न कर सका
माँ के संग न मर सका

उपर्युक्त चार पंक्तियों में जो नैतिक द्वंद्व और असहायता का चित्र उकेरा गया है, वह समकालीन हिंदी कविता में दुर्लभ है। यहाँ अर्थ स्पष्ट है: प्रलयंकारी बाढ़ के सम्मुख एक पुत्र अपने प्राणों की रक्षा करे या अपनी वृद्ध माँ को बचाए? अंततः वह अपनी माँ को नहीं बचा पाता और जीवन-भर के लिए एक गहरे आत्म-ग्लानि (Guilt) के गर्त में गिर जाता है। इन पंक्तियों का प्रभाव अत्यंत मर्मभेदी है। यहाँ 'करुण रस' अपने पूर्ण परिपाक पर है। 'हाय!' शब्द में जो विवशता और शोक का स्थायी भाव है, वह सीधे हृदय को बींधता है।
साहित्यिक मूल्यांकन करें तो यहाँ कवि का शिल्प उसकी अनुभूति के आगे बौना पड़ गया है, और यही इस कविता की सफलता भी है। आपदा के समय मनुष्य के पास अलंकारों और बिंबों को सजाने का समय नहीं होता; वहाँ केवल खुरदरा यथार्थ होता है। तथापि, इसी कविता के एक अन्य अंश में कवि व्यवस्था और दैवीय न्याय पर जो प्रश्नचिह्न लगाता है, वह इसकी दार्शनिक दृष्टि को विराट बनाता है:

यह सच है कि
तुम संहार के देव हो
पर इस तरह का संहार कर
 क्या जताना चाहते हो?

इन पंक्तियों में ईश्वर (नाथों के नाथ भोलेनाथ) से सीधा और तल्ख संवाद है। यहाँ एक अस्तित्ववादी संकट (Existential Crisis) उभरकर सामने आता है। जब आस्था और प्रलय आमने-सामने हों, तो मनुष्य का ईश्वर से मोहभंग होना स्वाभाविक है। यह मानवीय संवेदना और दार्शनिक विद्रोह का अद्भुत समन्वय है। समालोचक के रूप में मैं कहूँगा कि यह कविता इस संग्रह की आत्मा है। यद्यपि कहीं-कहीं पंक्तियों का गद्यात्मक बिखराव (Prosaic scattering) इसके काव्य-प्रवाह को बाधित करता है, किंतु कथ्य की गुरुता इस दोष को ढँक लेती है।

सामाजिक यथार्थ और विडंबना : 'मध्यवर्गीय प्राणी'

सामाजिक सरोकारों की दृष्टि से 'मध्यवर्गीय प्राणी' इस संग्रह की एक अत्यंत तीखी और यथार्थपरक रचना है। इस कविता में कवि ने उस शोषित वर्ग की पीड़ा को स्वर दिया है, जो न तो पूँजीपतियों की तरह संपन्न है और न ही निम्न वर्ग की तरह सरकारी सुविधाओं का लाभार्थी है।

मरना चाहता हूँ मैं
पर मर नहीं सकता
क्योंकि मैं उस वर्ग से हूँ
जो सबका हितैषी
सबका पालनहार है।

इन पंक्तियों में मध्यवर्ग की वह घुटन और छटपटाहट है, जहाँ व्यक्ति अपनी जिम्मेदारियों के बोझ तले इतना दबा है कि उसे आत्महत्या करने का भी अधिकार नहीं है। यहाँ 
'मरना चाहता हूँ मैं
पर मर नहीं सकता'
 विरोधाभास अलंकार का सुंदर और त्रासद प्रयोग है। इस संदर्भ का प्रभाव यह है कि यह समाज के सबसे बड़े, करदाता और मौन (Silent) वर्ग की विडंबना को उजागर करता है।

टैक्स का बोझ बढ़ेगा
मुझ पर
सरकारी राशन कटेगा
मेरा
अगर नौकरी में हुआ
इन्कार नहीं कर पाऊंगा
बेशक भूखे मर जाऊँगा

ये पंक्तियाँ समकालीन आर्थिक संरचना पर एक करारी चोट हैं। यहाँ भाषा बिल्कुल आम बोलचाल की, खुरदरी और सपाट है। शिल्प के स्तर पर कवि ने जानबूझकर काव्यात्मक कोमलता को त्याग दिया है ताकि यथार्थ की चुभन कम न हो। इस कविता का सबसे बड़ा गुण इसकी प्रासंगिकता और सत्यता है। किंतु, एक समालोचक के नाते मैं यहाँ यह अवश्य रेखांकित करूँगा कि कविता का अंत अत्यधिक गद्यात्मक हो गया है। एक स्थान पर 'डिपू का राशन' और 'गैस का सिलेंडर' जैसे शब्दों का प्रयोग इसे कविता कम और एक अखबारी लेख (Journalistic piece) अधिक बना देता है। कविता में यथार्थ का होना आवश्यक है, किंतु यथार्थ का कलात्मक रूपांतरण ही उसे महान साहित्य बनाता है, जिसमें यह कविता कुछ हद तक चूक जाती है।

शृंगार और विरह-वेदना का भाव-सौंदर्य : 'अंतर्व्यथा'

जहाँ एक ओर डॉ. पुरी ने यथार्थ और समाज की बात की है, वहीं उनके भीतर का एक रूमानियत, रोमांस या स्वछंदतावाद से भरा कवि भी 'अंतर्व्यथा' जैसी कविताओं में मुखरित होता है। यह कविता वियोग शृंगार का एक सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करती है।

सावन महीने की झमाझम,
बरसती फुहारों में,
दादुर मयूर पपीहे सी,
तड़पती पुकारों में,

इन चार पंक्तियों में प्रकृति को 'उद्दीपन विभाव' के रूप में चित्रित किया गया है। सावन की बारिश, दादुर (मेंढक), मयूर और पपीहे की पुकार—ये सभी पारंपरिक भारतीय काव्य-शास्त्र के वे स्थायी बिंब हैं जो विरह की अग्नि को और भड़काते हैं। अर्थ स्पष्ट है कि वर्षा ऋतु के मादक वातावरण में नायक की तड़प और बढ़ गई है। यहाँ उपमा अलंकार ('पपीहे सी') का सुंदर प्रयोग हुआ है। नाद-सौंदर्य (Phonetic beauty) की दृष्टि से 'झमाझम' शब्द दृश्य और श्रव्य बिंब (Visual and Auditory Imagery) दोनों को एक साथ जाग्रत करता है।
किंतु, इसी कविता में आगे चलकर कवि लिखता है:

रूप निहारूँ बैठे-बैठे, और साँसे हैं थम जाने को,
जादूगरी-सी करती रहती, लगातार भरमाने को,

यहाँ निष्पक्ष आलोचना आवश्यक है। उपर्युक्त पंक्तियों में भाव तो है, किंतु भाषा का वह परिष्कार नदारद है जो छायावादी या नवगीत परंपरा के कवियों में मिलता है। 'जादूगरी सी करती रहती' एक बहुत ही चलताऊ और सतही अभिव्यक्ति है। वियोग के जिस उदात्त स्वरूप की अपेक्षा प्रथम अनुच्छेद में जगती है, वह आगे चलकर बॉलीवुड गीतों की सस्ती शब्दावली में उलझकर अपनी गरिमा खो बैठती है। कवि को यहाँ अपनी शब्दावली के चयन पर अधिक सूक्ष्मता से कार्य करने की आवश्यकता थी।

भाषा-विमर्श और व्यंग्य : 'हिन्दी तेरी यह दुर्दशा'

राष्ट्रभाषा हिंदी की वर्तमान स्थिति पर केंद्रित कविता 'हिन्दी तेरी यह दुर्दशा' में कवि का क्षोभ और व्यंग्य मुखर हुआ है। कवि हिंदी दिवस के आडंबर पर चोट करता है।

केवल सितम्बर के महीने, याद आती हिन्दी की,
और भूल जाते वर्ष भर, ज्यों श्राद्ध होती हिन्दी की।।


इन पंक्तियों का अर्थ यह है कि जिस प्रकार पितरों को वर्ष में केवल एक बार श्राद्ध के समय याद किया जाता है, उसी प्रकार भारतीय समाज और सत्ता-प्रतिष्ठान हिंदी को केवल सितंबर माह (हिंदी पखवाड़े) में याद करते हैं। यह एक अत्यंत मारक और सटीक उपमा है। 'श्राद्ध' का प्रतीक यहाँ हिंदी की मृतप्राय अवस्था और उसके प्रति किए जा रहे औपचारिक कर्मकांड की ओर इशारा करता है। इसका प्रभाव बहुत गहरा है क्योंकि यह हमारी भाषाई दासता और दोहरे चरित्र को बेनकाब करता है।

श्राद्ध पितरों का हुआ, हिन्दी का तर्पण कर दिया,
भूलकर निज भाषा को, सब आंग्लार्पण कर दिया।।

साहित्यिक महत्त्व के नजरिए से, यहाँ 'आंग्लार्पण' (अंग्रेजी को अर्पण) शब्द का नव-निर्माण (Coinage) कवि की भाषागत रचनात्मकता को दर्शाता है। यह पूरी कविता व्यंग्य-शिल्प का एक बेहतरीन नमूना है। हालाँकि, कविता की संरचना में छंद का अनुशासन कहीं-कहीं टूटता है, मात्राओं का पतन होता है, किंतु व्यंग्य की धार इतनी तीक्ष्ण है कि पाठक का ध्यान शिल्प की उस कमजोरी से हटकर कथ्य की प्रामाणिकता पर केंद्रित हो जाता है।

हास्य-व्यंग्य और संरचनात्मक दुर्बलता : 'मैं और मेरी बीबी' तथा 'लड़की वह गोरी होय'

आलोचना का धर्म केवल स्तुति करना नहीं है। कृति की सीमाओं को उद्घाटित करना भी उतना ही आवश्यक है। संग्रह में कुछ कविताएँ ऐसी हैं जो साहित्यिक मापदंडों पर अत्यंत हल्की और निराश करने वाली हैं। उदाहरणार्थ, 'मैं और मेरी बीबी' कविता।

कल रात बीबी ने तूफान खड़े कर दिए
लगता है उसके किसी ने कान भर दिए

ये पंक्तियाँ नितांत बचकानी और तुकबंदी से ग्रस्त हैं। 'दिए' और 'दिए' का  तुक मिलाना भाषाई दरिद्रता का परिचायक है। साथ  ही भाषा की मर्यादा का उलाघंन होगा यदि स्वार्थवश 'दिये' को 'दिए' लिखा जाए इसमें न तो कोई व्यंग्य का चमत्कार है, न हास्य की कोई शालीनता। इसी प्रकार, 'लड़की वह गोरी होय' कविता में पुरुषवादी सामंती मानसिकता का फूहड़ प्रदर्शन है, भले ही वह परिहास के आवरण में क्यों न हो:
लड़की वह गोरी होय, भरी हुई तिजोरी होए।
पढ़ी भरपूर होए भई, हो जैसे कोई नायिका।।

इन पंक्तियों का अर्थ यह है कि विवाह के लिए एक ऐसी लड़की की चाह है जो गोरी हो, अमीर हो, और पढ़ी-लिखी नायिका जैसी हो। यह विषय हिंदी साहित्य में दशकों पहले घिस चुका है। आज के विमर्श-प्रधान युग में जहाँ स्त्री-अस्मिता और नारीवाद (Feminism) एक नए शिखर पर हैं, ऐसी रचनाएँ संग्रह के वैचारिक स्तर को नीचे गिराती हैं। यहाँ न कोई मानवीय संवेदना है, न शिल्प का कोई सौंदर्य। यह केवल शब्दों की उथली बाजीगरी है, जो एक गंभीर कवि के यश में वृद्धि नहीं करती। इन कविताओं का संपादन के समय ही निराकरण कर दिया जाना चाहिए था।

प्रशासनिक विडंबना : 'आदेश'

एक शिक्षक के रूप में अपनी पीड़ा को कवि ने 'आदेश' नामक एक छोटी सी कविता में बहुत ही व्यंग्यात्मक ढंग से प्रस्तुत किया है।

अध्यापक था अब अधिकारी हो गया।
जबसे मास्टर BLO प्रभारी हो गया।।

ये दो पंक्तियाँ भारत की पूरी शिक्षा-व्यवस्था और चुनाव-मशीनरी पर एक भयानक कटाक्ष हैं। अर्थ स्पष्ट है: एक शिक्षक का मूल कार्य पढ़ाना है, किंतु सरकार ने उसे 'बी.एल.ओ.' (Booth Level Officer) बनाकर कागजी अधिकारी बना दिया है। इस छोटे से संदर्भ का प्रभाव अत्यंत व्यापक है, क्योंकि यह बताता है कि कैसे राज्यसत्ता ज्ञान के निर्माताओं को क्लर्क में तब्दील कर रही है। यहाँ 'अधिकारी' शब्द में जो वक्रोक्ति (Irony) है, वह लाजवाब है। शिल्प की दृष्टि से यह मुक्तक या दोहे की शैली में रची गई मारक रचना है। इसमें कोई जटिल प्रतीक या बिंब नहीं है, फिर भी अपने सामाजिक सरोकार के कारण यह एक सफल रचना बन पड़ी है।

डॉ. विजय कुमार पुरी की कृति 'प्यारी अपनी धरती है' एक ऐसा काव्य-संग्रह है जो जीवन के अनेक रंगों, विसंगतियों, और त्रासदियों को एक साथ अपने भीतर समेटने का प्रयास करता है। मेरी दृष्टि में, इस पुस्तक की सबसे बड़ी उपलब्धि इसका विस्तृत विषय-फलक है। कवि ने स्वयं को केवल शृंगार या प्रकृति तक सीमित नहीं रखा है; उसने कोरोना महामारी के कष्टों ('कोरोना से बचना है'), नशे की लत ('अब नाहक ही पछता रहा हूँ'), सैनिक बलिदान ('कैसे कुर्बानियों को भूल जाएँ हम'), और केदारनाथ की जल-प्रलय जैसी युग-प्रवर्तक घटनाओं को अपनी कविता का विषय बनाया है। मानवीय संवेदनाओं को यथार्थ के खुरदरे धरातल पर प्रस्तुत करने में कवि सफल रहा है। 'दृश्य, जो भूलता ही नहीं' और 'मध्यवर्गीय प्राणी' जैसी कविताएँ इस संग्रह की अमूल्य निधियाँ हैं, जो पाठक के मन-मस्तिष्क को लंबे समय तक झकझोरती रहती हैं।
किंतु, कृति की सीमाएँ और कमजोरियाँ भी उतनी ही स्पष्ट हैं। शिल्प के स्तर पर डॉ. पुरी कई स्थानों पर मार खा जाते हैं। उनकी भाषा में वह कसावट और लाक्षणिकता नहीं है जो एक कालजयी कविता की माँग होती है। कई जगह कविताएँ निरे गद्य में तब्दील हो जाती हैं या फिर सस्ती तुकबंदी ('लड़की वह गोरी होय') का शिकार हो जाती हैं। छंद और लय का अनुशासन कई गीतों में टूटता है, जिससे उनकी गेयता बाधित होती है। दार्शनिक दृष्टि की बात करें तो, कवि के पास समाज की विसंगतियों को देखने वाली दृष्टि तो है, किंतु उसका कोई वैचारिक समाधान वह प्रस्तुत नहीं कर पाता। उसका आक्रोश कई बार मध्यवर्गीय कुंठा तक सिमट कर रह जाता है।

समकालीन हिंदी कविता जो आज अत्यधिक अमूर्त, अकादमिक और दुरूह होती जा रही है, उसके बरक्स डॉ. विजय कुमार पुरी का यह संग्रह आम आदमी की भाषा में, आम आदमी की बात करता है। यह एलीट (Elite) वर्ग के ड्राइंग रूम की कविता नहीं है; यह उस आदमी की कविता है जो गैस का सिलेंडर ढोता है, जो बारिश में बाढ़ के भय से काँपता है, और जो नशे में अपने परिवार को टूटता हुआ देखता है। भले ही शिल्प और कला-सौष्ठव की दृष्टि से यह कृति आलोचना के कई तीरों का लक्ष्य बने, किंतु अपनी प्रामाणिक अनुभूति, सीधे जुड़ाव और लोक-संपृक्तता के कारण यह समकालीन साहित्य में अपना एक अलग और महत्त्वपूर्ण स्थान अवश्य सुरक्षित करती है। यह पुस्तक उन पाठकों के लिए एक पठनीय अनुभव है जो कविता में जीवन की सादगी और यथार्थ की गूँज सुनना पसंद करते हैं।

-आचार्य प्रताप
अगस्त २१,२०३६
Achary Pratap

समालोचक , संपादक तथा पत्रकार प्रबंध निदेशक अक्षरवाणी साप्ताहिक संस्कृत समाचार पत्र

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