मेरा व्यय, मेरा समय, मेरा मत

मेरा व्यय, मेरा समय, मेरा मत

पुस्तक खरीदना और पुस्तक पढ़ना—दोनों काम देखने में सरल हैं, पर साहित्य के संसार में दोनों के बीच उतनी ही दूरी है जितनी खेत जोतने और फसल घर लाने में। पुस्तक खरीद ली, इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि अगले प्रभात तक उसकी समीक्षा भी लेखक के द्वार पर पहुँचा दी जाए। साहित्य कोई डाकखाना नहीं कि पुस्तक आई और अगले दिन उत्तर-पत्र रवाना!

मित्रों, जिन पुस्तकों को मैंने अपने श्रम की कमाई से स्वयं क्रय किया है, उन्हें पढ़ना मेरा निर्णय है और उनके विषय में लिखना भी मेरा अपना विवेक। मेरा व्यय, मेरा समय, मेरा मत। यह तीन शब्द किसी तानाशाही की घोषणा नहीं, बल्कि पाठक के स्वतंत्र अधिकार की विनम्र सूचना हैं।

कुछ रचनाकार पुस्तक भेजते ही मन में ऐसी फसल काटने लगते हैं मानो पुस्तक के साथ समीक्षा भी कूपन में लगी हो। आज पुस्तक भेजी, कल समीक्षा चाहिए और परसों उसे दस स्थानों पर साझा करने का आग्रह! भैया, साहित्य है, सरसों का साग नहीं कि चूल्हे पर चढ़ाया और थोड़ी देर में तैयार।

पुस्तक पढ़ने के लिए समय चाहिए। उसे समझने के लिए धैर्य चाहिए और उस पर लिखने के लिए उससे भी अधिक ईमानदारी चाहिए। समीक्षा यदि केवल पुस्तक प्राप्त होने की सूचना भर है, तो फिर पुस्तकालय में समीक्षक की आवश्यकता ही क्या रही? वहाँ तो डाकघर का बाबू भी काम चला देगा—“पुस्तक प्राप्त हुई, धन्यवाद।”

कई बार लेखक का आग्रह इतना आत्मीय होता है कि लगता है समीक्षा न लिखी तो साहित्य का पहिया ही रुक जाएगा। परंतु समीक्षा किसी संबंध की मिठाई नहीं कि थाली में रखी और प्रसन्नता के लिए खा ली। उसमें रचना के गुण-दोष दोनों देखने पड़ते हैं। जहाँ फूल हैं, वहाँ काँटे भी हो सकते हैं। केवल पुष्पगान करना आलोचना नहीं, और केवल काँटे गिनना भी साहित्य-सेवा नहीं।

गाँव में किसान किसी को बीज देकर अगले दिन खेत में खड़ी फसल देखने नहीं पहुँचता। वह जानता है कि धरती को अपना समय चाहिए। बीज डाल दिया तो बस, अब धूप, पानी, हवा और ऋतु अपना काम करेंगे। पुस्तक भी ऐसा ही बीज है। कभी वह एक बैठक में अंकुरित हो जाती है, कभी कई दिनों तक मन की मिट्टी में पड़ी रहती है।

एक बार एक सज्जन ने पुस्तक भेजकर कहा—“अब आपकी समीक्षा की प्रतीक्षा रहेगी।” मैंने मन ही मन कहा—“महाराज, पुस्तक आपकी है, पर पढ़ने का समय अभी मेरा है।” फिर सोचा, यही तो साहित्य की सुंदरता है—लेखक रचना को जन्म देता है, पर पाठक उसे अपने अनुभवों से नया जीवन देता है।

इसलिए ऐसे सभी रचनाकारों को मेरा सादर प्रणाम, जो पुस्तक भेजकर पाठक को स्वतंत्र छोड़ देते हैं। वे जानते हैं कि पाठक कोई प्रचार-पट्ट नहीं, संवेदनशील मनुष्य है। वह पढ़ेगा तो मन से पढ़ेगा और लिखेगा तो अपने विवेक से लिखेगा।

समीक्षा माँगने से नहीं, रचना के भीतर उतरने से जन्मती है। और आलोचना वही सार्थक है जिसमें लेखक को प्रशंसा के साथ आत्मदर्शन का अवसर भी मिले।

अतः पुस्तक भेजिए, प्रेम से भेजिए, विश्वास से भेजिए; पर उसके साथ समीक्षा की समय-सीमा मत भेजिए। क्योंकि पुस्तक पर लेखक का अधिकार हो सकता है, किंतु पाठ और मत पर पाठक का अधिकार रहता है।

बाकी, बघेली में कहें तो—“पुस्तक दे दिहौ, अब पढ़ै-बिचारै दैहौ; जल्दी का का है, खेतौ एक दिन में नाहीं पकत।”

साहित्य में धैर्य रखिए। अच्छी रचना देर से पढ़ी जाए तो भी अच्छी रहती है; पर जल्दबाजी में लिखी गई समीक्षा देर तक पछतावा दे सकती है।

मेरा व्यय, मेरा समय, मेरा मत—और साहित्य के प्रति मेरी ईमानदारी।

आचार्य प्रताप

#साहित्य #पुस्तक_पाठक_का_अधिकार #मेरा_व्यय_मेरा_समय_मेरा_मत #साहित्यिक_स्वतंत्रता #ईमानदार_समीक्षा #पाठकीय_स्वतंत्रता #साहित्य_संवाद #रचनाकार_का_सम्मान #समीक्षा_नहीं_प्रचार #पढ़ो_समझो_फिर_लिखो
Achary Pratap

समालोचक , संपादक तथा पत्रकार प्रबंध निदेशक अक्षरवाणी साप्ताहिक संस्कृत समाचार पत्र

Enregistrer un commentaire

आपकी टिप्पणी से आपकी पसंद के अनुसार सामग्री प्रस्तुत करने में हमें सहयता मिलेगी। टिप्पणी में रचना के कथ्य, भाषा ,टंकण पर भी विचार व्यक्त कर सकते हैं

Plus récente Plus ancienne