स्वर वर्ण : भाषा के प्राण, वाणी की आत्मा

एक साहित्यिक, भाषावैज्ञानिक एवं दार्शनिक विमर्श


ज्ञान तभी सार्थक होता है जब वह साझा किया जाए। भाषा और व्याकरण से संबंधित यह रोचक एवं महत्त्वपूर्ण जानकारी मुझे प्राप्त हुई, जिसे आप सभी तक पहुँचाने का मन हुआ। आशा है कि यह आलेख आपके अध्ययन, अध्यापन तथा चिंतन—तीनों के लिए उपयोगी सिद्ध होगा। आपके सुझाव एवं विचार सदैव स्वागतयोग्य हैं।

स्वर : भाषा की प्रथम स्पंदित ध्वनि

भाषा की यात्रा स्वर से प्रारंभ होती है। स्वर वह ध्वनि है जो किसी अन्य वर्ण के सहारे की अपेक्षा नहीं करती, अपितु स्वयं पूर्ण रूप से उच्चरित होती है। इसी कारण संस्कृत में कहा गया है—

«"स्वयं राजन्ते स्वराः।"»

अर्थात् जो स्वयं प्रकाशित हों, स्वयं गूँजें और अपने अस्तित्व से ध्वनित हों, वही स्वर हैं। वास्तव में स्वर ही भाषा के प्राण हैं; व्यंजन तो उनके सहयोगी मात्र हैं।


महेश्वर सूत्र और स्वरों का दिव्य उद्गम

भारतीय परंपरा के अनुसार भगवान शिव के डमरू से प्रकट हुए चौदह महेश्वर सूत्र समस्त वर्णमाला के मूल स्रोत माने जाते हैं। इनमें प्रारंभिक चार सूत्र इस प्रकार हैं—

1. अ इ उ ण्
2. ऋ लृ क्
3. ए ओ अङ्
4. ऐ औ च्

इन सूत्रों में ण्, क्, अङ् तथा च् केवल व्याकरणिक संकेत (इत्-वर्ण) हैं; इनका स्वतंत्र उच्चारण नहीं किया जाता। इस प्रकार अ से औ तक की समस्त ध्वनियाँ स्वर हैं, जो भाषा की मूल चेतना का निर्माण करती हैं।

स्वरों की मात्राएँ : ध्वनि की लय

स्वरों की अवधि का अत्यंत सुंदर वर्णन इस श्लोक में मिलता है—

«"एकमात्रा भवेत् ह्रस्वो द्विमात्रो दीर्घ उच्यते।
त्रिमात्रः प्लुतः प्रोक्तः स्वरेषु त्रिविधा गतिः।।"»

इस आधार पर—

- ह्रस्व स्वर — एक मात्रा (अ, इ, उ, ऋ)
- दीर्घ स्वर — दो मात्राएँ (आ, ई, ऊ आदि)
- प्लुत स्वर — तीन मात्राएँ (विशेष वैदिक प्रयोग, जैसे ओ३म्)

जबकि व्यंजन की ध्वनि सामान्यतः अर्धमात्रा की मानी जाती है।

पतञ्जलि का स्वर-दर्शन

महर्षि पतञ्जलि ने महाभाष्य में स्वर की आत्मनिर्भरता का अत्यंत सूक्ष्म विवेचन किया है। उनके अनुसार—

«"स्वरः आत्मध्वनिः।"»

अर्थात् स्वर स्वयं प्रकट होने वाली ध्वनि है। वे आगे स्पष्ट करते हैं कि स्वर किसी विशिष्ट उच्चारण-स्थान अथवा केवल प्राण-वायु पर निर्भर नहीं होता, बल्कि उसकी स्वतंत्र ध्वन्यात्मक सत्ता होती है।

संस्कृत और हिंदी के स्वर

संस्कृत में परंपरागत रूप से १३ स्वर माने गए हैं—

- ह्रस्व — अ, इ, उ, ऋ, लृ
- दीर्घ — आ, ई, ऊ, ॠ
- संयुक्त स्वर — ए, ऐ, ओ, औ

हिंदी में सामान्यतः ११ स्वर स्वीकार किए जाते हैं—

- ह्रस्व — अ, इ, उ, ऋ
- दीर्घ — आ, ई, ऊ
- संयुक्त स्वर — ए, ऐ, ओ, औ

विश्व की भाषाओं में स्वर

स्वर केवल भारतीय भाषाओं की विशेषता नहीं, बल्कि विश्व की लगभग प्रत्येक भाषा की आधारशिला हैं।

- अंग्रेज़ी — A, E, I, O, U (कभी-कभी Y)
- लैटिन — A, E, I, O, U (ह्रस्व एवं दीर्घ रूपों सहित)
- अरबी — फ़तह (अ), कसरह (इ), ज़म्मा (उ)
- यूनानी (ग्रीक) — α, ε, η, ι, ο, υ, ω

प्रत्येक भाषा में स्वर ही ध्वनि के प्रथम आधार हैं और शब्द-निर्माण की मूल शक्ति भी।

स्वर का दार्शनिक आयाम

भारतीय दर्शन में 'अ' को समस्त ध्वनियों का मूल माना गया है। ॐ (ओ३म्) की संरचना भी—

अ + उ + म = ॐ

से मानी जाती है।

यह केवल एक ध्वनि नहीं, बल्कि नाद-ब्रह्म, चेतना, सृष्टि और परम सत्य का प्रतीक है। भारतीय चिंतन में स्वर केवल भाषिक तत्व नहीं, बल्कि आध्यात्मिक अनुभूति का भी माध्यम हैं।

स्वर भाषा की आत्मा हैं, वाणी की स्पंदित चेतना हैं और अभिव्यक्ति के प्रथम प्राण हैं। व्यंजन उन्हें आकार देते हैं, पर जीवन स्वर ही प्रदान करते हैं। वैदिक संस्कृत से लेकर आधुनिक भाषाओं तक, प्रत्येक वर्णमाला स्वर से आरंभ होती है और प्रत्येक संवेदना भी अंततः किसी न किसी स्वर में ही अभिव्यक्त होती है।

वस्तुतः स्वर केवल ध्वनियाँ नहीं, बल्कि मानव चेतना की प्रथम अनुगूँज हैं; वे भाषा को शब्द देते हैं, शब्दों को अर्थ देते हैं और अर्थ को जीवन प्रदान करते हैं।
Achary Pratap

समालोचक , संपादक तथा पत्रकार प्रबंध निदेशक अक्षरवाणी साप्ताहिक संस्कृत समाचार पत्र

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