शिक्षा का मंदिर
बड़े-बड़े भाषणों में शिक्षा को राष्ट्र निर्माण की रीढ़ बताया जाता है, लेकिन जब रीढ़ को ही आधा कर दिया जाए तो शरीर कब तक सीधा चलेगा? विद्यालयों में खाली कुर्सियाँ रोज़ बच्चों से पूछती हैं—"हमारे शिक्षक कब आएँगे?" और चयनित अभ्यर्थी नियुक्ति सूची को ऐसे निहार रहे हैं जैसे किसान बादलों को।
यह कैसी नीति है कि खेत सूखा पड़ा है, कुआँ भरा है, पानी भी मौजूद है, फिर भी फसल को प्यासा रखा जा रहा है? लगता है फाइलों ने भी अब सरकारी कुर्सियों का संस्कार सीख लिया है—चलेंगी तभी, जब उन्हें धक्का नहीं, धक्का-मुक्की मिले।
युवाओं की माँग कोई खैरात नहीं, उनका अधिकार है। रिक्त पदों पर समयबद्ध नियुक्ति हो, शेष चयनित अभ्यर्थियों को अवसर मिले और विद्यालयों तक शिक्षक पहुँचें। आखिर शिक्षा का दीपक भाषणों से नहीं, शिक्षकों से जलता है। वरना आने वाली पीढ़ियाँ यही पढ़ेंगी कि इस दौर में सबसे कठिन विषय "भर्ती प्रक्रिया" था, जिसका उत्तर आज तक किसी विभाग के पास नहीं मिला।
आचार्य प्रताप