कलंक, चढ़ावा और भगवान की गवाही
हमारे देश में भगवान बड़े उदार हैं। वे अपने भक्तों को सब कुछ दे देते हैं—आस्था, आश्रय, आश्वासन और कभी-कभी आरोप भी। फर्क बस इतना है कि आस्था का प्रमाण भक्त देता है और आरोप का प्रमाण जाँच एजेंसी खोजती रहती है।
राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी का मामला भी बड़ा विचित्र है। भगवान के दरबार में जो चढ़ाया गया, वह भक्त ने यह सोचकर चढ़ाया कि अब यह सीधे प्रभु के खाते में जमा हो गया। लेकिन बीच में मनुष्य नाम का एक ऐसा "बैंक" निकला, जिसमें जमा और निकासी का हिसाब भक्त से ज़्यादा कर्मचारियों को मालूम रहता है।
अब कहा जा रहा है कि "मैं कलंक लेकर अयोध्या से नहीं जाऊँगा।"
यह वाक्य सुनकर लगा कि कलंक भी कोई गठरी है, जिसे कंधे पर रखकर स्टेशन तक ले जाना पड़ता है। जैसे टिकट चेकर पूछे—"सामान कितना है?" और उत्तर मिले—"दो बैग, एक झोला और आधा किलो कलंक।"
विडंबना यह है कि हमारे यहाँ आरोप लगते ही लोग दो काम करते हैं—पहला, अपने सादे कमरे की तस्वीर दिखाते हैं; दूसरा, भगवान की मूर्ति की ओर इशारा कर देते हैं। मानो ईमानदारी का मापदंड बैंक बैलेंस नहीं, चारपाई की चादर और कमरे की सादगी हो।
सादगी का सम्मान होना चाहिए, लेकिन सादगी कभी प्रमाण नहीं होती। इतिहास में कई बड़े छल साधारण वेशभूषा में ही हुए हैं। धोती और कुर्ता चरित्र प्रमाणपत्र नहीं होते, जैसे सूट-बूट अपराध का सबूत नहीं होते।
कहा गया कि "टिन्नू यादव ने धोखा दे दिया।"
भारतीय व्यवस्था का सबसे सुविधाजनक शब्द है—धोखा। जब तक काम चलता है, वह सहयोगी होता है; जैसे ही मामला खुलता है, वही धोखेबाज़ घोषित हो जाता है। ऐसा लगता है जैसे हर व्यवस्था में एक "टिन्नू" पहले से नियुक्त रहता है, ताकि ज़रूरत पड़ने पर पूरा दोष उसी पर डाल दिया जाए।
सबसे मार्मिक दृश्य वह है, जब भगवान राम की मूर्ति की ओर देखकर कहा जाता है—"इन्होंने आरोप लगवाए हैं तो यही हटाएँगे।"
राम मुस्कुरा रहे होंगे। वे सोचते होंगे—"वनवास मैंने भोगा, अग्निपरीक्षा सीता ने दी, और अब जाँच रिपोर्ट भी मुझे ही लिखनी है!"
हमने भगवान को न्याय का प्रतीक बनाया था, पर अब उन्हें प्रेस प्रवक्ता भी बना दिया है। जहाँ जवाब मनुष्य को देना चाहिए, वहाँ भगवान को गवाह बना दिया जाता है।
सच यह है कि मंदिर की सबसे बड़ी रक्षा ऊँचे शिखरों से नहीं, पारदर्शिता से होती है। श्रद्धा चढ़ावे से नहीं टूटती, बल्कि चढ़ावे के हिसाब पर उठे संदेह से टूटती है। भक्त भगवान को दान देता है, किसी व्यक्ति को संदेह का लाभ देने के लिए नहीं।
यदि आरोप झूठे हैं तो निष्पक्ष जाँच उन्हें धो देगी। यदि आरोप सही हैं तो कोई मूर्ति, कोई सादगी और कोई भावुक संवाद उस कलंक को नहीं धो सकता। क्योंकि न्याय का काम भावना नहीं, तथ्य करते हैं।
व्यंग्य की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि राम आज भी मंदिर में विराजमान हैं, लेकिन उनके नाम पर मनुष्य एक-दूसरे की नीयत तौल रहे हैं। रामायण में तो राम ने राज्य के लिए अपना सुख त्याग दिया था; आज कहीं-कहीं लोग राम के नाम पर अपने ऊपर लगे आरोपों का भार भी राम पर छोड़ देना चाहते हैं।
अंततः प्रश्न किसी व्यक्ति का नहीं है। प्रश्न यह है कि क्या हमारी आस्था इतनी मज़बूत है कि वह सत्य का सामना कर सके? यदि हाँ, तो जाँच से डर कैसा? और यदि नहीं, तो फिर मंदिर पत्थरों से बनेगा, विश्वास से नहीं।
राम को कलंक हटाने की नहीं, सत्य प्रकट करने की आदत है। इसलिए बेहतर होगा कि निर्णय भगवान पर नहीं, प्रमाणों पर छोड़ दिया जाए। क्योंकि भगवान न्याय कर सकते हैं, पर हिसाब-किताब मनुष्य को ही देना पड़ता है।
आचार्य प्रताप
#राम_मंदिर, #अयोध्या, #राम_भक्ति, #श्रद्धा, #पारदर्शिता, #जवाबदेही, #व्यंग्य, #हिंदी_साहित्य, #सामाजिक_व्यंग्य, #कटाक्ष, #सत्य, #न्याय, #चढ़ावा, #आस्था, #लोकतंत्र, #जनमत, #भ्रष्टाचार, #धर्म_और_नैतिकता, #राम_नाम, #विचार_मंथन