उत्कोचपुराण : जहाँ बिना चढ़ावे देवता भी मौन रहते हैं

उत्कोचपुराण : जहाँ बिना चढ़ावे देवता भी मौन रहते हैं

कहा जाता है कि भारत आस्था का देश है। यहाँ मनुष्य देवालय में जाकर पहले प्रसाद चढ़ाता है, फिर प्रार्थना करता है। धीरे-धीरे यह परंपरा इतनी विकसित हुई कि अब सरकारी कार्यालय भी किसी नए प्रकार के देवालय प्रतीत होने लगे हैं। अंतर केवल इतना है कि वहाँ घंटी नहीं बजती, फाइल बजती है; वहाँ आरती नहीं होती, टिप्पणी लिखी जाती है; और वहाँ प्रसाद की जगह उत्कोच चढ़ाया जाता है। जिसके पास चढ़ावा है, उसके लिए बंद द्वार भी अपने आप खुल जाते हैं। जिसके हाथ खाली हैं, उसकी फाइल वर्षों तक ऐसे सोती रहती है जैसे जेठ की दोपहर में तालाब का मेंढक।

हमारे यहाँ शासन का पहिया नियमों से कम और संकेतों से अधिक चलता दिखाई देता है। नियम तो दीवार पर टंगे रहते हैं, किंतु काम मेज़ के नीचे से निकलता है। कोई कहता है—स्थानांतरण कराना है? "व्यवस्था" करनी पड़ेगी। दूसरा कहता है—स्थानांतरण रुकवाना है? उसके लिए भी "व्यवस्था" चाहिए। नौकरी चाहिए तो अलग व्यवस्था, नौकरी बचानी है तो दूसरी व्यवस्था, किसी को पद दिलाना है तो अलग मार्ग, किसी को हटाना है तो दूसरी डगर। ऐसा लगता है मानो शासन का पूरा व्याकरण एक ही शब्द पर टिक गया हो—"व्यवस्था"। और यह व्यवस्था इतनी सर्वव्यापी है कि बिना उसके सरकारी कलम भी जैसे स्याही पीने से मना कर देती है।
गाँव का एक भोला किसान शहर आया। उसने सोचा कि सरकार ने नागरिकों की सुविधा के लिए कार्यालय बनाए होंगे। वह बड़े विश्वास से पहुँचा। बाबू ने उसकी ओर ऐसे देखा जैसे खेत में घुस आए बछड़े को किसान देखता है। किसान ने अपनी समस्या बताई। उत्तर मिला—"काम तो हो जाएगा, पर थोड़ा ध्यान रखना पड़ेगा।" किसान बेचारा समझा कि शायद कोई कागज़ कम होगा। उसने अगले दिन पूरा गठ्ठर ले आया। बाबू मुस्कराया—"अरे, कागज़ नहीं, समझदारी चाहिए।" किसान तब भी नहीं समझा। तीसरे दिन एक अनुभवी आदमी ने कान में कहा—"भैया, यहाँ बैल नहीं, नोट जोतो; तभी खेत हरा होगा।" किसान का माथा ठनका। उसे पहली बार पता चला कि सरकारी फसल पानी से नहीं, 'चढ़ावे' से सींची जाती है।

आज तो स्थिति यह है कि कार्यालयों में कुर्सियाँ कम और दलालों की परछाइयाँ अधिक दिखाई देती हैं। वे किसी परिचय-पत्र की तरह हर मेज़ तक पहुँच रखते हैं। नागरिक सोचता है कि वह शासन से मिल रहा है, पर बीच में कई अदृश्य पुल खड़े मिलते हैं। जैसे कुएँ तक पहुँचने से पहले दस रस्सियाँ पकड़नी पड़ें। अंततः पानी तो मिलता है, पर प्यास से अधिक जेब सूख जाती है।

सबसे विचित्र बात यह है कि इस रोग को सभी जानते हैं। देने वाला भी जानता है कि वह अनुचित कर रहा है, लेने वाला भी जानता है कि वह अनुचित ले रहा है। दोनों की दृष्टि मिलती है, दोनों मुस्कराते हैं, और व्यवस्था अपनी पीठ थपथपाकर कहती है—"देखो, कितना सुचारु काम हो रहा है!" मानो ईमानदारी अब संग्रहालय में रखी कोई दुर्लभ वस्तु हो, जिसे केवल बच्चे भ्रमण के समय देखकर लौट आते हैं।

कभी-कभी लगता है कि यदि किसी कार्यालय में कोई अधिकारी बिना उत्कोच लिए काम कर दे तो समाचार बन जाए—"आज एक अद्भुत घटना घटी। एक नागरिक का कार्य केवल नियमों के आधार पर हो गया।" लोग देखने पहुँचें कि वह अधिकारी सचमुच मनुष्य है या किसी प्राचीन कथा का पात्र।

प्रेमचंद के गाँव का होरी यदि आज जीवित होता तो शायद बैल बेचकर लगान नहीं भरता, पहले फाइल चलाने की चिंता करता। धनिया कहती—"अरे, खेत बाद में जोत लेना, पहले कार्यालय की मिट्टी जोत आओ। वहाँ बिना खाद डाले कुछ नहीं उगता।" गाँव का बुज़ुर्ग जोड़ देता—"बेटा, सीधी उँगली से घी नहीं निकलता, पर अब तो टेढ़ी उँगली भी तब तक बेकार है जब तक हथेली गरम न हो।"

विडंबना यह है कि हम सब इस व्यवस्था की आलोचना भी करते हैं और अवसर आने पर उसी में सहभागी भी बन जाते हैं। हम चाहते हैं कि हमारा काम पहले हो, चाहे नियम बाद में आएँ। यही वह क्षण है जहाँ भ्रष्टाचार केवल कार्यालय की मेज़ पर नहीं रहता, वह हमारे भीतर भी अपना छोटा-सा आसन जमा लेता है। फिर हम दोष केवल शासन को देते हैं, स्वयं को नहीं। जबकि खेत में काँटे बोकर आम की आशा करना वैसा ही है जैसे अनैतिक साधनों से नैतिक समाज की कामना करना।

व्यंग्य की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि जिस उत्कोच को लोग सुविधा-शुल्क कहकर हल्का बना देते हैं, वही धीरे-धीरे राष्ट्र की रीढ़ पर बोझ बन जाता है। इससे योग्य पीछे छूट जाता है, अयोग्य आगे निकल जाता है, और नागरिक का विश्वास चूल्हे की बुझी राख की तरह ठंडा पड़ जाता है। जब न्याय बिकने का भ्रम पैदा हो जाए, तब परिश्रम का मूल्य भी घटने लगता है।

समय आ गया है कि हम सरकारी कार्यालयों को फिर से सेवा का स्थान मानें, सौदे का नहीं। शासन का सम्मान तभी बढ़ेगा जब नियम का मूल्य नोट से अधिक होगा, और नागरिक का आत्मसम्मान तभी बचेगा जब वह अपने अधिकार को किसी कृपा का दान न समझे। जिस दिन बिना किसी "व्यवस्था" के सामान्य नागरिक का कार्य सहजता से होने लगेगा, उस दिन लोकतंत्र सचमुच उत्सव होगा, केवल भाषण का विषय नहीं।

आखिर किसी राष्ट्र की पहचान उसके ऊँचे भवनों से नहीं, बल्कि उन भवनों के भीतर बैठे लोगों की निष्ठा से होती है। यदि ईमानदारी फिर से कार्यालयों की चौखट पर लौट आए, तो समझिए कि राष्ट्र ने केवल व्यवस्था नहीं सुधारी, अपने चरित्र का पुनर्निर्माण कर लिया।

आचार्य प्रताप

#उत्कोच, #भ्रष्टाचार, #व्यंग्य, #हिन्दी_व्यंग्य, #सरकारी_कार्यालय, #लोकतंत्र, #सुशासन, #प्रशासन, #नौकरशाही, #ईमानदारी, #व्यवस्था_पर_कटाक्ष, #सामाजिक_चिंतन, #हिन्दी_साहित्य, #मौलिक_लेखन, #साहित्यिक_व्यंग्य, #जनहित, #सत्य_का_आईना
Achary Pratap

समालोचक , संपादक तथा पत्रकार प्रबंध निदेशक अक्षरवाणी साप्ताहिक संस्कृत समाचार पत्र

Enregistrer un commentaire

आपकी टिप्पणी से आपकी पसंद के अनुसार सामग्री प्रस्तुत करने में हमें सहयता मिलेगी। टिप्पणी में रचना के कथ्य, भाषा ,टंकण पर भी विचार व्यक्त कर सकते हैं

Plus récente Plus ancienne