चुनाव का पंचांग और बेरोज़गारी का वनवास

चुनाव का पंचांग और बेरोज़गारी का वनवास

लोकतंत्र बड़ा विचित्र जीव है। यह पाँच वर्ष तक गहरी निद्रा में सोता है और चुनाव आते ही ऐसे अंगड़ाई लेता है, मानो अभी-अभी जनसेवा की तपस्या पूरी करके लौटा हो। इस समय उसे हर गली में भविष्य दिखाई देता है, हर चौपाल में विकास और हर युवा में मतदाता। किंतु जैसे ही मतपेटियाँ बंद होती हैं, वही युवा फिर से आँकड़ों का अंक बन जाता है। उसकी आशाएँ फाइलों के बीच वैसे ही दब जाती हैं, जैसे पुरानी संदूक में रखा विवाह का निमंत्रण-पत्र।

मध्य प्रदेश की उच्च माध्यमिक शिक्षक भर्ती 2023 भी इन दिनों कुछ ऐसी ही कथा कह रही है। हजारों अभ्यर्थी नियुक्ति की प्रतीक्षा में बैठे हैं। कोई द्वितीय काउंसलिंग की राह देख रहा है, कोई पदवृद्धि की आशा में आँखें बिछाए है। प्रतीक्षा भी कैसी? जैसे किसान बादलों को ताकता है। बादल आते हैं, गरजते हैं, हवा बहती है, पर बरसते कहीं और हैं।
ऐसे ही एक दिन चाचा चौधरी ने साबू से पूछा, "भाई साबू! यह शिक्षक भर्ती का रथ आखिर किस दलदल में फँस गया? हजारों युवक दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं, पर शासन की आँख क्यों नहीं खुलती?"

साबू ने अपनी विशाल भुजाएँ समेटते हुए मुस्कराकर कहा, "चाचा, इसमें सोचने की क्या बात है? अभी चुनाव नहीं हैं।"

चाचा ने चश्मा ठीक किया, "तो?"

साबू बोला, "लोकतंत्र का कैलेंडर बड़ा सीधा है। उसमें केवल दो ऋतुएँ होती हैं—एक चुनाव ऋतु और दूसरी प्रतीक्षा ऋतु। चुनाव ऋतु में जनता देवता होती है, प्रतीक्षा ऋतु में वही जनता आवेदन संख्या बन जाती है।"

चाचा कुछ देर तक सोचते रहे। फिर बोले, "तो क्या शासन केवल चुनाव देखकर जागता है?"

साबू हँस पड़ा, "चाचा! आपने कभी देखा है कि गाँव का पुराना कुआँ कब साफ होता है? जब बरसात सिर पर आ जाती है। इसी प्रकार फाइलें भी तब दौड़ती हैं, जब मतों की बरसात निकट हो।"

यह सुनकर सामने बैठे एक युवक ने कहा, "हम तो सोचते थे कि योग्यता सबसे बड़ी सिफारिश होती है।"

साबू ने उसकी ओर देखा और बोला, "बेटा, योग्यता तो दीपक है, पर उसे जलाने के लिए शासन की तीली भी चाहिए।"

यह बात सुनते ही भीड़ में ऐसी निस्तब्धता छा गई, जैसे किसी ने मेले में अचानक शंख बजा दिया हो।

हमारा समाज भी बड़ा अद्भुत है। जब कोई युवा प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करता है, तब सब कहते हैं—"मेहनत करो, फल अवश्य मिलेगा।" वह दिन-रात एक कर देता है। परिवार खेत बेच देता है, माता अपने गहने गिरवी रख देती है, पिता अपनी वृद्धावस्था का सहारा बेटे की सफलता में खोजता है। परीक्षा होती है, परिणाम आता है, चयन भी हो जाता है। बस उसके बाद आरंभ होता है भारतीय प्रशासन का सबसे लंबा अध्याय—"प्रतीक्षा"।

यह प्रतीक्षा ऐसी होती है कि राम का चौदह वर्ष का वनवास भी छोटा लगे। यहाँ न कोई निश्चित अवधि, न कोई निश्चित उत्तर। केवल आश्वासन की गठरी सिर पर रखे युवा एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय तक वैसे ही घूमता है, जैसे बैल तेली के कोल्हू में घूमता रहता है—चलता बहुत है, पहुँचता कहीं नहीं।

सबसे विचित्र बात यह है कि जब यही युवक अपनी माँ से पूछता है, "अम्मा! नियुक्ति कब होगी?" तो माँ कहती है, "बेटा, धैर्य रखो।" पिता कहते हैं, "सरकार बड़ी होती है, देर-सवेर न्याय करेगी।" और सरकार शायद सोचती होगी, "इतना धैर्य है तो थोड़ा और सही।"

लोकतंत्र में धैर्य सबसे सस्ता संसाधन है। सड़क टूट जाए—धैर्य रखो। अस्पताल में दवा न मिले—धैर्य रखो। भर्ती अटक जाए—धैर्य रखो। लगता है जैसे धैर्य ही राष्ट्रीय संपत्ति घोषित कर दिया गया हो।

शिक्षक भर्ती केवल नौकरी का प्रश्न नहीं है। यह उन विद्यालयों का भी प्रश्न है जहाँ आज भी अनेक कक्षाएँ रिक्त पदों के कारण प्रभावित होती हैं। यह उन विद्यार्थियों का प्रश्न है जिन्हें योग्य शिक्षक चाहिए। और यह उन परिवारों का प्रश्न है जिनकी आशाएँ नियुक्ति-पत्र के एक हस्ताक्षर पर टिकी हैं। इसलिए इस विषय को केवल प्रशासनिक फाइल मान लेना, ऊँट के मुँह में जीरा रखने जैसा समाधान है।

सरकारें आती-जाती रहती हैं, पर निर्णयों की देरी यदि युवाओं के विश्वास को खा जाए, तो वह किसी भी शासन के लिए शुभ संकेत नहीं होती। समय पर लिया गया निर्णय केवल नियुक्ति नहीं देता, वह व्यवस्था पर भरोसा भी लौटाता है।

चाचा चौधरी ने अंत में साबू से कहा, "यदि शासन को युवाओं की आवाज़ सुनाई नहीं देती, तो दोष कानों का नहीं, मन का है।"

साबू ने आकाश की ओर देखा और बोला, "चाचा, लोकतंत्र की सबसे बड़ी परीक्षा चुनाव नहीं, बल्कि चुनावों के बीच का समय होता है। यदि उसी समय जनता की सुन ली जाए, तो चुनावों में न नारों की आवश्यकता पड़े और न वादों की।"

शायद यही बात हर उस फाइल पर लिख देनी चाहिए जो वर्षों से किसी मेज़ पर धूल खा रही है—"युवाओं के सपनों की भी एक समाप्ति तिथि होती है; निर्णय समय पर ही सबसे बड़ा न्याय है।"


आचार्य प्रताप

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Achary Pratap

समालोचक , संपादक तथा पत्रकार प्रबंध निदेशक अक्षरवाणी साप्ताहिक संस्कृत समाचार पत्र

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