धागे में बहता करंट और श्रद्धा का विज्ञान

धागे में बहता करंट और श्रद्धा का विज्ञान

श्रावण मास की आहट होते ही मन अपने आप "हर-हर महादेव" के स्वर में भीगने लगता है। वर्षा की पहली बूँद जब धरती को स्पर्श करती है, तब ऐसा लगता है मानो स्वयं प्रकृति भगवान आशुतोष का अभिषेक कर रही हो। इसी पावन समय में मुझे पिछले वर्ष की महाशिवरात्रि का एक प्रसंग स्मरण हो आया, जिसने यह सिखाया कि संसार में सबसे कठिन कार्य पूजा करना नहीं, बल्कि श्रद्धा को समझाना है।

हमारे घर में विधिपूर्वक रुद्राभिषेक चल रहा था। आचार्य मंत्रोच्चार कर रहे थे, "ॐ नमो भगवते रुद्राय..." का गंभीर निनाद वातावरण को शिवमय बना रहा था। श्रृंगी से जलधारा शिवलिंग पर प्रवाहित हो रही थी। परंपरा के अनुसार श्रृंगी में एक धागा बाँधा गया था। उसके एक सिरे को पिताश्री ने पकड़ रखा था और उसी धागे को परिवार के अन्य सदस्य श्रद्धापूर्वक स्पर्श किए बैठे थे। सबके मन में एक ही भावना थी—हम सब मिलकर भगवान भोलेनाथ का अभिषेक कर रहे हैं।
इतने में एक पड़ोसी सज्जन पधार गए। वे ऐसे धर्मप्रेमी थे, जिनकी धर्म में आस्था कम और दूसरों की पूजा-पद्धति में त्रुटि खोजने में अधिक श्रद्धा थी। कुछ देर तक सब देखते रहे, फिर उनके भीतर का तर्कशास्त्री जाग उठा।

बोले—"अरे भैया! पुण्य तो केवल इन्हीं को मिलेगा जिन्होंने सीधे श्रृंगी पकड़ रखी है। तुम लोग तो बस धागा पकड़े बैठे हो। धागा पकड़ने से भी कहीं रुद्राभिषेक होता है?"

उनकी बात सुनकर क्षणभर के लिए सब मौन हो गए। अब यदि शास्त्र खोलकर समझाते, तो उन्हें लगता कि अपनी बात मनवा रहे हैं। तभी मन में सहज ही एक विचार आया।

मैंने मुस्कुराकर कहा—"दद्दा, एक बात पूछें?"

वे बोले—"पूछो।"

मैंने कहा—"यह जो आपके घर में छत का पंखा घूमता है, वह बिजलीघर से कितनी दूर होगा?"

वे बोले—"बहुत दूर।"

मैंने फिर पूछा—"तो चलता कैसे है?"

उन्होंने सहज उत्तर दिया—"तार से बिजली पहुँचती है।"

मैंने कहा—"बस दद्दा, यही तो बात है। जब ताँबे का एक साधारण तार सैकड़ों किलोमीटर दूर से विद्युत प्रवाहित करके पंखा घुमा सकता है, मोटर चला सकता है, दीपक जला सकता है, तब श्रद्धा का यह धागा भावों का संचार क्यों नहीं कर सकता? यदि भौतिक विज्ञान तार की शक्ति स्वीकार करता है, तो अध्यात्म श्रद्धा के सूत्र को क्यों नहीं माने?"

वे कुछ क्षण तक मुझे देखते रहे। शायद उन्हें लगा कि उत्तर तो सरल था, पर प्रश्न थोड़ा भारी पड़ गया।

हमारे गाँव में एक कहावत कही जाती है—"जेकरे मन मा नेह, ओकर लगे देव।" अर्थात जिसके मन में सच्चा भाव है, भगवान उसी के निकट हैं। भगवान ने कभी यह नहीं कहा कि मुझे केवल वही जल अर्पित करे जिसके हाथ सीधे पात्र तक पहुँचें। वे तो उस शबरी के बेर भी स्वीकार कर लेते हैं, जो प्रेम से भरे हों। वे तो विदुर के घर का सादा साग भी ग्रहण कर लेते हैं। वहाँ पात्र नहीं, भावना देखी जाती है।

आजकल बड़ी विचित्र स्थिति है। लोग पूजा की विधि पर घंटों विवाद कर लेते हैं, पर पूजा का उद्देश्य भूल जाते हैं। किसी को जल के पात्र से आपत्ति है, किसी को आसन से, किसी को दिशा से, किसी को उच्चारण से। लगता है जैसे भगवान से अधिक चिंता भक्तों को भगवान की होने लगी है।

दद्दा भी ऐसे ही थे। उन्हें धागा दिखाई दिया, पर वह भाव नहीं दिखाई दिया जिसने उस धागे को परिवार के प्रत्येक सदस्य से जोड़ रखा था। सच तो यह है कि धागा केवल सूत का नहीं था; वह श्रद्धा, सहभागिता और पारिवारिक एकात्मता का सूत्र था।

बघेलखंड में बुजुर्ग अक्सर कहते हैं—"दद्दा, पूज-पाठ मा हाथ से जियादा मन लागै चाही।" यही सनातन परंपरा का सार है। हाथ का स्पर्श सीमित होता है, मन का स्पर्श असीम।

उस दिन दद्दा कुछ देर शांत रहे। जाते-जाते केवल इतना बोले—"बात तो ठीक कहे रहे भैया।"

मैं मन ही मन मुस्कुरा दिया। मुझे लगा कि उस दिन रुद्राभिषेक केवल शिवलिंग का नहीं हुआ था; एक भ्रांति का भी अभिषेक हुआ था। जल भगवान पर चढ़ रहा था, और ज्ञान का एक छोटा-सा छींटा मन पर भी पड़ गया था।

श्रावण मास फिर आने वाला है। संभव है इस बार भी कोई पूछ बैठे कि "धागा पकड़ने से क्या होता है?" तब मैं फिर यही कहूँगा—"दद्दा, जहाँ बिजली तार से चल सकती है, वहाँ श्रद्धा धागे से क्यों नहीं? विज्ञान पदार्थ का संचार करता है, और श्रद्धा परमात्मा तक भाव का। दोनों अपने-अपने क्षेत्र में समान रूप से सत्य हैं।"

हर-हर महादेव!

आचार्य प्रताप 

#श्रावण_मास, #महादेव, #हरहरमहादेव, #ॐनमःशिवाय, #रुद्राभिषेक, #शिवभक्ति, #सनातन_संस्कृति, #श्रद्धा, #आस्था, #शिव_आराधना, #भगवान_शिव, #श्रावण, #Spirituality, #Mahadev, #HarHarMahadev, #OmNamahShivaya, #Rudrabhishek, #Shiva, #SanatanDharma, #Faith, #Devotion, #IndianCulture, #HinduTradition, #ShravanMonth, #bhakti
Achary Pratap

समालोचक , संपादक तथा पत्रकार प्रबंध निदेशक अक्षरवाणी साप्ताहिक संस्कृत समाचार पत्र

Enregistrer un commentaire

आपकी टिप्पणी से आपकी पसंद के अनुसार सामग्री प्रस्तुत करने में हमें सहयता मिलेगी। टिप्पणी में रचना के कथ्य, भाषा ,टंकण पर भी विचार व्यक्त कर सकते हैं

Plus récente Plus ancienne