ओला ड्राइवर': जीवन-यात्रा के बहाने मानवीय संवेदना की तलाश

पुस्तक समीक्षा

पुस्तक का नाम: ओला ड्राइवर
लेखिका: इन्द्रजीत कौर
विधा: कहानी संग्रह
प्रकाशक का नाम: शब्दांकुर प्रकाशन,  नई दिल्ली
प्रकाशन पृष्ठ: 100 पृष्ठ (सत्रह कहानियाँ)
प्रकाशन वर्ष: प्रथम संस्करण 2022
आई.एस.बी.एन. नम्बर: 978-93-91546-50-2
पुस्तक का मूल्य: ₹200/- मात्र

ओला ड्राइवर': जीवन-यात्रा के बहाने मानवीय संवेदना की तलाश

समीक्षक - आचार्य प्रताप

इंद्रजीत कौर रचित कहानी-संग्रह 'ओला ड्राइवर' हिंदी की उस विरल परंपरा से जुड़ता है जहाँ एक सामान्य-सा दिखने वाला व्यावसायिक ढाँचा कथा-संरचना का आधार बनकर संपूर्ण समाज का प्रतिनिधि दर्पण बन जाता है। सत्रह कहानियों का यह संग्रह, जिन्हें लेखिका ने परंपरागत शीर्षकों के स्थान पर 'सवारी नंबर 1' से 'सवारी नंबर 17' तक क्रमांकित किया है, वस्तुतः एक ही सूत्रधार - एक ओला चालक युवा - की दृष्टि से रचा गया बहुकोणीय जीवन-वृत्तांत है। यह संरचनात्मक चयन ही कृति की सबसे बड़ी मौलिकता है, क्योंकि इसके माध्यम से लेखिका ने कथा-कथन की एक ऐसी युक्ति गढ़ी है जो बोकाचियो के 'डेकैमरॉन' अथवा चौसर की 'कैंटरबरी टेल्स' की स्मृति दिलाते हुए भी पूर्णतः समकालीन भारतीय, विशेषतः दिल्ली महानगरीय, यथार्थ में प्रतिष्ठित है।




'ओला ड्राइवर' शीर्षक अपने आप में एक व्यंजनापूर्ण रूपक है। भूमिका में ही सूत्रधार स्पष्ट करता है - "आपको जीवन की 'ओला राइड' पर ले चलता हूँ... बेफ़िक्र रहिए, इसके पैसे नहीं लूँगा।" यह कथन कृति की संपूर्ण प्रविधि की कुंजी है। टैक्सी की पिछली सीट, जो साधारणतः निजी और क्षणिक होती है, यहाँ स्वीकारोक्ति का एक अस्थायी पर गहन मंच बन जाती है। सवारियाँ अजनबी चालक के समक्ष वह सब उगल देती हैं जो शायद अपनों से भी नहीं कह पातीं - यह मनोवैज्ञानिक यथार्थ है कि अजनबी के साथ की क्षणिक निकटता प्रायः आत्म-प्रकटीकरण को सहज बना देती है। लेखिका इस मनोवैज्ञानिक सचाई का कुशल उपयोग करती हैं। छठी सवारी में स्वयं सूत्रधार इस भूमिका को आत्मसात करते हुए कहता है - "मैं भी तो ओला की सवारियों का सारथी हूँ, और कभी अनिर्णय की स्थिति में अर्जुन भी हूँ।" यह कृष्ण-अर्जुन-सारथी का रूपक संपूर्ण कृति में आवर्तित होता है और चालक के चरित्र को मात्र एक निष्क्रिय श्रोता से उठाकर एक सहभागी, संवेदनशील साक्षी के स्तर तक ले जाता है।

संरचनात्मक दृष्टि से प्रत्येक कहानी स्वतंत्र होते हुए भी सूत्रधार के जीवन-सूत्र से गुंथी है - उसके पिता की मृत्यु, माँ का स्नेह, आर्थिक तंगी, आई.ए.एस. बनने का अधूरा स्वप्न - ये पुनरावृत्त संदर्भ कृति को एक उपन्यास-सदृश समग्रता प्रदान करते हैं, यद्यपि यह विधागत रूप से कहानी-संग्रह ही बना रहता है। यह द्वैध - कहानी और उपन्यास के बीच का यह हाइब्रिड रूप - समकालीन हिंदी कथा-लेखन में एक उल्लेखनीय प्रयोग है, यद्यपि यह पूर्णतः नवीन नहीं, क्योंकि निर्मल वर्मा और भीष्म साहनी की कुछ कृतियों में भी इस प्रकार के फ्रेम-नैरेटिव का प्रयोग मिलता है।


संग्रह की सबसे बड़ी शक्ति उसका विषयगत वैविध्य है। लेखिका ने ऐसे विषयों को छुआ है जो हिंदी कथा-साहित्य में या तो उपेक्षित रहे हैं या सतही ढंग से चित्रित हुए हैं। सोलहवीं कहानी में किन्नर समुदाय का चित्रण इस दृष्टि से विशेष उल्लेखनीय है। बिमला माँ, रज्जो और जज साहब के त्रिकोणीय संबंध के माध्यम से लेखिका ने न केवल सामाजिक बहिष्करण को उकेरा है, बल्कि एक ऐसे मानवीय बंधन की रचना भी की है जो जैविक संबंधों की सीमाओं का अतिक्रमण करता है। "हमारे भी तो दो हाथ, दो पैर, दो आँखें, दो कान हैं... क्या हुआ कि हम पुरुष-स्त्री नहीं? तो क्या हुआ?" - रज्जो का यह प्रश्न सीधे-सीधे सामाजिक न्याय के प्रश्न को कथा के केंद्र में स्थापित करता है, किंतु लेखिका इसे उपदेशात्मकता से बचाकर संवाद के स्वाभाविक प्रवाह में गूँथती हैं। सूत्रधार की स्वीकारोक्ति - "बचपन का 'वह डर' सम्मान में बदल गया था" - कथा के अंत में पाठक के भीतर भी वही रूपांतरण घटित करने का प्रयास करती है, जो इस कहानी की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

सत्रहवीं और अंतिम कहानी में यौनकर्मी सीमा और उसकी पुत्री रीमा का चित्रण समान रूप से मार्मिक है। सीमा का यह कथन - "अपने इस शरीर को बेच कर जीवन भर जो कमाया था उसके बदले रीमा की आजादी खरीदी है" - वेश्यावृत्ति के सामाजिक कलंक को माँ की त्याग-भावना के साथ जोड़कर एक जटिल नैतिक प्रश्न खड़ा करता है। किंतु यहीं लेखिका की सीमा भी उजागर होती है - कहानी का अंत अत्यंत आकस्मिक और नाटकीय है (माँ की मृत्यु टैक्सी में ही, अस्पताल पहुँचने से ठीक पहले), जो भावुकता की अधिकता में यथार्थ की सूक्ष्मता को कुछ हद तक बलि चढ़ा देता है।

चौदहवीं कहानी में कश्मीरी हिंदू-मुस्लिम मित्र-परिवारों के बीच सांप्रदायिक हिंसा से उपजी त्रासदी और उसके पश्चात की पीढ़ी में पुनर्स्थापित मैत्री का चित्रण भारतीय बहुलतावादी चेतना के पक्ष में एक सशक्त वक्तव्य है। वृंदा का कथन - "नफ़रत की आँधियों में चमन उजड़ जाते हैं, छींटे प्यार के डालो तबीयत से कि छाती में ठंडक पहुँचे" - उर्दू-हिंदी मिश्रित शेर-सदृश पंक्तियों के माध्यम से सांप्रदायिक सद्भाव के लिए एक काव्यात्मक अपील प्रस्तुत करती है। यहाँ लेखिका राजनीतिक विषय (अनुच्छेद 370) को पात्रों की व्यक्तिगत त्रासदी में रूपांतरित करके प्रचारात्मकता से बचने में सफल रहती हैं, यद्यपि संवाद कहीं-कहीं अत्यधिक व्याख्यात्मक हो जाते हैं।

लेखिका का स्त्री-चरित्रों के प्रति विशेष झुकाव स्पष्ट है। दूसरी सवारी की वृद्धा, जो अपने दिवंगत पति की स्मृति में प्रतिवर्ष ताजमहल जाती है और कहती है - "मेरा प्यार किसी खूबसूरत कब्र में दफ़न होकर लोगों के लिए भ्रमण स्थल नहीं बल्कि मेरे दिल में बस कर हर धड़कन के साथ मुझे जीवित रखने का ज़रिया है" - प्रेम की एक ऐसी अवधारणा प्रस्तुत करती है जो मुगलकालीन स्मारकीय प्रेम-प्रतीक ताजमहल के विरुद्ध एक सूक्ष्म वैचारिक टिप्पणी है। यह स्त्री-दृष्टि स्मारक-केंद्रित पुरुष-प्रेम की परंपरागत अवधारणा को चुनौती देती है और प्रेम को बाह्य प्रदर्शन के बजाय आंतरिक अनुभूति के रूप में पुनर्परिभाषित करती है।

दसवीं कहानी में शीना और निशु की किशोरावस्था की बातचीत, जिसमें विकलांग पिता के प्रति निशु के मिश्रित भावों - क्रोध, घृणा और स्मृति-जनित करुणा - का चित्रण है, मनोवैज्ञानिक सूक्ष्मता का उत्कृष्ट उदाहरण है। "मेरे पापा कभी मेरे हीरो थे पर आज अब एक हारे हुए इंसान लगते हैं" - यह वाक्य किशोर मन की उस जटिलता को व्यक्त करता है जहाँ प्रेम और विक्षोभ साथ-साथ जीते हैं। यहाँ लेखिका का मनोवैज्ञानिक अंतर्दृष्टि कौशल पूर्ण परिपक्वता से प्रकट होता है।

तथापि यह भी कहना होगा कि सूत्रधार का चरित्र, जो सभी कहानियों में उपस्थित है, कुछ हद तक आदर्शीकृत है। वह प्रत्येक स्थिति में अत्यंत संवेदनशील, नैतिक रूप से निष्कलंक और सदैव सहायता के लिए तत्पर दिखाया गया है - यह यथार्थवादी चरित्र-चित्रण के बजाय कुछ हद तक एक भावुक आदर्श-पुरुष की रचना प्रतीत होती है, जिससे कथा की विश्वसनीयता कहीं-कहीं क्षीण होती है।

लेखिका की भाषा में कोड-स्विचिंग - हिंदी, अंग्रेजी और उर्दू का सहज मिश्रण - समकालीन शहरी मध्यवर्गीय संवाद की यथार्थपरक प्रस्तुति है। नौवीं कहानी में विदेश-प्रवासी युवाओं के अंग्रेजी-प्रधान संवाद ("ब्रो! यस्टरडे आई हैव बुक्ड माय टिकट") और चौथी कहानी के कॉलेज-छात्रों की हिंग्लिश भाषिक बुनावट पात्रों की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि को प्रामाणिकता प्रदान करती है। यह भाषिक विविधता लेखिका के समाजशास्त्रीय अवलोकन-कौशल का प्रमाण है।

किंतु साथ ही यह भी उल्लेखनीय है कि संवाद-शैली कहीं-कहीं अत्यधिक स्पष्टीकरणात्मक हो जाती है - पात्र प्रायः वह भी कह देते हैं जो सूक्ष्म संकेत से व्यक्त किया जा सकता था। उदाहरणार्थ, पंद्रहवीं कहानी में 'लाफिंग बुद्धा' की अंधश्रद्धा और उससे उपजी विडंबना का चित्रण मनोरंजक तो है, किंतु अंतिम व्यंग्य - "किस्मत हमको रो लेवे है हम किस्मत को रोले हैं" (फ़िराक़ गोरखपुरी का शेर उद्धृत) - कहानी के व्यंग्यात्मक संदेश को दोहरा देता है, जो पहले ही पर्याप्त स्पष्ट हो चुका था।

लेखिका की काव्यात्मक प्रवृत्ति भी उल्लेखनीय है - प्रायः कहानियों के अंत में सूत्रधार दोहे, शेर अथवा तुकांत पंक्तियों के माध्यम से नैतिक निष्कर्ष प्रस्तुत करता है। यह प्रविधि पारंपरिक हिंदी कथा-लेखन (विशेषतः प्रेमचंद-पूर्व और लोककथात्मक परंपरा) से साम्य रखती है, जहाँ कथा का अंत किसी सूक्तिपरक कथन में परिणत होता है। यह प्रविधि कहीं प्रभावशाली है तो कहीं अत्यधिक उपदेशात्मक जान पड़ती है, जो आधुनिक कथा-सौंदर्यशास्त्र, जो प्रायः खुले अंत और अंतर्निहित अर्थ को वरीयता देता है, से कुछ भिन्न दिशा में जाती है।

'ओला ड्राइवर' का सबसे स्थायी योगदान यह है कि यह दिल्ली महानगर के बहुस्तरीय सामाजिक यथार्थ को एक ही टैक्सी की खिड़की से, बिना किसी वर्गीय पूर्वाग्रह के, प्रस्तुत करता है। धनाढ्य वर्ग की सवारी (बारहवीं कहानी में कुत्ते-प्रेमी महिला), मध्यवर्गीय पारिवारिक तनाव (दसवीं, आठवीं कहानी), सैन्य परिवारों का बलिदान (तेरहवीं कहानी), हाशिये के समुदाय (सोलहवीं, सत्रहवीं कहानी) - इन सभी स्तरों को समान संवेदनशीलता से चित्रित किया गया है। यह वर्ग-निरपेक्ष सहानुभूति लेखिका की सबसे बड़ी वैचारिक विशेषता है।

बारहवीं कहानी में कुत्ते-प्रेमी महिला की मानवीय संवेदनहीनता (घायल युवक की सहायता के बजाय अपने कुत्ते 'पफ़ी' की चिंता में लीन) के बाद सूत्रधार की टिप्पणी - "नस्ल और किस्मत अच्छी हो तो जानवर भी प्यार पा लेते हैं, वरना तो इंसान की भी क़द्र नहीं होती" - वर्गीय असमानता पर एक तीखा किंतु संक्षिप्त प्रहार है। यह कहानी लेखिका के व्यंग्य-कौशल का सर्वोत्तम प्रदर्शन है, क्योंकि यहाँ उपदेश के बजाय स्थिति स्वयं अपना अर्थ प्रकट करती है।

पाँचवीं कहानी, जिसमें परीक्षा-दबाव और पारिवारिक अपेक्षाओं के मध्य एक पुत्री की हानि का संकेत मिलता है, समकालीन भारतीय शिक्षा-व्यवस्था की मनोवैज्ञानिक क्रूरता पर एक मार्मिक टिप्पणी है, यद्यपि लेखिका अंत को अस्पष्ट छोड़कर पाठक की कल्पना पर छोड़ देती हैं - यह संग्रह की उन दुर्लभ कहानियों में से है जो उपदेशात्मक निष्कर्ष के प्रलोभन से बचती है।

निष्पक्ष समीक्षा की दृष्टि से यह रेखांकित करना आवश्यक है कि संग्रह में कुछ शिल्पगत दुर्बलताएँ भी हैं। प्रथमतः, संयोगों की अतिशयता - सूत्रधार को प्रत्येक कहानी में ऐसी सवारी मिलती है जो ठीक उसी क्षण अपनी संपूर्ण जीवन-कथा उगल देती है - यथार्थवादी प्रशंसनीयता के मानदंड पर कुछ कमज़ोर पड़ती है। द्वितीयतः, कहानियों का अंत प्रायः अत्यधिक सुखांत अथवा नैतिक-उपदेशात्मक ढंग से होता है, जिससे कथा की जटिलता कहीं-कहीं सरलीकृत हो जाती है - यथार्थ जीवन में जो प्रश्न अनुत्तरित रह जाते हैं, यहाँ प्रायः किसी न किसी सूक्ति में समाहित कर दिए जाते हैं। तृतीयतः, सूत्रधार की सर्वव्यापी सहानुभूति और नैतिक पूर्णता उसे एक बहुआयामी चरित्र के बजाय एक कथा-युक्ति (नैरेटिव डिवाइस) अधिक बना देती है, जिसका मनोवैज्ञानिक विकास कहानी-दर-कहानी अपेक्षाकृत सीमित रहता है।

तथापि, इन सीमाओं के बावजूद, 'ओला ड्राइवर' समकालीन हिंदी कथा-साहित्य में एक सार्थक हस्तक्षेप है। गिग-इकॉनमी के युग में, जहाँ ओला-उबर चालक स्वयं एक नई सामाजिक श्रेणी के रूप में उभरे हैं, लेखिका ने इस पेशे को केवल आर्थिक संघर्ष के प्रतीक के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक अवलोकन के एक विशिष्ट दृष्टिबिंदु के रूप में पुनर्कल्पित किया है। यह दृष्टिकोण मंटो की टांगेवाले या रिक्शेवाले पात्रों की परंपरा से जुड़ता हुआ भी पूर्णतः इक्कीसवीं शताब्दी के भारत में प्रतिष्ठित है - जहाँ जीपीएस, ओटीपी, ऐप-बुकिंग जैसे तकनीकी विवरण कथा-यथार्थ का अभिन्न अंग बन जाते हैं।

समग्रतः 'ओला ड्राइवर' एक ऐसा कहानी-संग्रह है जो संरचनात्मक नवाचार, विषयगत साहस और सामाजिक संवेदनशीलता के लिए स्मरणीय है। किन्नर-विमर्श, यौनकर्मी-चित्रण, सांप्रदायिक सद्भाव, वर्गीय असमानता और पारिवारिक मनोविज्ञान जैसे विषयों को एक ही सूत्र में पिरोकर लेखिका ने दिल्ली महानगर का एक बहुरंगी सामाजिक चित्रपट रचा है, जिसकी वैचारिक प्रतिबद्धता स्पष्टतः समावेशी और मानवतावादी है। भाषा की सहजता और संवादों की यथार्थपरकता कृति को पठनीय बनाती है।

किंतु यह भी स्वीकार करना होगा कि कथा-शिल्प की दृष्टि से संग्रह कहीं-कहीं संयोगों की अतिशयता, उपदेशात्मक अंत और चरित्र-चित्रण की एकरैखिकता से ग्रस्त है, जो इसे शुक्ल-प्रसाद-रेणु परंपरा के प्रौढ़ यथार्थवाद के समकक्ष नहीं पहुँचा पाता। यह कृति साहित्यिक परिष्कार के बजाय सामाजिक संवेदना और वैषयिक साहस के बल पर अपनी पहचान बनाती है। यही कारण है कि इसे उस उभरती हुई हिंदी कथा-परंपरा में स्थान मिलना चाहिए जो नए सामाजिक यथार्थों - गिग-अर्थव्यवस्था, नगरीय एकाकीपन, हाशिये के समुदायों की मुखरता - को कथा-विषय बनाने का साहस करती है, भले ही उसकी शिल्पगत परिपक्वता अभी विकासमान अवस्था में हो। इंद्रजीत कौर से आगामी कृतियों में इसी सामाजिक दृष्टि के साथ अधिक सूक्ष्म एवं संयत शिल्प की अपेक्षा स्वाभाविक रूप से बनती है।

आचार्य प्रताप


Achary Pratap

समालोचक , संपादक तथा पत्रकार प्रबंध निदेशक अक्षरवाणी साप्ताहिक संस्कृत समाचार पत्र

1 Commentaires

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  1. निष्पक्ष और बिना लाग - लपेट के आपके द्वारा लिखी गई समीक्षा ने मुझे आईना दिखाने का काम किया है । बड़े ही स्पष्ट रूप में आपने इस कृति के सशक्त एवं अशक्त बिन्दुओं को इंगित किया। अगली कृति में इन बिंदुओं को अवश्य ध्यनि में रखूँगी
    हार्दिक धन्यवाद प्रताप जी

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