डंडे का ज्ञान और श्रद्धा की खूंटी
कहते हैं, शिक्षा मनुष्य को सीधा खड़ा होना सिखाती है। पर हमारे यहाँ कुछ स्थान ऐसे भी हैं जहाँ शिक्षा का पहला सोपान ही यह है कि पहले बच्चे को सीधा नहीं, उल्टा लटका दो। शायद यह मान लिया गया है कि जब रक्त सिर की ओर अधिक पहुँचेगा, तभी ज्ञान भी शीघ्र पहुँचेगा। विज्ञान अभी इस सिद्धांत से अपरिचित है, पर कुछ उस्ताद इसे वर्षों से व्यवहार में लाते चले आ रहे हैं।
बच्चा घर से फ़ीस लेकर आता है। माता-पिता समझते हैं कि वह विद्या खरीदने जा रहा है। पर वहाँ पहुँचकर पता चलता है कि फ़ीस केवल प्रवेश-द्वार की चाबी है; भीतर असली पाठ डंडा पढ़ाता है। किताबें बाद में खुलती हैं, हथेली पहले खुलती है। यदि हदीस या अन्य धार्मिक ग्रंथ का सबक याद न हो तो हथेली पर डंडों की ऐसी वर्षा होती है कि अक्षर भले ही मन में न उतरें, डंडे की लकीरें देर तक बनी रहती हैं।
यह भी एक विचित्र अर्थशास्त्र है। फ़ीस भी दो, मार भी खाओ। जैसे कोई किसान बैल खरीदकर स्वयं हल में जुत जाए। यदि बच्चा पूछ बैठे कि "हुज़ूर, फ़ीस किस बात की?", तो उत्तर शायद यह मिले कि "बेटा, ज्ञान अमूल्य है, डंडा उसका निःशुल्क परिशिष्ट है।"
हमारे समाज में डंडे का बड़ा सम्मान है। जिसे तर्क न मिले, वह डंडा उठा लेता है। जिसे धैर्य न मिले, वह डंडा उठा लेता है। जिसे पढ़ाना न आए, वह भी डंडा उठा लेता है। धीरे-धीरे डंडा इतना विद्वान घोषित हो गया कि शिक्षक पीछे रह गया।
और फिर आती है सेवा की शिक्षा। जब कोई दूसरा न हो, तब बालक को बुलाकर कहा जाता है—"आओ, हाथ-पैर दबाओ। उस्ताद की सेवा सबसे पहला धर्म है।" सुनने में कितना पवित्र वाक्य लगता है! किंतु धर्म यदि सेवा के नाम पर बालक की स्वतंत्रता और गरिमा का मूल्य माँगने लगे, तो वह धर्म नहीं, सुविधा का चोला पहन चुका स्वार्थ है।
सेवा वह होती है जो श्रद्धा से उपजे; जो आदेश से कराई जाए, वह सेवा नहीं, बोझ है। गुरु का सम्मान उसके आचरण से जन्म लेता है, दबाव से नहीं। वृक्ष फल लगने पर झुकता है; सूखी लकड़ी केवल चटकती है।
कल्पना कीजिए, यदि यही पद्धति हर क्षेत्र में लागू हो जाए। चिकित्सक कहे—पहले मेरे पैर दबाओ, तब औषधि मिलेगी। न्यायाधीश कहे—पहले पीठ पर दस डंडे सहो, तब न्याय मिलेगा। अधिकारी कहे—पहले सेवा करो, तब आवेदन स्वीकार होगा। तब शायद समाज को पहली बार समझ आए कि अधिकार और सम्मान का संबंध भय से नहीं, मर्यादा से होता है।
सबसे अधिक आश्चर्य उन लोगों पर होता है जो इन दृश्यों को देखकर भी कहते हैं—"हम भी ऐसे ही पढ़े हैं, तभी आदमी बने हैं।" यह तर्क वैसा ही है जैसे कोई कहे कि मुझे काँटे चुभे थे, इसलिए अब अगली पीढ़ी भी नंगे पाँव काँटों पर चले। पीड़ा परंपरा नहीं होती; उसे समाप्त करना ही सभ्यता का लक्षण है।
धार्मिक शिक्षा का उद्देश्य मन को विनम्र बनाना है, भयभीत बनाना नहीं। यदि बालक ईश्वर से पहले डंडे से डरने लगे, यदि उसे पुस्तक खोलने से पहले हथेली छिपानी पड़े, तो समझ लेना चाहिए कि कहीं न कहीं शिक्षा का दीपक धुएँ में बदल गया है।
गाँव में बुज़ुर्ग कहा करते थे—"बछड़े को रस्सी से बाँधो, मनुष्य के बच्चे को स्नेह से।" अब लगता है, कुछ लोगों ने यह कहावत उलट दी है। बच्चे रस्सी और खूंटी के भरोसे संस्कार सीखेंगे, ऐसा मान लेना वैसा ही है जैसे सूखी धरती पर डंडा पटककर वर्षा की प्रतीक्षा करना।
समय बदल गया है। बच्चे अब केवल पाठ याद करने वाली पट्टिकाएँ नहीं हैं; वे प्रश्न भी पूछते हैं। और यह शुभ संकेत है। जिस दिन समाज यह प्रश्न पूछना आरम्भ कर देगा कि फ़ीस लेकर भय क्यों बेचा जा रहा है, उस दिन शिक्षा फिर से शिक्षा कहलाएगी।
डंडे से चुप्पी खरीदी जा सकती है, ज्ञान नहीं। खूंटी पर शरीर लटकाया जा सकता है, जिज्ञासा नहीं। और सेवा का सबसे ऊँचा रूप यह है कि शिक्षक बालक के भीतर का मनुष्य जगा दे, न कि उसके मन में भय का स्थायी निवास बना दे।
अंततः स्मरण रहे—विद्यालय हो, मदरसा हो या कोई भी शिक्षालय, वहाँ से यदि बालक के हाथ लाल होकर लौटें और मन पीला पड़ जाए, तो समझ लेना चाहिए कि पाठ तो पढ़ाया गया, पर शिक्षा अभी भी अनुपस्थित है।
आचार्य प्रताप
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