टपकती छत का राष्ट्रीय विकास मॉडल
कहा जाता है कि शिक्षा मनुष्य का भविष्य गढ़ती है। हमारे यहाँ शायद भविष्य भी भीगकर ही गढ़ा जाता है। मध्य प्रदेश के एक विद्यालय में छत बरसात के साथ ऐसी मित्रता निभा रही है कि पानी सीधे बच्चों की पाठ्यपुस्तकों से परिचय करने उतर आता है। लगता है, भवन ने सोचा होगा कि जब ज्ञान गंगा कहलाता है तो थोड़ा जलाभिषेक भी हो जाए।
बच्चे टाट-पट्टी पर बैठे हैं। ऊपर से पानी टपक रहा है, दीवार का प्लास्टर झर रहा है और नीचे से व्यवस्था यह समझा रही है कि "जहाँ चाह वहाँ राह।" सचमुच राह तो मिल गई—कक्षा तक पानी की राह।
चार वर्षों से शिकायतें हो रही हैं। शिकायतें भी बड़ी सहनशील होती हैं। वे दफ्तरों में जाकर कुर्सियों के नीचे धूल फाँकती रहती हैं, फिर किसी नई फाइल का तकिया बन जाती हैं। हमारे यहाँ आवेदन का भाग्य किसान की वर्षा और रोगी की औषधि से भी अधिक अनिश्चित होता है। कौन जाने कब सुनवाई हो जाए!
विद्यालय की छत अब छत कम, बादलों की शाखा अधिक लगती है। अंतर केवल इतना है कि बादल बरसकर आगे बढ़ जाते हैं, पर यह छत हर वर्ष वहीं खड़ी होकर अपना कर्तव्य निभाती रहती है। लगता है, उसने प्रण कर लिया है कि बच्चों को केवल अक्षरज्ञान नहीं, जल-प्रबंधन का व्यावहारिक प्रशिक्षण भी देगी।
अधिकारी निरीक्षण के लिए पहुँचे। निरीक्षण हमारे शासन की वह अमोघ औषधि है, जिससे रोग प्रायः नहीं जाता, पर रोगी को यह भरोसा अवश्य हो जाता है कि उसकी नाड़ी देख ली गई है। आश्वासन भी मिला। आश्वासन हमारे सार्वजनिक जीवन का वह बरगद है जिसकी छाया बहुत घनी होती है, पर फल कभी दिखाई नहीं देते।
बच्चे भी बड़े अद्भुत हैं। वे हर दिन विद्यालय आते हैं। उन्हें शायद यह भ्रम है कि वे पढ़ने आते हैं, जबकि व्यवस्था उन्हें सहनशीलता का पाठ पढ़ा रही है। पाठ्यक्रम में यह विषय लिखा नहीं जाता, पर परीक्षा जीवन भर चलती रहती है।
गाँव वाले कहते हैं कि चार वर्षों से यही दशा है। अर्थात् छत टपकने में निरंतरता है। शिक्षा में निरंतरता का ऐसा उदाहरण शायद किसी नीति-पत्र में भी न मिले। यहाँ केवल पानी नहीं टपकता, योजनाओं के दावे भी बूँद-बूँद झरते हैं। "ऊँची दुकान, फीका पकवान" वाली कहावत जैसे किसी ने इसी दृश्य को देखकर गढ़ी हो।
यदि विद्यालय की दीवारें बोल पातीं तो शायद कहतीं—"हमें रंग-रोगन मत दो, पहले सहारा दो। बच्चों को भाषण मत दो, पहले सुरक्षित छत दो।" किंतु दीवारें मौन हैं और मौन का लाभ हमेशा वही उठाता है जिसके हाथ में कलम नहीं, मुहर होती है।
समस्या किसी एक विद्यालय की नहीं है। यह उस सोच की है जिसमें भवन टूटने के बाद चिंता जागती है और दुर्घटना के बाद संवेदना। जबकि नीति यह होनी चाहिए कि "दूध का जला छाछ भी फूँक-फूँक कर पीता है।" पर यहाँ तो लगता है कि जब तक पूरी छत सिर पर न आ गिरे, तब तक फाइल भी करवट नहीं बदलती।
शिक्षा का मंदिर तभी मंदिर कहलाएगा जब उसमें बैठे बच्चों के सिर पर विश्वास की छत होगी, भय की नहीं। अन्यथा इतिहास यही लिखेगा कि इस देश ने बच्चों को पुस्तकों से पहले टपकती छत और गिरते प्लास्टर का पाठ पढ़ाया था।
आचार्य प्रताप
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