ननिहाल कहीं नहीं जाता, उसका द्वार चला जाता है
बचपन में बुज़ुर्गों से एक बात सुनता था—"माँ गई तो ननिहाल गया, पिता गए तो ददिहाल गया।" उस समय यह वाक्य मुझे वैसा ही लगता था जैसे गाँव की चौपाल पर कही गई कोई पुरानी कहावत, जिसे लोग बिना सोचे-समझे दोहराते रहते हैं। मन में प्रश्न उठता था—भला एक व्यक्ति के चले जाने से पूरा खानदान कैसे चला जाता है? घर तो वहीं रहता है, आँगन भी वही, दीवारें भी वही, लोग भी वही। फिर यह कैसे कहा जा सकता है कि ननिहाल या ददिहाल चला गया?
समय बड़ा धैर्यवान शिक्षक है। वह उत्तर देता नहीं, अनुभव करा देता है।
धीरे-धीरे समझ में आया कि ननिहाल किसी मकान का नाम नहीं होता, वह तो माँ की मुस्कान का दूसरा रूप होता है। ददिहाल भी किसी गाँव का पता नहीं, वह पिता के विश्वास की छाया होता है। जिनकी उपस्थिति से रिश्तों में गुड़ घुला रहता है, उनके जाने के बाद वही रिश्ते जैसे बिना मीठे का पकवान बन जाते हैं। पेट तो भर जाता है, पर मन नहीं भरता।
माँ के रहते मामा का घर कभी पराया नहीं लगता। बिना बताए पहुँच जाइए, कोई प्रश्न नहीं होता। रसोई में चूल्हा जैसे आपके आने की आहट पहचान लेता है। मामी की डाँट में भी अपनापन होता है और मामा की झिड़की में भी स्नेह की गरमी। पर एक दिन माँ चली जाती है। मामा तो रहते हैं, पर दरवाज़े पर पहले जैसी प्रतीक्षा नहीं रहती। कोई रोकता नहीं, पर कोई खींचकर भीतर भी नहीं ले जाता। घर वही रहता है, पर चौखट का स्वभाव बदल जाता है।
पिता के रहते चाचा केवल संबंध नहीं होते, सहारा भी होते हैं। पिता के जाने के बाद वही चाचा मिलते तो हैं, पर उनके पास भी जीवन की अपनी विवशताएँ होती हैं। स्नेह रहता है, किन्तु वह पहले जैसा निर्भार नहीं रहता। रिश्ते जैसे हिसाब-किताब सीख लेते हैं। अपनापन धीरे-धीरे औपचारिकता का कुर्ता पहन लेता है।
कितनी विचित्र बात है! रक्त का संबंध बना रहता है, पर हृदय का सेतु कहीं चुपचाप टूट जाता है। कोई घोषणा नहीं होती, कोई शोकसभा नहीं बैठती, फिर भी बहुत कुछ समाप्त हो जाता है।
लोग कहते हैं कि माता-पिता के जाने के बाद मनुष्य अनाथ हो जाता है। मुझे लगता है, यह बात पूरी नहीं है। माता-पिता के जाने के बाद मनुष्य केवल अनाथ नहीं होता, वह अपने ही रिश्तों में अतिथि बन जाता है। उसके लिए दरवाज़े बंद नहीं होते, पर अपने आप खुलना भी बंद हो जाते हैं। पहले जो घर बिना दस्तक के अपना था, वहाँ अब धीरे से खटखटाना पड़ता है। पहले जहाँ अधिकार था, वहाँ अब संकोच बैठ जाता है।
यह परिवर्तन किसी के दोष से नहीं आता। समय की अपनी व्यवस्था है। नई पीढ़ियाँ अपने-अपने वृत्त बना लेती हैं। जीवन की दौड़ सबको अपने घेरे में बाँध लेती है। फिर भी मन तो मन है। वह तर्क नहीं समझता, केवल स्पर्श पहचानता है। उसे वही आँगन याद आता है जहाँ नानी की पुकार सुनाई देती थी, जहाँ नाना की हथेली सिर पर पड़ते ही लगता था कि संसार की सारी विपत्तियाँ बाहर ही रह गईं।
अब जब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि हमारे चारों भाई-बहनों का ननिहाल उस दिन नहीं गया था जब नानी माँ विदा हुईं। उसका एक हिस्सा तो उसी दिन चला गया था जब नाना जी ने आँखें मूँदी थीं। और जब नानी माँ भी चली गईं, तब वह अंतिम दीपक भी बुझ गया जो उस आँगन को घर बनाकर रखे हुए था।
आज भी वह मकान होगा। दीवारें होंगी, पेड़ होंगे, शायद वही पुराना आँगन भी होगा। किन्तु ननिहाल अब वहाँ नहीं है। क्योंकि ननिहाल ईंट और पत्थर से नहीं बनता; वह उस प्रतीक्षा से बनता है जिसमें कोई कहता था—"अरे, आ गए! बहुत दिन लगा दिए आने में।"
जीवन का सबसे बड़ा सत्य शायद यही है कि घरों को भवन बनाने में धन लगता है, किन्तु उन्हें अपना बनाने में माता-पिता और बुज़ुर्गों का प्रेम लगता है। जब वे चले जाते हैं, तब छत बची रहती है, पर वह आकाश नहीं बचता जिसके नीचे मन निश्चिंत होकर बचपन जी लेता था।
इसलिए यदि आपके माता-पिता, नाना-नानी, दादा-दादी आज भी आपके साथ हैं, तो उनके साथ बिताया गया प्रत्येक क्षण संजो लीजिए। क्योंकि उनके जाने के बाद केवल एक व्यक्ति नहीं जाता, वह अदृश्य सूत्र भी चला जाता है जो बिखरे हुए रिश्तों को माला की तरह एक साथ पिरोए रखता है। तब समझ में आता है कि कहावतें यूँ ही नहीं जन्म लेतीं; वे किसी के जीवन भर के आँसुओं से लिखी जाती हैं।
आचार्य प्रताप
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