क्षणिक सुख का बाज़ार और स्थायी सुकून की दिवालियापन कथा

क्षणिक सुख का बाज़ार और स्थायी सुकून की दिवालियापन कथा

कहते हैं, संसार में सबसे सस्ती वस्तु यदि कोई है तो वह है झटपट मिलने वाला सुख। वह चौराहे की मूँगफली की तरह हर मोड़ पर बिकता है। बस हाथ बढ़ाइए और मन को बहला लीजिए। परंतु उसके साथ एक छोटी-सी गाँठ भी बँधी रहती है, जिसमें भविष्य का पछतावा रखा होता है। लोग मूँगफली खा लेते हैं, गाँठ खोलकर नहीं देखते। जब समय खोलता है, तब ज्ञात होता है कि भीतर तो काँटे भरे थे।
हमारे पुरखे यूँ ही नहीं कह गए—"जैसी करनी वैसी भरनी", "बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से होय।" आज का मनुष्य इन कहावतों को पुरानी संदूकची में बंद कर चुका है। उसे लगता है कि अब युग बदल गया है। अब बबूल बोकर भी आम की आशा की जा सकती है, यदि प्रचार अच्छा हो और चमकदार चित्र लगा दिए जाएँ।

आज हर ओर शीघ्र लाभ का मेला लगा है। बिना परिश्रम धन चाहिए, बिना अध्ययन विद्या चाहिए, बिना साधना प्रतिष्ठा चाहिए और बिना चरित्र सम्मान चाहिए। मानो जीवन कोई खेत न होकर जादू का खिलौना हो, जिसमें बीज डालो नहीं और फसल काट लो। पर धरती आज भी उतनी ही ईमानदार है जितनी कल थी। वह छल का बीज स्वीकार कर सकती है, फल नहीं बदलती।

गाँव में एक बुज़ुर्ग कहा करते थे—"बबुआ, नदी का पानी चाहे जितना निर्मल दिखे, उतरने से पहले उसकी गहराई देख लेना। ऊपर की चमक कई बार भीतर की दलदल छिपा लेती है।" उस समय यह बात बालमन को कहानी लगती थी। आज लगता है कि वह केवल नदी की नहीं, पूरे जीवन की बात कह रहे थे।

इधर एक नई जाति पैदा हुई है—तुरंत सुख के व्यापारी। वे बताते हैं कि सत्य का मार्ग बहुत लंबा है, इसलिए थोड़ा टेढ़ा चलो। ईमानदारी से जेब धीरे भरती है, इसलिए दूसरा उपाय खोजो। संगति अच्छी हो तो उन्नति में समय लगेगा, इसलिए ऐसे लोगों के साथ बैठो जो रातों-रात महल खड़े कर दें। कुछ लोग भी इस मीठी बोली में ऐसे फँसते हैं जैसे गुड़ देखकर चींटी।

पर जीवन का लेखा-जोखा बड़ा कठोर मुनीम है। वह दिन का हिसाब रात में नहीं माँगता, कभी-कभी वर्षों बाद माँगता है। तब ब्याज भी जोड़ देता है। उस समय बहाने नहीं चलते।

लोकजीवन ने अनुभव से कुछ ऐसे वचन गढ़े हैं जो किसी विश्वविद्यालय की उपाधि से बड़े हैं—

भागी हुई लुगाई,
तेल में बनी मिठाई,
समय बीत चुकी दवाई,
अनुचित कमाई,
और राजनीति में भाई—
इन पर आँख मूँदकर भरोसा करने वाला प्रायः पछतावे की गठरी ही ढोता है।

इन पंक्तियों का अर्थ किसी व्यक्ति का उपहास नहीं, बल्कि जीवन का संकेत है। जो वस्तु अपने स्वभाव से अस्थिर हो, उस पर स्थायी सुख का भवन नहीं बनाया जा सकता। तेल में बनी मिठाई देर तक रखी रहे तो स्वाद से पहले स्वास्थ्य बिगाड़ती है। समय बीत चुकी औषधि रोग हरने के बजाय नया संकट बुला सकती है। अनुचित मार्ग से कमाया धन घर में अलमारी भर देता है, पर मन के भीतर का आँगन सूना छोड़ देता है। और जहाँ संबंध नीति से अधिक स्वार्थ पर टिके हों, वहाँ अपनापन बरसात की धूप जैसा होता है—कब आया, कब गया, कोई भरोसा नहीं।

एक काल्पनिक प्रसंग सुनिए।

हमारे बघेली अंचल के एक गाँव में दो पड़ोसी रहते थे। एक का नाम था सहजीलाल, दूसरे का चतुरसेन। सहजीलाल खेत में पसीना बहाता, हिसाब साफ़ रखता और कहता—"धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय।" दूसरी ओर चतुरसेन हर काम में छोटा रास्ता खोजता। कभी तौल में कमी, कभी बात में छल, कभी अवसर देखकर लाभ। कुछ वर्षों तक गाँव वालों को लगा कि चतुरसेन बड़ा बुद्धिमान है। उसके आँगन में चमक बढ़ती गई। सहजीलाल का जीवन वैसा ही रहा।

फिर समय ने करवट बदली। चतुरसेन के धन पर झगड़े खड़े हुए, मित्र बिखर गए, अपने पराए हो गए। घर बड़ा था, पर भीतर चैन का दीपक बुझ चुका था। उधर सहजीलाल के पास महल नहीं था, पर संध्या होते ही चौपाल पर बैठने वाले लोग कहते—"यह आदमी कमाता कम है, पर सोता गहरी नींद है।"

तब गाँव के एक बूढ़े ने मुस्कराकर कहा—"बेटा, धन की गठरी सिर पर रखकर सोओगे तो गर्दन दुखेगी ही। सिरहाने केवल सच्चाई रखो, नींद अपने आप आ जाएगी।"

आज समाज की सबसे बड़ी कठिनाई यह नहीं कि बुराई बढ़ रही है। कठिनाई यह है कि बुराई ने सज-धजकर भलाई का वेश पहन लिया है। छल अब धोती फाड़कर नहीं आता; वह इस्त्री किए वस्त्र पहनकर आता है। असत्य अब ऊँची आवाज़ में नहीं बोलता; वह मधुर वाणी में समझाता है। इसलिए पहचान कठिन हो गई है।

फिर भी जीवन का नियम नहीं बदला। ईमानदारी देर से फल देती है, पर फल मीठा होता है। सत्य का मार्ग ऊबड़-खाबड़ अवश्य है, पर मंज़िल सुरक्षित है। अच्छी संगति धीरे-धीरे मनुष्य को भीतर से गढ़ती है। लोहे को आग तपाती है, पर वही आग उसे तलवार भी बनाती है।

बघेलखंड में कहते हैं—"अरे भइया, जब लगइहा नीम, ता छाँह त नीमय केर मिली।" अर्थात् जो बोओगे, वही लौटकर आएगा। जीवन किसी मेले का खेल नहीं, खेती है। यहाँ बीज भी अपना और फसल भी अपनी।

अंततः मनुष्य को यह निर्णय स्वयं करना होता है कि उसे कुछ क्षणों की चकाचौंध चाहिए या जीवन भर का संतोष। झूठ, छल और अनुचित लाभ की चमक दीपावली के फुलझड़े जैसी है—क्षण भर दमकती है और फिर केवल धुआँ छोड़ जाती है। पर सत्य, परिश्रम और सदाचार मिट्टी के उस छोटे दीपक के समान हैं जो स्वयं थोड़ा जलता है, किंतु चारों ओर उजाला फैलाता है।

जीवन का सबसे बड़ा लाभ धन नहीं, निर्भय होकर सो पाने की क्षमता है। जिस दिन यह मिल जाए, समझ लीजिए कि आपने संसार की सबसे बड़ी संपत्ति पा ली। बाकी सब तो मेले की दुकानें हैं—साँझ ढली नहीं कि तंबू उखड़ जाते हैं।

आचार्य प्रताप
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Achary Pratap

समालोचक , संपादक तथा पत्रकार प्रबंध निदेशक अक्षरवाणी साप्ताहिक संस्कृत समाचार पत्र

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