अतिथि शिक्षक: सरकारी भूलभुलैया का अंतिम जीवित पात्र

"अतिथि शिक्षक: सरकारी भूलभुलैया का अंतिम जीवित पात्र"

मध्य प्रदेश में अतिथि शिक्षक होना अब नौकरी कम और किसी सरकारी रियलिटी शो का प्रतिभागी होना अधिक लगता है। हर वर्ष एक नया एपिसोड आता है और हर एपिसोड का शीर्षक बदल जाता है। कभी ई-अटेंडेंस का चक्रव्यूह, कभी स्थानांतरण का महायज्ञ, कभी भर्ती परीक्षा का महासंग्राम, तो कभी पदोन्नति का प्रलय। जो इन सबमें बच गया, वही अगले सत्र में विद्यालय के प्रांगण में दिखाई देता है। बाकी लोग सरकारी फाइलों के स्वर्गलोक में विलीन हो जाते हैं।

सरकार कहती है—"अतिथि देवो भवः।" पर लगता है इस वाक्य का सरकारी अनुवाद कुछ यूँ है—"अतिथि, देवता की तरह आते-जाते रहें, स्थायी रूप से कहीं टिक न जाएँ।"
पहले अतिथि शिक्षक स्थानांतरण की आँधी से बचने की कोशिश करता है। बड़ी मुश्किल से विद्यालय की चौखट पकड़कर खड़ा रहता है। तभी विभाग के किसी वातानुकूलित कक्ष में बैठा अधिकारी नई बुद्धि का दीपक जलाता है—"अरे, अभी पदोन्नति बाकी है!" बस फिर क्या था, वर्षों से बच्चों को पढ़ाने वाला शिक्षक फिर अपनी कुर्सी नहीं, अपनी किस्मत ढूँढ़ने लगता है।

यदि पदोन्नति की लहर से भी बच निकले तो शिक्षक भर्ती वर्ग-2 का महाकुंभ सामने खड़ा मिलता है। नई नियुक्तियाँ होंगी, पुराने लोग हटेंगे, फिर सूची बनेगी, फिर संशोधित सूची आएगी, फिर संशोधन की संशोधित सूची। ऐसा लगता है जैसे विभाग शिक्षा नहीं, पहेलियों की प्रतियोगिता आयोजित कर रहा हो।

और यदि ईश्वर की विशेष कृपा से इन दोनों विपत्तियों से भी बच गए तो "अतिशेष" नामक सरकारी ब्रह्मास्त्र उनका इंतज़ार कर रहा होता है। यह बड़ा विचित्र शब्द है। विद्यालय में बच्चे कम नहीं, कक्षाएँ खाली नहीं, शिक्षक का काम भी कम नहीं; लेकिन सरकारी कागज़ पर अचानक वह "अतिशेष" हो जाता है। मानो खेत में खड़ा किसान किसी नक्शे में अतिरिक्त घोषित कर दिया गया हो।

बघेली में कहते हैं—"सरकार के हिसाब-किताब मा, जियत मनइऊ कागज मा भूत बन जात हय।" यही दशा अतिथि शिक्षक की है। वह रोज़ स्कूल जाता है, बच्चों को पढ़ाता है, परीक्षा कराता है, परिणाम बनाता है, लेकिन किसी फाइल में उसका अस्तित्व पेंसिल से लिखा होता है, जिसे कभी भी रबर से मिटाया जा सकता है।

सरकारी अधिकारियों की कल्पनाशक्ति अद्भुत है। शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए जितनी योजनाएँ नहीं बनतीं, उससे अधिक योजनाएँ यह तय करने में बन जाती हैं कि अतिथि शिक्षक विद्यालय में टिके कैसे न रहें। कभी पोर्टल खुलता है, कभी बंद होता है। कभी आदेश आता है, फिर उसका स्पष्टीकरण आता है, फिर स्पष्टीकरण का संशोधन। शिक्षक सोचता है कि पढ़ाई कराऊँ या शासन के आदेशों का शोध प्रबंध लिखूँ।

कल्पना कीजिए, एक विद्यालय में सुबह प्रार्थना चल रही है। बच्चे पूछते हैं—"सर, इस साल भी आप हमें पढ़ाएँगे न?" शिक्षक मुस्कुरा देता है। क्योंकि सच्चा उत्तर उसके पास भी नहीं है। उसका भविष्य बच्चों की कॉपी में नहीं, भोपाल के किसी सर्वर और किसी अधिकारी की कलम में बंद है।

विडंबना देखिए, परिणाम अच्छा आए तो श्रेय व्यवस्था का, और यदि कहीं कमी रह जाए तो दोष अतिथि शिक्षक का। सफलता सरकारी, असफलता अतिथि की। यह गणित शायद केवल सरकारी कार्यालयों में ही पढ़ाया जाता है।

कभी-कभी लगता है कि विभाग को "अतिथि शिक्षक" की जगह "जीवित प्रयोग सामग्री" लिख देना चाहिए। जिस नीति का परीक्षण करना हो, पहले उसी पर लागू कर दो। यदि वह बच गया तो अगली नीति तैयार कर लो। शिक्षा विभाग की प्रयोगशाला में सबसे अधिक परीक्षण यदि किसी पर हुए हैं, तो वह अतिथि शिक्षक ही है।

शायद भविष्य में नई सूचना आए—"जो अतिथि शिक्षक स्थानांतरण, पदोन्नति, भर्ती, अतिशेष, ई-अटेंडेंस, सत्यापन, पोर्टल त्रुटि और आदेश-संशोधन—इन सातों परीक्षाओं को सफलतापूर्वक पार कर लेगा, उसे विद्यालय में एक वर्ष तक पढ़ाने का सौभाग्य प्रदान किया जाएगा।"

तब बच्चे तालियाँ नहीं बजाएँगे, बल्कि पूछेंगे—"सर, आप शिक्षक हैं या किसी युद्ध के विजेता?"

व्यंग्य का सबसे दुखद पक्ष यही है कि इसमें हँसी कम और सच्चाई अधिक होती है। शिक्षा व्यवस्था की स्थिरता तभी संभव है जब शिक्षक स्वयं अस्थिर न हो। जो व्यक्ति प्रतिदिन अपने अस्तित्व की चिंता में जी रहा हो, उससे राष्ट्र के भविष्य को निश्चिंत बनाने की अपेक्षा करना न्याय नहीं, विडंबना है।

सरकारें बदलती रहें, नीतियाँ बनती रहें, आदेश निकलते रहें—यह लोकतंत्र का स्वभाव है। पर शिक्षा को प्रयोगशाला और शिक्षक को प्रयोग का चूहा बना देना किसी भी सभ्य समाज की उपलब्धि नहीं हो सकती। जिस दिन शासन यह समझ लेगा कि शिक्षक फाइल का अंक नहीं, समाज की नींव है, उसी दिन विद्यालयों में केवल उपस्थिति नहीं, विश्वास भी दर्ज होने लगेगा।

- आचार्य प्रताप

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Achary Pratap

समालोचक , संपादक तथा पत्रकार प्रबंध निदेशक अक्षरवाणी साप्ताहिक संस्कृत समाचार पत्र

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