दैनिक मज़दूरी का लोकतंत्र और अतिथि शिक्षक का स्थायी अस्थायित्व
लोकतंत्र बड़ा दयालु जीव है। वह सबको बराबरी का सपना दिखाता है। कोई सपना देखकर जाग जाता है, कोई जागकर भी सपना देखता रहता है। मध्य प्रदेश में अतिथि शिक्षक भी ऐसे ही सपनों के सरकारी वितरक हैं। वे बच्चों को संविधान पढ़ाते हैं कि "सभी नागरिक समान हैं", और शाम को अपना मानदेय देखकर समझ जाते हैं कि संविधान और वेतन-पर्ची का रिश्ता उतना ही गहरा है जितना बरसात और सरकारी सड़क का।
सरकार की नज़र में अतिथि शिक्षक का मूल्य बड़ा वैज्ञानिक ढंग से निर्धारित किया गया है। वर्ग-1 का ज्ञान प्रतिदिन छह सौ रुपये का है, वर्ग-2 का चार सौ छियासठ रुपये का और वर्ग-3 का चार सौ रुपये का। उधर लैब और कंप्यूटर में काम करने वाले सहायकों का मूल्य तीन सौ तैंतीस रुपये प्रतिदिन। लगता है ज्ञान का भी अब सब्ज़ी मंडी की तरह भाव तय होने लगा है—"आज इतिहास थोड़ा सस्ता है, गणित महँगा है और अंग्रेज़ी का भाव कल से बढ़ सकता है।"
बघेली में कहें तो, "का हो सरकार! गुरुजी अब आदमी अहैं कि रोज के हिसाब से बिके वाली मजूरी?"
सरकार शायद मान बैठी है कि शिक्षक चॉक नहीं, फावड़ा चलाता है। फर्क बस इतना है कि मनरेगा का मज़दूर मिट्टी खोदता है और अतिथि शिक्षक बच्चों के भविष्य की ज़मीन तैयार करता है। दोनों श्रम करते हैं, दोनों पसीना बहाते हैं। अंतर केवल इतना है कि मज़दूर को यह भरोसा रहता है कि आज काम किया तो आज की मजदूरी मिलेगी, लेकिन अतिथि शिक्षक को यह भी भरोसा नहीं कि अगले सत्र में वही विद्यालय उसे पहचान भी पाएगा या नहीं।
यह कैसी विडंबना है! जिस शिक्षक ने पूरे वर्ष विद्यालय की घंटी से लेकर परीक्षा परिणाम तक की जिम्मेदारी निभाई, वही वर्ष समाप्त होते ही ऐसा हो जाता है मानो किसी सरकारी फाइल से स्टेपल-पिन निकालकर अलग रख दी गई हो। फिर शुरू होती है चॉइस फिलिंग, पोर्टल, मेरिट, सत्यापन और प्रतीक्षा की महागाथा। ऐसा लगता है जैसे शिक्षक नियुक्त नहीं हो रहा, स्वयंवर में भाग लेने जा रहा हो। हर वर्ष वही परीक्षा, वही प्रतीक्षा और वही आशंका—"इस बार नंबर आएगा कि नहीं?"
सरकारी व्यवस्था भी कमाल की है। पूरे साल शिक्षक से कहा जाता है—"विद्यालय तुम्हारी जिम्मेदारी है।" और सत्र समाप्त होते ही कहा जाता है—"अब तुम कौन हो? पहले फिर से आवेदन करो।"
यह व्यवस्था वैसी ही है जैसे किसी किसान से फसल कटवाकर कहा जाए कि अगली बार खेत तुम्हें मिलेगा या नहीं, इसकी गारंटी नहीं। या किसी दूल्हे से विवाह के अगले दिन कहा जाए कि अगले वर्ष फिर से बारात लेकर आना, तब तय होगा कि यही विवाह जारी रहेगा या नहीं।
सरकार को शायद लगता है कि अस्थिर आदमी सबसे आज्ञाकारी होता है। जिसकी नौकरी हर साल दाँव पर लगी हो, वह सवाल कम पूछेगा। मगर इतिहास गवाह है कि सबसे कठिन प्रश्न वही पूछता है, जिसके पास खोने को अब कुछ नहीं बचता।
सबसे रोचक बात यह है कि यही अतिथि शिक्षक बोर्ड परीक्षाओं में शानदार परिणाम लाते हैं। विद्यालय की व्यवस्था सँभालते हैं। जनगणना हो, चुनाव हो, सर्वे हो, पोर्टल हो, डाटा हो—हर जगह वही सबसे पहले याद आते हैं। लेकिन जब सम्मान और सुरक्षा की बारी आती है तो व्यवस्था कहती है—"आप तो अतिथि हैं।"
वाह रे लोकतंत्र! काम स्थायी, जिम्मेदारी स्थायी, परिणाम स्थायी; बस शिक्षक ही अस्थायी।
बघेली में बुजुर्ग कहते हैं—"जउन घर के चूल्हा जलाइस, वोहिन के दुआर मा बइठय के ठउर नइ मिलय।" यही कहानी अतिथि शिक्षक की है। जिसने विद्यालय को अपना घर समझा, उसी के लिए विद्यालय हर साल पराया हो जाता है।
सरकार से प्रश्न करना लोकतंत्र का अपराध नहीं, अधिकार है। यदि एक सामान्य नागरिक यह पूछता है कि बच्चों का भविष्य सँभालने वाले शिक्षक का भविष्य कब सँभलेगा, तो यह विरोध नहीं, व्यवस्था से संवाद है। लेकिन यदि व्यवस्था सुनना ही छोड़ दे, आँखें मूँद ले, कान बंद कर ले, तो न्याय की चौखट आखिर कहाँ होगी? जनता अदालत जाए, सड़क पर जाए या फिर अपनी पीड़ा को व्यंग्य में बदल दे?
कहते हैं, गुरु ब्रह्मा हैं। पर लगता है सरकारी शब्दकोश में अब एक नई परिभाषा जुड़ गई है—"गुरु वह है, जो हर वर्ष स्वयं को फिर से सिद्ध करे, फिर भी स्थायित्व की उम्मीद न रखे।"
यह व्यंग्य किसी व्यक्ति पर नहीं, उस सोच पर है जो शिक्षा को खर्च मानती है, निवेश नहीं; शिक्षक को विकल्प मानती है, आधार नहीं। जिस दिन शासन यह समझ लेगा कि विद्यालय भवनों से नहीं, शिक्षकों से चलते हैं, उस दिन शायद अतिथि शिक्षक भी अतिथि नहीं, शिक्षा परिवार के सम्मानित सदस्य कहलाएँगे।
तब तक वे पढ़ाते रहेंगे, मुस्कुराते रहेंगे और हर वर्ष एक नए आवेदन-पत्र के साथ अपने ही भविष्य की कक्षा में उपस्थिति दर्ज कराते रहेंगे।
आचार्य प्रताप
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