लोकतंत्र का विद्यालय और ताले की राजनीति
लोकतंत्र बड़ा विचित्र जीव है। वह चुनाव के दिनों में इतना विनम्र हो जाता है कि हर चौखट पर माथा टेकता है, और चुनाव बीतते ही ऐसा आत्मनिर्भर बन जाता है कि उसे किसी की आहट भी सुनाई नहीं देती। तब जनता बोलती नहीं, केवल अगली बार बोलने का अधिकार सँभालकर रख लेती है।
इन दिनों एक नया गणित चल पड़ा है। नागरिक अब दो वर्गों में बाँट दिए गए हैं—एक वे जिनके हाथ में मत है, और दूसरे वे जिनकी स्मृति में केवल आश्वासन है। जिनके सामने योजना का दीपक जलाया जाता है, उनसे अपेक्षा रहती है कि वे उसी प्रकाश में सब कुछ देख लें; विद्यालय का बुझता दीपक, बेरोज़गार की प्रतीक्षा, किसान की पथराई आँखें और अनशनकारी की सूखती देह—सब कुछ।
सत्ता का अपना दर्शन होता है। वह कहती है—"मंदिर ऊँचे बनाओ, ताकि विद्यालयों की टूटी छत दिखाई न दे।" यह बड़ा विलक्षण स्थापत्य है। ईंटें वहाँ भी लगती हैं, यहाँ भी; पर एक स्थान पर भविष्य गढ़ा जाता है और दूसरे स्थान पर वर्तमान का प्रदर्शन। समाज तब संकट में पड़ता है जब वह दोनों के अंतर को भूलने लगता है।
कभी गाँव का प्राथमिक विद्यालय केवल पढ़ने का स्थान नहीं होता था। वह पूरे गाँव का चबूतरा था, जहाँ बच्चों के साथ भविष्य भी वर्णमाला सीखता था। आज उन भवनों पर ताले लटक रहे हैं। ताला बड़ा ईमानदार जीव है; वह किसी से भेदभाव नहीं करता। ज्ञान पर भी उतनी ही दृढ़ता से बंद होता है, जितनी किसी गोदाम पर। लगता है मानो किसी ने निश्चय कर लिया हो कि यदि दीपक बुझा दिया जाए तो अँधेरा स्वयं विकास कहलाने लगेगा।
भर्ती भी हमारे यहाँ अद्भुत कथा है। उसका विज्ञापन ऐसा निकलता है जैसे वर्षा की पहली बदली दिखाई दे गई हो। अभ्यर्थी खेत की मेड़ पर बैठे किसान की तरह आकाश निहारते रहते हैं। पहली बूंद गिरती है, फिर बादल जाने किस दिशा में निकल जाता है। प्रतीक्षा का पौधा सूख जाता है, पर घोषणा का वृक्ष सदा हरा रहता है।
जो युवक अपनी योग्यता का प्रमाण लेकर दफ्तरों की चौखट नापता है, वह धीरे-धीरे समझ जाता है कि इस देश में प्रमाणपत्र से अधिक महत्त्व धैर्य का है। और धैर्य भी ऐसा कि यदि पीढ़ियाँ बदल जाएँ तो भी शिकायत न करे। जैसे बैलगाड़ी के आगे घास बाँध दी जाए और बैल जीवन भर उसी तक पहुँचने का प्रयत्न करता रहे।
जब कोई अनशन पर बैठता है, तब वह भोजन से नहीं, व्यवस्था की संवेदना से आशा रखता है। किंतु यदि व्यवस्था का हृदय पत्थर का हो जाए तो उपवास केवल शरीर का नहीं रहता, वह शासन की आत्मा का भी हो जाता है। आश्चर्य यह है कि कभी विरोध की धीमी खाँसी भी राजमहलों तक सुनाई दे जाती थी; अब नगाड़े बजते हैं और उत्तर में मौन की रजाई ओढ़ ली जाती है। लगता है कानों ने भी सरकारी अवकाश ले लिया है।
और यह मौन बड़ा उपयोगी होता है। इससे न प्रश्न सुनाई देते हैं, न उत्तर देने पड़ते हैं। जो याद दिलाने जाए, वह उपद्रवी कहलाता है; जो प्रतीक्षा करे, वह धैर्यवान; और जो निराश होकर लौट जाए, उसे परिपक्व नागरिक घोषित कर दिया जाता है। वाह रे लोकतंत्र! यहाँ घी सीधी उँगली से न निकले तो उँगली ही दोषी ठहरा दी जाती है।
सबसे अधिक चिंता विद्यालयों की है। कोई सभ्यता अपने विद्यालय बंद करके कभी उज्ज्वल नहीं हुई। पुस्तक पर ताला लगाकर कोई समाज ज्ञानवान नहीं बनता। जो राज्य अपने प्राथमिक विद्यालयों को बोझ समझने लगे, वह भविष्य की फसल बोने से पहले ही हल बेच चुका होता है। अनपढ़ समाज सबसे सस्ता समाज होता है; वह प्रश्न कम पूछता है और ताली अधिक बजाता है। शायद इसी कारण शिक्षा पर पहला प्रहार होता है, क्योंकि प्रश्न पूछने वाला विद्यार्थी किसी भी सिंहासन को असुविधाजनक लग सकता है।
लोककथा कहती है कि एक राजा ने अपने राज्य के सभी दीपक बुझवा दिए और घोषणा कर दी कि अब अँधेरा ही नया सवेरा है। दरबारियों ने ताली बजा दी। केवल एक वृद्ध ने कहा—"महाराज, अँधेरे की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उसमें राजा और प्रजा दोनों ठोकर खाते हैं।" राजा मुस्करा दिया। कुछ वर्षों बाद महल की सीढ़ियों पर वही ठोकर उसका भी इंतज़ार कर रही थी।
लोकतंत्र में मत केवल उँगली पर लगने वाली स्याही नहीं है; वह स्मृति पर लगने वाली रेखा भी है। नागरिक जब मतदान करता है तो वह केवल किसी दल का भाग्य नहीं लिखता, अपने बच्चों की पाठशाला, अपने खेत की मेड़, अपने श्रम का सम्मान और अपने भविष्य की दिशा भी लिखता है। यदि स्मृति बिक जाए और विवेक सो जाए, तो फिर शिकायतों की गठरी सिर पर ढोते रहने से कुछ नहीं बदलता।
इसलिए प्रश्न किसी दल का नहीं, प्रवृत्ति का है। विद्यालय बचेंगे तो समाज बचेगा। शिक्षा बचेगी तो विचार बचेंगे। विचार बचेंगे तो लोकतंत्र बचेगा। अन्यथा ताले बढ़ते रहेंगे, चाबियाँ बदलती रहेंगी और आने वाली पीढ़ियाँ पूछेंगी—"जब विद्यालय बंद हो रहे थे, तब लोग कर क्या रहे थे?" शायद उत्तर मिलेगा—"वे अगले चुनाव की प्रतीक्षा कर रहे थे।"
आचार्य प्रताप
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