मौन का महाउपवास
कहा जाता है कि लोकतंत्र में जनता बोलती है और सत्ता सुनती है। पर लगता है अब व्यवस्था ने इस कहावत का संशोधित संस्करण छाप दिया है—जनता बोलती रहे, सत्ता सुनने का अभिनय करती रहे।
इतिहास की धूल झाड़कर देखिए। जब-जब शासन की चौखट पर शब्दों ने दस्तक दी और भीतर से सन्नाटा मिला, तब-तब किसी ने अपने शरीर को ही याचिका बना दिया। महात्मा गांधी ने उपवास रखा तो साम्राज्य की नींद उचट गई। अन्ना हज़ारे बैठे तो दिल्ली की कुर्सियाँ करवटें बदलने लगीं। और आज सोनम वांगचुक उपवास पर हैं—बच्चों की शिक्षा, भविष्य और व्यवस्था में सुधार की बात कर रहे हैं—किन्तु ऐसा प्रतीत होता है मानो शासन ने कानों में केवल रूई ही नहीं, पूरा गद्दा ठूँस लिया हो।
हमारे समय की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ मौन भी योजनाबद्ध होता है। यदि किसी ने सड़क पर गड्ढे की शिकायत कर दी तो उत्तर मिल जाएगा—"जाँच होगी।" यदि किसी ने बिजली-पानी का प्रश्न उठाया तो कहा जाएगा—"विचाराधीन है।" पर यदि कोई मनुष्य अपना अन्न त्यागकर व्यवस्था के विवेक को जगाने का प्रयत्न करे, तब उत्तर मिलता है—"मौन।"
अब तो लगता है कि शासन ने एक नया विभाग बना लिया होगा—"अनसुनी प्रबंधन प्रकोष्ठ"। वहाँ अधिकारी बड़ी लगन से यह अभ्यास करते होंगे कि किसी की पीड़ा को बिना सुने कैसे सुना जाए, और बिना उत्तर दिए कैसे उत्तर दे दिया जाए।
गाँव में एक बूढ़े बाबा कहा करते थे—"बेटा, बैल यदि खेत में बैठ जाए तो किसान उसके आगे घास डालता है; पर यदि किसान ही खेत में बैठ जाए तो समझो वर्ष कठिन है।" आज लगता है कि व्यवस्था ने इस कहावत का भी नया अर्थ निकाल लिया है। किसान बैठे, शिक्षक बैठे, विद्यार्थी बैठे, पर्यावरण प्रेमी बैठे—कोई बात नहीं। कुर्सी बैठी रहनी चाहिए, बस।
सोनम वांगचुक का उपवास किसी एक व्यक्ति का निजी निर्णय नहीं है। वह उस प्रश्न का प्रतीक है जिसे सुनना शायद सुविधाजनक नहीं है। प्रश्न यदि बच्चों के भविष्य का हो, शिक्षा का हो, व्यवस्था की दिशा का हो, तो उसका उत्तर विज्ञापन से नहीं, संवाद से दिया जाता है। पर संवाद कठिन है; मौन सरल है। इसलिए मौन ही राजधर्म का सबसे सुरक्षित वस्त्र बन गया है।
कल्पना कीजिए, यदि भविष्य में इतिहास पढ़ाने वाला शिक्षक बच्चों से कहे—"बच्चो, यह वह काल था जब लोग उपवास करते थे और सरकारें समाचारों का उपवास रखती थीं।" बच्चे पूछेंगे—"सर, फिर समाधान कैसे हुआ?" शिक्षक शायद मुस्कराकर कहे—"बेटा, समाधान से पहले प्रचार आया था।"
व्यंग्य यह नहीं कि कोई उपवास कर रहा है। व्यंग्य यह है कि हमारे समय में भूख से अधिक असुविधाजनक सत्य हो गया है। शरीर सूखता दिखाई देता है, पर संवेदनाएँ नहीं पिघलतीं। शब्द थक जाते हैं, पर सत्ता का मौन नहीं थकता।
लोकतंत्र केवल मतदान का उत्सव नहीं, मनुष्यता की परीक्षा भी है। यदि कोई नागरिक अपने प्राणों का जोखिम उठाकर भविष्य की बात कर रहा हो और शासन उसके प्रति केवल चुप्पी का अभिषेक करे, तो प्रश्न उस व्यक्ति पर नहीं, व्यवस्था की आत्मा पर उठता है।
कहा जाता है कि "बूँद-बूँद से घड़ा भरता है।" पर यह भी उतना ही सत्य है कि चुप्पी-चुप्पी से अविश्वास भरता है। और जब अविश्वास भर जाता है, तब इतिहास अपनी कलम निकाल लेता है। इतिहास के पन्नों पर पद नहीं टिकते, केवल कर्म टिकते हैं; घोषणाएँ नहीं टिकतीं, केवल उत्तरदायित्व टिकता है।
इसलिए समय रहते सुन लेना ही बुद्धिमानी है। क्योंकि उपवास किसी व्यक्ति का हो सकता है, पर उसकी प्रतिध्वनि पूरे समाज की होती है। और यदि सत्ता उस प्रतिध्वनि को भी अनसुना कर दे, तो इतिहास अंततः वही लिखता है जो जनता महसूस करती है—न कि जो शासन सुनाना चाहता है।
आचार्य प्रताप
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