"परिणाम पहले, सम्मान बाद में" — शिक्षा विभाग का नया दर्शन
हमारे देश में शिक्षा का सबसे बड़ा संकट यह नहीं है कि बच्चे क्या पढ़ रहे हैं। सबसे बड़ा संकट यह है कि शिक्षक कब तक पढ़ाएगा, यह स्वयं शिक्षक को भी नहीं पता।
अतिथि शिक्षक बड़ा विचित्र जीव है। सरकार उसे इतना अनुभवी मानती है कि पूरे वर्ष बच्चों की पढ़ाई, परीक्षा, मूल्यांकन और परिणाम उसके भरोसे छोड़ देती है; लेकिन जैसे ही सम्मान, सुरक्षा या स्थायित्व की बात आती है, वही शिक्षक अचानक अनुभवहीन, अस्थायी और "अतिशेष" घोषित हो जाता है। यह सरकारी रसायनशास्त्र का ऐसा अद्भुत प्रयोग है, जिसे नोबेल पुरस्कार तो नहीं, पर सरकारी प्रशस्ति पत्र अवश्य मिल सकता है।
सोशल मीडिया पर भी ज्ञान का मानसून पूरे वेग से बरसता है। कोई लिखता है—"पेपर पास करो।" दूसरा कहता है—"परिणाम पर ध्यान दो।" तीसरा घोषणा करता है—"यह सब समय और श्रम की बर्बादी है।"
इन टिप्पणियों को पढ़कर लगा कि यदि डॉक्टर अस्पताल की अव्यवस्था की शिकायत करे तो लोग कहेंगे—"पहले मरीज ठीक करो।" यदि सैनिक वेतन की बात करे तो सलाह मिले—"पहले सीमा बचाओ।" और यदि किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य माँगे तो उत्तर आए—"पहले फसल उगाओ।"
यानी अधिकार की बात मत करो, केवल कर्तव्य निभाओ। क्योंकि हमारे यहाँ कर्तव्य हमेशा नीचे वाले का होता है और अधिकार ऊपर वाले का।
एक सज्जन ने बड़ी सरलता से लिखा—"पेपर पास करो और सरकारी शिक्षक बन जाओ।" उनकी सरलता पर मुझे दया आई। उन्हें कौन समझाए कि सरकार स्वयं पंद्रह-पंद्रह वर्षों तक उन्हीं अतिथि शिक्षकों से विद्यालय चलवाती रही। यदि वे अयोग्य थे तो बच्चों का भविष्य उनके हवाले क्यों था? और यदि योग्य थे, तो फिर हर साल उनकी योग्यता का पोस्टमार्टम क्यों होता है?
सरकार की नीतियाँ भी बड़ी संवेदनशील हैं। शिक्षक को कभी ई-अटेंडेंस से नापती हैं, कभी पोर्टल से, कभी सत्यापन से, कभी स्थानांतरण से, कभी पदोन्नति से और अंत में "अतिशेष" नामक ब्रह्मास्त्र से। ऐसा लगता है कि शिक्षा विभाग का उद्देश्य पढ़ाई कम और शिक्षक की सहनशक्ति का विश्व रिकॉर्ड बनाना अधिक है।
सबसे मनोरंजक तर्क यह है—"पहले परिणाम दो।"
अरे भाई, परिणाम देने वाला शिक्षक है या जादूगर? सुबह विद्यालय पहुँचने से पहले उसे यह भी नहीं पता कि अगले महीने उसकी नियुक्ति रहेगी या नहीं। उसका आधा समय बच्चों की कॉपियों में नहीं, पोर्टल की त्रुटियों में चला जाता है। फिर भी उससे अपेक्षा है कि परिणाम शत-प्रतिशत आएँ।
यह वैसा ही है जैसे किसी नाविक की नाव में रोज़ छेद करो और फिर पूछो—"किनारे तक जल्दी क्यों नहीं पहुँचे?"
हमारा समाज भी बड़ा न्यायप्रिय है। शिक्षक यदि उत्कृष्ट परिणाम दे दे तो कहते हैं—"व्यवस्था अच्छी है।" यदि परिणाम थोड़ा कम आ जाए तो कहते हैं—"शिक्षक निकम्मा है।" यानी सफलता की माला व्यवस्था के गले में और असफलता का जूता शिक्षक के हिस्से में।
लोकतंत्र की सबसे सुंदर बात यह है कि यहाँ हर पाँच साल में सरकार बदल सकती है। लेकिन शिक्षा विभाग ने इससे भी बड़ा चमत्कार कर दिखाया है—यहाँ शिक्षक हर साल बदल सकता है। बच्चों को पाठ्यपुस्तक बदलने की ज़रूरत नहीं पड़ती, गुरु ही बदल जाता है।
शिक्षा किसी पोर्टल का नाम नहीं, विश्वास का नाम है। शिक्षक किसी फाइल का क्रमांक नहीं, समाज की स्मृति होता है। जिस दिन शासन यह समझ लेगा कि शिक्षक को अस्थिर रखकर शिक्षा को स्थिर नहीं बनाया जा सकता, उस दिन शायद विद्यालयों में केवल उपस्थिति नहीं, आत्मविश्वास भी दर्ज होगा।
और तब सोशल मीडिया पर कोई यह नहीं लिखेगा—"पहले परिणाम दो।"
बल्कि लिखेगा—"पहले शिक्षक को शिक्षक रहने दो, तभी वह राष्ट्र का भविष्य गढ़ पाएगा।"
आचार्य प्रताप
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