काव्य-संग्रह 'अरुणोदय'
पुस्तक-परिचय
1. पुस्तक का नाम: अरुणोदय
2. लेखक: जगदीश शर्मा 'सहज'
3. विधा: काव्य-संग्रह
4. प्रकाशक का नाम: प्रिसेप्स प्रकाशन, बिलासपुर, छत्तीसगढ़
5. कुल पृष्ठ: 125 (कवर पेज सहित) पेपर बैक
6. प्रकाशन वर्ष: २०२२ (प्रथम संस्करण)
7. आई.एस.बी.एन. (ISBN): 9789391889401
8. पुस्तक का मूल्य: 150/- मात्र
समकालीन हिंदी कविता के परिदृश्य में जगदीश शर्मा 'सहज' कृत 'अरुणोदय' एक ऐसी रचनात्मक अभिव्यक्ति के रूप में सम्मुख आता है, जो परंपरा और आधुनिकता के द्वंद्व के मध्य मानवीय संवेदनाओं को नए आयाम प्रदान करता है। अपनी अनूठी साहित्यिक दृष्टि और सहज नामनुरूप शाब्दिक सरलता के माध्यम से कवि ने इस द्वितीय काव्य-संग्रह में जीवन और जगत के विविध सरोकारों को समेटा है। यह कृति केवल कोरी भावुकता का संचयन नहीं है, बल्कि इसमें समाज के सर्वहारा वर्ग के प्रति गहरी प्रतिबद्धता और समकालीन विसंगतियों के प्रति तीखा आक्रोश मुखर हुआ है। पुस्तक का समर्पण ही समाज के सर्वहारा वर्ग को होना इस बात का अकाट्य साक्ष्य है कि कवि की चेतना का केंद्र बिंदु हाशिए पर खड़े लोग हैं। 'अरुणोदय' का भाव-सौंदर्य अत्यंत व्यापक और बहुआयामी है। कवि का अंतर्मन जहाँ एक ओर 'सरस्वती वंदना' के माध्यम से आध्यात्मिक चेतना और ज्ञान की प्रखरता की अभिलाषा करता है, वहीं दूसरी ओर वह समाज में व्याप्त प्रदूषित परिदृश्यों, मानवीय क्रंदन और यांत्रिकता से गहरे स्तर पर व्यथित होता है। 'वायु में घुल रहा' और 'प्रगति' जैसी कविताओं में विज्ञान की अंधी दौड़ और पर्यावरण के क्षरण पर गंभीर चिंता व्यक्त की गई है। कवि यह भली-भांति समझता है कि तथाकथित प्रगति ने मनुष्य से उसकी सहज मुस्कान छीन ली है।
मैं, आचार्य प्रताप, समकालीन हिंदी साहित्य के उस विशाल प्रांगण में निरंतर विचरण करता हूँ, जहाँ नित्य नए स्वर जन्म लेते हैं और अपनी वैचारिक अनुगूँजों से समाज को झकझोरने का प्रयास करते हैं। एक समालोचक और शोधकर्ता होने के नाते मेरा यह पुनीत कर्तव्य है कि मैं किसी भी साहित्यिक कृति का मूल्यांकन केवल उसकी ऊपरी चमक-दमक के आधार पर न करूँ, अपितु उसके अंतस में उतरकर उसके कथ्य, शिल्प, भाषा, रस और अलंकारों की शल्य-चिकित्सा करूँ। इसी अन्वेषण की कड़ी में मेरे समक्ष युवा कवि जगदीश शर्मा 'सहज' का द्वितीय काव्य-संग्रह 'अरुणोदय' उपस्थित हुआ है। इससे पूर्व उनका प्रथम संग्रह 'आस्था के मोती' (२०२०) प्रकाशित हो चुका है। 'अरुणोदय', जैसा कि नाम से ही ध्वनित होता है, एक नई भोर, एक नई वैचारिक जागृति का काव्यात्मक शंखनाद है। कवि 'सहज' ने अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज के सर्वहारा वर्ग को यह कृति समर्पित की है, जो उनकी जनोन्मुखी दृष्टि और प्रगतिशील चेतना का अकाट्य प्रमाण है। मैं इस काव्य-संग्रह की अधिकांश कविताओं का शवाच्छेदन किया है और प्रमाण सहित उनके गुणों तथा दोषों को साहित्य-प्रेमियों के पटल पर रख रहा हूँ ।
किसी भी श्रेष्ठ काव्य-संग्रह का आरंभ प्रायः मंगलाचरण से होता है और कवि 'सहज' ने भी 'सरस्वती वंदना' के माध्यम से विद्या की अधिष्ठात्री देवी का आह्वान करते हुए सहज जी लिखते हैं :
सकल संसार की वाणी।
हमारी शारदे रानी।।
सुकवि की प्रार्थना हो तुम।
सुरों की साधना हो तुम।।
इस वंदना का गुण इसकी अत्यंत सादगी और प्रवाहपूर्ण मात्रिक लय है, जो सीधे हृदय में उतर जाती है। परंतु यदि एक कठोर आलोचक की दृष्टि से देखूँ, तो इसमें सर्वथा नवीन बिंबों का अभाव खलता है। सरस्वती वंदना की जो एक पारंपरिक परिपाटी चली आ रही है, सहज जी भी उसी का अनुगमन करते प्रतीत हो रहें है।
काव्य का प्रयोजन क्या होना चाहिए, इस विषय पर स्वयं सहज जी ने 'युग चेतना का लक्ष्य' नामक कविता में अपना घोषणापत्र प्रस्तुत किया है। सहज जी की मान्यता है:
युग-चेतना का लक्ष्य ही, आदर्श हो साहित्य का।
जनजाग्रति का मंत्र ही, प्रतिदर्श हो साहित्य का।।
यहाँ सहज जी की वैचारिक स्पष्टता (गुण) स्तुत्य है। वह 'कला कला के लिए' सिद्धांत का खंडन करते हुए 'कला जीवन के लिए' का पक्षधर बन खड़ा होता है।
समकालीन समय में पर्यावरण का क्षरण एक अत्यंत ज्वलंत और भयावह समस्या है। 'अरुणोदय' की कविताएँ वातानुकूलित कक्षों में बैठकर रची गई कोरी भावुकता नहीं हैं, बल्कि वे हमारे इर्द-गिर्द घटित हो रहे पर्यावरणीय यथार्थ का सजीव और दुखद दस्तावेज़ हैं। 'वायु में घुल रहा' और 'चीत्कार' जैसी कविताओं में विकास के नाम पर हो रहे प्रकृति के क्रूरतम दोहन का मार्मिक चित्रण है। 'चीत्कार' कविता में रेल-दोहरीकरण के कारण काटे जा रहे वृक्षों और बेघर होते पक्षियों की पीड़ा को कवि ने जिस आत्मीयता से उकेरा है, वह करुण रस का उत्कृष्ट उदाहरण है। कवि की पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं:
पंछी चीत्कार कर रहे हैं,
तितर-बितर होकर विचर रहे हैं।
बदहवाश उड़ान भर रहे हैं,
संभावित खतरे को भांपकर।
इस मुक्त छंद की कविता का सबसे बड़ा गुण इसका यथार्थवादी बिंब-विधान है। 'बदहवाश उड़ान भर रहे हैं' पंक्ति में पक्षियों का जो मूर्तिमंत चित्र उभरता है, वह पाठक को विचलित कर देता है। वहीं 'गुमसुम पेड़' कविता में कवि ने शहरों की प्रदूषित सड़कों पर खड़े वृक्षों का मानवीकरण किया है। लेकिन 'पर्यावरण बचाने के लिए' नामक कविता में कवि व्यंग्य के तीर तो छोड़ता है, परंतु कविता गद्यात्मक अधिक हो गई है। वहाँ काव्यात्मक लालित्य का अभाव (दोष) स्पष्ट झलकता है, जहाँ कविता एक कोरे भाषण या अख़बार की रिपोर्ट जैसी प्रतीत होने लगती है।
कोरोना काल की त्रासदी ने समूची मानवता को मृत्यु के भय और अवसाद से भर दिया था। एक सजग रचनाकार होने के नाते 'सहज' इस विभीषिका से अछूते नहीं रहे हैं। 'संबंध सभी जीवन के तोड़ गए जो', 'निश्चित हम बाजी जीतेंगे', 'कुशल श्रमिक तुम थक न जाना' और 'कोरोना के बाद' जैसी कविताएँ उस भयावह दौर की स्मृति को सजीव करती हैं। 'संबंध सभी जीवन के तोड़ गए जो' कविता में कवि ने महामारी में अपनों को खोने की पीड़ा का बड़ा ही मर्मस्पर्शी वर्णन किया है:
संबंध सभी अपनों से, तोड़ गए जो।
पूँजी अपने जीवन की, छोड़ गए जो।।
अनभिज्ञ रहे थे, उनका दोष नहीं था।
संक्रामकता का उनको, होश नहीं था।।
यहाँ कवि की मानवीय संवेदना अपने चरम पर है। निर्दोष लोगों के असमय चले जाने का जो क्रंदन इन पंक्तियों में है, वह किसी भी सहृदय पाठक की आँखें नम कर सकता है। परंतु जब हम 'कोरोना के बाद' कविता का विश्लेषण करते हैं, तो पाते हैं कि कवि का वर्णनात्मक मोह उस पर हावी हो गया है।
"एक शख्स को बीमार लाचार देखा।
अजीब सा सन्नाटा है,
इस वर्ष राष्ट्र को आर्थिक घाटा है।"
- इन पंक्तियों में अभिधा शब्द-शक्ति का सीधा प्रयोग है, यहाँ न कोई व्यंजना है और न ही कोई लाक्षणिक वक्रता। एक आलोचक के रूप में मैं इसे कविता का शिल्पगत दोष मानूँगा, जहाँ रचना अपनी काव्यात्मक गरिमा खोकर मात्र एक सूचनात्मक विवरण बन गई है।
आधुनिक जीवनशैली, महानगरीय सभ्यता का खोखलापन और युवा पीढ़ी का भटकाव जगदीश शर्मा 'सहज' की आलोचनात्मक दृष्टि से बच नहीं पाए हैं। 'नौजवान', 'महू', 'आधुनिक जीवनशैली' और 'बड़े-बड़े शहरों की बड़ी-बड़ी बातें' जैसी कविताओं में कवि का क्षोभ और व्यंग्य प्रखर रूप में सामने आता है। 'नौजवान' कविता में युवा पीढ़ी के मोबाइल और नशे की लत पर कवि कड़ा प्रहार करता है। 'महू' कविता एक ऐसे कामचोर और निठल्ले व्यक्ति का व्यंग्यात्मक रेखाचित्र (Character sketch) है, जो आज के समाज में मुफ्तखोरी का प्रतीक है। 'आधुनिक जीवनशैली' कविता में कवि प्रश्न करता है:
वतन को आधुनिक शैली से हम कैसे बचाएंगे,
दिमागी सोच को कैसे भला विकसित कराएंगे।
नशे की गर्त में डूबा हुआ इंसान मरता है,
न जीता है न खुद पर वह कभी उपकार करता है।।
इन कविताओं का गुण इनकी सामाजिक प्रासंगिकता है, जो समाज को आईना दिखाती हैं। परंतु दोष यह है कि इनमें उपदेशात्मकता (Preachiness) इतनी अधिक हावी हो गई है कि वे कविता कम और किसी सुधारक के नीति-वाक्य अधिक प्रतीत होती हैं। कविता में संदेश यदि चाशनी में लिपटी औषधि की भाँति हो तो वह अधिक प्रभावकारी होता है, सीधे कड़वी घूँट की तरह पिलाने पर वह अपनी कलात्मकता खो देता है।
राष्ट्रीयता, देशप्रेम और राजनीतिक विसंगतियों पर 'सहज' की कलम बड़ी निर्भीकता से चली है। 'जय गणतंत्र', 'नेता', 'मतगणना', 'दल वही जो राष्ट्र की आवाज', 'दिल्ली का लाल किला', 'सूरज की लाली' और 'उन सभी बलिदानियों को' जैसी कविताओं में उनका प्रखर राष्ट्रवादी स्वरूप उभर कर आता है। वीर रस और ओज गुण से ओतप्रोत 'उन सभी बलिदानियों को' कविता कारगिल के शहीदों को एक अश्रुपूरित और ओजस्वी श्रद्धांजलि है:
सरहदों को जीतकर, सैनिक अमर जो हो गए।
कारगिल की चोटियों पर युद्ध लड़ने जो गए।।
गणतंत्र दिवस के दिन लाल किले पर हुए उपद्रव से क्षुब्ध होकर कवि ने 'दिल्ली का लाल किला' कविता रची है, जिसमें रौद्र और वीर रस का अद्भुत सम्मिश्रण है:
जिस किले ने राष्ट्रभक्ति का सबब पैदा किया।
आज कुछ उद्दंडियों ने उसे शर्मिंदा किया।।
जो किला इंसानियत को देखकर पत्थर बना।
कर्मवीरों के लिए सच्चा इबादत घर बना।।
यहाँ 'पत्थर बनने' का बिंब अत्यंत शक्तिशाली (गुण) है, जो किले की मूक वेदना और उसकी दृढ़ता दोनों को एक साथ स्थापित करता है। मार्च 2020 के दिल्ली दंगों पर लिखी गई 'सूरज की लाली' कविता में कवि ने दंगाई गलियारों में निर्दोषों की नम आँखों का चित्रण कर साम्प्रदायिक सौहार्द का संदेश दिया है। 'नेता' कविता में एक आदर्श राजनेता की परिभाषा गढ़ते हुए कवि कहता है,
"आपको जिंदगी में ख़ुशी दे सके
एक राजा वही, एक नेता वही"।
इन सभी कविताओं में कवि का निडर और बेबाक दृष्टिकोण प्रशंसनीय है।
मानवीय संवेदनाओं, जीवन-दर्शन और रिश्तों की ऊष्मा भी 'अरुणोदय' के पन्नों पर बहुतायत में बिखरी पड़ी है। 'पिता परिवार की खातिर', 'अवसर भैयादूज का', 'फूल की पंखुड़ी सी महकती हुई बेटियाँ', 'मुर्दा अर्थी पर लेटा हुआ है', और 'मायिक दुनिया का संसार' जैसी कविताएँ मनुष्य के अंतर्मन को छूती हैं। 'पिता परिवार की खातिर' कविता में पिता के मूक त्याग और कठोर बाहरी आवरण के भीतर छिपे वात्सल्य को कवि ने रूपक अलंकार के माध्यम से अत्यंत सुंदर ढंग से व्यक्त किया है:
पिता परिवार की खातिर हिमालय सा अचल रहता।
पिता का साथ है तो झोंपड़ी सा घर महल रहता।।
पिता की हर खुशी कुर्बान बच्चों के लिए रहती।
पिता पाषाण है लेकिन हृदयतल से कमल रहता।।
'पाषाण' और 'कमल' का यह विरोधाभास पिता के चरित्र का सटीक मनोवैज्ञानिक चित्रण करता है, जो इस कविता का श्रेष्ठतम गुण है।
इसी शृंखला में इस संग्रह की संभवतः सबसे परिपक्व और मनोवैज्ञानिक कविता 'चालीस पार का वसंत' है। जीवन के मध्य पड़ाव पर पहुँचकर मनुष्य के मन में उठने वाले अवसादों, अकुलाहटों, बुझते हुए सपनों और एक विचित्र से सूनेपन का ऐसा सजीव चित्रण दुर्लभ है। कवि ने लिखा है:
चालीस पार का बसंत
गुमसुम होकर आता है।
मिथ्या बसंती रंग से,
तनमन रंगकर जाता है।
यहाँ 'मिथ्या बसंती रंग' एक बहुत ही सशक्त प्रतीक है, जो ढलती हुई युवावस्था और जीवन की निरर्थकता के बोध को दर्शाता है। इस कविता में न तो कोई कृत्रिम उपदेश है और न ही सपाटबयानी। यह विशुद्ध अनुभूति की कविता है, जिसे मैं इस संग्रह की सबसे बड़ी साहित्यिक उपलब्धि मानता हूँ। मृत्यु के शाश्वत सत्य को उद्घाटित करती कविता 'मुर्दा अर्थी पर लेटा हुआ है' में क्षणभंगुरता का दार्शनिक आख्यान है, यद्यपि यह थोड़ी और संक्षिप्त एवं प्रतीकात्मक हो सकती थी (दोष), क्योंकि इसका विस्तार इसके प्रभाव को थोड़ा कम कर देता है।
नारी विमर्श पर 'आज की नारी' और 'नारियों तुम बहो आंधियों' जैसी कविताओं में कवि 'सहज' ने स्त्री के सशक्त और जुझारू रूप का वंदन किया है। 'नारियों तुम बहो आंधियों' में कवि आह्वान करता है:
नारियों तुम बहो आँधियों की तरह
मुक्त होकर उड़ो पंछियों की तरह।।
यह ओजपूर्ण कविता स्त्री-स्वाधीनता का शंखनाद करती है।
प्रकृति चित्रण, ऋतु वर्णन और विविध छंदों के प्रयोग की दृष्टि से भी यह संग्रह ध्यानाकर्षक है। 'वसंत आया', 'सावन के बदरा घने', 'गिरि पर बिखरी ओस', 'कुछ हाइकु', 'समुद्र', और 'रवि रश्मियों की दीप्त आभा' कविताओं में प्रकृति का आलंबन और उद्दीपन दोनों रूपों में चित्रण हुआ है। 'सावन के बदरा घने' में कवि ने पारंपरिक दोहा छंद का बड़ी कुशलता से निर्वाह किया है:
सावन के बदरा घने, गरज उठे चहुँ ओर।
उमड़-घुमड़ वर्षा करें, पवन चले चित चोर।।
जापानी काव्य-विधा 'हाइकु' का भी कवि ने सुंदर प्रयोग किया है, जो उसकी बहुआयामी शिल्प-क्षमता (गुण) को दर्शाता है:
बरखा रानी,
भीगी चूनरधानी,
पानी ही पानी।
'गिरि पर बिखरी ओस' में सोरठा छंद का प्रयोग करते हुए कवि ने प्रातःकालीन सौंदर्य का अद्भुत शब्द-चित्र खींचा है। 'समुद्र' कविता मुक्त छंद में रची गई है, जिसमें समुद्र के गांभीर्य और उसके अनवरत संघर्ष की तुलना मानवी जीवन से की गई है।
अंत में, मैं इस संग्रह की शीर्षक कविता 'अरुणोदय' की चर्चा करना चाहूँगा। यह कविता नव-भारत के उदय, उसकी युवा ऊर्जा और वैश्विक पटल पर उसकी बढ़ती साख का उल्लासपूर्ण गान है।
यह देश युवावस्था वय में,
हुंकार रहा अरुणोदय में।।
भूचाल बहुत इसने झेले।
सब राष्ट्र बने इसके चेले।।
ओज गुण से संपन्न इस कविता में राष्ट्रीय अस्मिता का गर्व झलकता है। परंतु एक आलोचक के नाते मुझे यहाँ 'चेले' शब्द का प्रयोग खटकता है (दोष)। एक गंभीर और ओजस्वी कविता में इस प्रकार के बोलचाल के या हल्के शब्द का प्रयोग कविता की साहित्यिक गरिमा को तनिक कम कर देता है। इसके स्थान पर कोई अधिक साहित्यिक और प्रामाणिक शब्द कविता को और अधिक उत्कर्ष प्रदान कर सकता था।
निष्कर्षतः, एक समीक्षक के रूप में मेरा यह स्पष्ट मंतव्य है कि जगदीश शर्मा 'सहज' का काव्य-संग्रह 'अरुणोदय' समकालीन हिंदी कविता में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और सोद्देश्य हस्तक्षेप है। इस संग्रह की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि यह साहित्य को वातानुकूलित कमरों से निकालकर आम आदमी के पसीने, उसकी पीड़ा, उसके संघर्षों और राष्ट्र की धड़कनों के साथ खड़ा करता है। कवि ने समाज की विसंगतियों, राजनीति के पतन, पर्यावरण के विनाश और मानवीय संबंधों की दरकती दीवारों का अत्यंत संवेदनशीलता के साथ दस्तावेजीकरण किया है। यद्यपि शिल्प के धरातल पर कहीं-कहीं गद्यात्मकता, अति-उपदेशात्मकता और बिंबों का अभाव इसके दोष के रूप में सामने आते हैं, किंतु कवि की प्रामाणिक अनुभूति, जन-सरोकार और सचाई इन सीमाओं पर विजय प्राप्त कर लेते हैं। 'अरुणोदय' मात्र कविताओं का संकलन नहीं है, बल्कि यह वर्तमान युग के यथार्थ का एक ऐसा दर्पण है जिसमें हम अपने समाज के उजले और स्याह दोनों पक्षों को स्पष्टता से देख सकते हैं। यह कृति निश्चित ही सहृदय पाठकों और शोधार्थियों के बीच अपनी एक स्थायी और विशिष्ट जगह बनाएगी, और हिंदी साहित्य जगत भविष्य में कवि 'सहज' से और अधिक प्रौढ़, प्रतीकात्मक एवं कलात्मक रूप से समृद्ध रचनाओं की अपेक्षा रखेगा।
-आचार्य प्रताप
आदरणीय कवि प्रताप जी, नमस्कार ! मेरी पुस्तक अरुणोदय की इतनी सुंदर समीक्षा करने हेतु आपका वारंवार धन्यवाद ।एक समीक्षक का सही धर्म निभाया आपने। मन बहुत प्रफुल्ल हुआ । आपकी अथक मेहनत एवं साहित्य के प्रति प्रेम देखकर यही कहूंगा कि साहित्य से प्रेम करने वाले अभी धरती पर मौजूद हैं जिनके बाल पर साहित्य संसार पल्लवित पुष्पित हो रहा है।
RépondreSupprimerअरुणोदय में मैंने छंदबद्ध एवं मुक्त कविताओं का मिलाजुला भाव समद पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास किया है कवि मन ने जहाँ पर देखा कि छंदबद्ध की जगह मुक्त भाव प्रबल हो रहे हैं वहाँ मुक्त रचना लिख दी, जहाँ कवि को लगा कि खूब समय है रस ,एवं लय समाहित की जाए वहां छंदबद्ध काव्य रच दिया। इस तरह मिलाजुला काव्य संग्रह है अरुणोदय। मुझे अतिशय प्रसन्नता है कि आपने ब्लॉग में इसे स्थान देकर मुझे अनुग्रहीत किया। मैं आपकी सहृदयता की उदारमना प्रशंसा करता हूँ।सभी तरह की टाइपिंग त्रुटि हेतु क्षमाप्रार्थी।
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