विद्यालय खुलेगा, शिक्षक बाद में आएँगे!
जून का महीना आते ही बादलों से पहले आदेशों की गर्जना सुनाई देने लगती है। शिक्षा विभाग के कैलेंडर में यह वह पवित्र काल होता है जब विद्यालयों के द्वार खुलते हैं, बच्चों के बस्ते धूल झाड़कर बाहर निकलते हैं और अधिकारीगण प्रेस विज्ञप्तियों में शिक्षा का सूर्योदय घोषित कर देते हैं। इस वर्ष भी घोषणा हुई कि "विद्यालय खुलते ही पहले दिन से शिक्षक उपलब्ध रहेंगे।"
घोषणा सुनकर मुझे बरसों पुरानी वह कहावत याद आ गई—"दूर के ढोल सुहावन लगत हैं।" अब ढोल सुहावन इसलिए भी लग रहे थे क्योंकि ढोल तो था, पर उसे बजाने वाला कहीं दिखाई नहीं दे रहा था।
हमारे यहाँ शिक्षा व्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा अतिथि शिक्षकों के भरोसे चलता है। वे शिक्षा जगत के ऐसे कर्मयोगी हैं जो हर वर्ष ठीक वैसे ही प्रकट होते हैं जैसे चुनाव के समय विकास दिखाई देता है। विद्यालय उन्हें पहचानता है, बच्चे उन्हें पहचानते हैं, गाँव पहचानता है, लेकिन व्यवस्था उन्हें हर साल नए आदमी की तरह देखने लगती है।
इस बार विद्यालय खुलने की तिथि आ गई, पर अतिथि शिक्षकों की भर्ती अभी तक नहीं हुई। अब प्रश्न यह है कि विद्यालय में शिक्षक कहाँ से आएँगे?
लेकिन यह प्रश्न आम जनता का है। शासन-प्रशासन के पास प्रश्नों से अधिक उत्तर होते हैं, चाहे वे उत्तर वास्तविकता से कितनी ही दूर क्यों न हों।
हमारे देश में शिक्षा एक अद्भुत दर्शन पर चलती है। यहाँ भवन पहले बन जाता है, शिक्षक बाद में खोजे जाते हैं। पाठ्यक्रम पहले छप जाता है, पुस्तकें बाद में पहुँचती हैं। और कभी-कभी तो परिणाम भी पहले आ जाता है, पढ़ाई बाद में होती है।
अधिकारी महोदय कहते हैं—"चिंता की कोई बात नहीं है।"
यह वही वाक्य है जो सूखे में किसानों को, बाढ़ में ग्रामीणों को और अस्पताल में मरीजों को सुनाया जाता है।
विद्यालय खुलेंगे, प्रार्थना होगी, राष्ट्रगान होगा, उपस्थिति पंजी खुलेगी। बस एक छोटी-सी समस्या रह जाएगी कि पढ़ाएगा कौन?
पर समस्या भी कितनी स्वार्थी चीज है! वह हमेशा वहीं पैदा होती है जहाँ जमीन पर काम करना पड़ता है। फाइलों में तो सब कुछ व्यवस्थित रहता है। फाइल में शिक्षक उपस्थित हैं, छात्र उत्साहित हैं, परिणाम उत्कृष्ट हैं और शिक्षा विश्वस्तरीय है।
एक काल्पनिक प्रसंग की कल्पना कीजिए।
एक विद्यालय के प्रधानाध्यापक पहले दिन विद्यालय पहुँचे। बच्चों ने पूछा—
"गुरुजी, गणित कौन पढ़ाएगा?"
प्रधानाध्यापक बोले—"आदेश आने वाला है।"
दूसरे बच्चे ने पूछा—"विज्ञान कौन पढ़ाएगा?"
उत्तर मिला—"प्रक्रिया चल रही है।"
तीसरे ने पूछा—"अंग्रेज़ी कौन पढ़ाएगा?"
प्रधानाध्यापक मुस्कुराए—"फाइल अंतिम चरण में है।"
चौथे बच्चे ने भोलेपन से पूछा—"तब तक हम क्या करेंगे?"
प्रधानाध्यापक ने गंभीरता से कहा—"बेटा, धैर्य सीखो। शिक्षा का पहला पाठ यही है।"
बघेली में कहें तो बच्चा मन सोचत रहिगे—"गुरुजी पढ़ई कम, सबर जादा पढ़ावत हैं।"
वास्तव में हमारे विद्यालयों में अब दो प्रकार की शिक्षा चलती है। एक वह जो पुस्तकों में लिखी है और दूसरी वह जो व्यवस्था अनजाने में सिखाती है। पुस्तक कहती है—"समय का सदुपयोग करो।" व्यवस्था सिखाती है—"प्रतीक्षा करना सीखो।" पुस्तक कहती है—"योजना बनाओ।" व्यवस्था बताती है—"योजना बाद में भी बन सकती है।"
अतिथि शिक्षक भी कम रोचक पात्र नहीं हैं। वे हर वर्ष इस आशा में रहते हैं कि शायद इस बार समय पर प्रक्रिया पूरी हो जाएगी। लेकिन व्यवस्था उन्हें वही अनुभव देती है जो रेलवे स्टेशन पर खड़े यात्री को "ट्रेन थोड़ी देर से है" सुनकर मिलता है। वह थोड़ी देर कभी-कभी पूरे मौसम जितनी लंबी हो जाती है।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि जब परीक्षा परिणाम अच्छे आते हैं तो श्रेय व्यवस्था ले लेती है और जब शिक्षक कम पड़ जाते हैं तो जिम्मेदारी परिस्थितियों पर डाल दी जाती है।
मानो शिक्षा कोई खेत नहीं, जादू का तमाशा हो। शिक्षक हो या न हो, फसल अपने आप उग जानी चाहिए।
शरद जोशी होते तो शायद कहते कि हमारे यहाँ शिक्षा विभाग का सबसे प्रतिभाशाली विद्यार्थी "आश्वासन" है। वह हर साल प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण होता है। और हरिशंकर परसाई शायद जोड़ते कि आश्वासन इतना संस्कारी है कि कभी नौकरी नहीं माँगता, केवल भाषणों में उपस्थित रहता है।
आज आवश्यकता इस बात की नहीं है कि विद्यालय खुलने पर फोटो खिंच जाएँ। आवश्यकता इस बात की है कि कक्षा में शिक्षक भी पहुँचे। क्योंकि विद्यालय भवन से नहीं, शिक्षक से चलता है। ब्लैकबोर्ड पर लिखे अक्षर तभी अर्थ पाते हैं जब कोई उन्हें समझाने वाला हो।
अंततः प्रश्न केवल अतिथि शिक्षकों की भर्ती का नहीं है। प्रश्न उस सोच का है जिसमें घोषणा को उपलब्धि और तैयारी को औपचारिकता मान लिया गया है।
विद्यालय तो खुल जाएँगे, बच्चे भी आ जाएँगे, घंटी भी बज जाएगी। पर यदि शिक्षक ही अनुपस्थित रहे तो शिक्षा की पूरी व्यवस्था उस विवाह मंडप जैसी लगेगी जहाँ सजावट पूरी हो, बैंड भी बज रहा हो, मेहमान भी बैठे हों, पर दूल्हा अभी रास्ते में हो।
और तब हम सब मिलकर यही कहेंगे—"सब ठीक है।"
क्योंकि हमारे समय का सबसे सफल पाठ शायद यही है कि जो दिखाई न दे, उसे भी उपस्थित मान लिया जाए।
सोचने की बात बस इतनी है कि यदि विद्यालयों में शिक्षक बाद में आने लगे, तो कहीं ऐसा न हो कि भविष्य भी बच्चों के पास देर से पहुँचे।
आचार्य प्रताप
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