प्रेम : इस समय का सबसे बड़ा विद्रोह
"मेरे बच्चे,
तुम इतना प्रेम करना
कि एक नफ़रत से भरते समाज में
तुम्हारा बस होना भर ही
विद्रोह लगे।"
बेटा, जब तुम बड़े हो जाओगे तो तुम्हें पता चलेगा कि दुनिया में प्रेम करना अब उतना सरल काम नहीं रहा जितना कवियों ने बताया था। कवि तो चाँद, फूल और तितलियों के बीच प्रेम की खेती करते रहे, पर आज प्रेम करने के लिए साहस चाहिए, वैसा साहस जैसा पुराने समय में क्रांतिकारियों को जेल जाने के लिए चाहिए होता था।
हमारे समय की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि लोग नफ़रत को विचारधारा और प्रेम को कमजोरी समझने लगे हैं। जो जितना अधिक क्रोधित है, उतना अधिक जागरूक माना जाता है। जो जितना अधिक विभाजित करता है, वह उतना ही बड़ा नेता कहलाता है। और जो सबको जोड़ने की बात करे, उसे लोग संदेह से देखते हैं, मानो वह कोई गुप्त अपराध कर रहा हो।
आज आदमी की पहचान उसके गुणों से नहीं, उसकी खेमेबंदी से तय होती है। लोग पूछते नहीं कि तुम कैसे इंसान हो, वे पूछते हैं कि तुम किस तरफ हो। जैसे दुनिया कोई फुटबॉल मैच हो और हर व्यक्ति को किसी न किसी टीम की जर्सी पहननी ही पड़े।
ऐसे समय में यदि तुम किसी से बिना शर्त प्रेम करोगे, तो लोग घबरा जाएँगे।
वे पूछेंगे—"तुम उससे प्रेम कैसे कर सकते हो? वह तो दूसरी सोच का है।"
तुम कहोगे—"वह इंसान है।"
वे फिर पूछेंगे—"लेकिन उसका समूह अलग है।"
तुम फिर कहोगे—"फिर भी वह इंसान है।"
यहीं से तुम्हारा विद्रोह शुरू होगा।
देखो, नफ़रत का व्यापार बड़ा लाभकारी धंधा है। इसमें निवेश कम और मुनाफ़ा अधिक है। एक अफ़वाह फैलाइए, सौ लोग लड़ पड़ेंगे। एक झूठ बोलिए, हज़ार लोग उसे सच साबित करने निकल पड़ेंगे। मगर प्रेम? प्रेम में तो धैर्य चाहिए। सुनना पड़ता है, समझना पड़ता है, क्षमा करनी पड़ती है। इसलिए प्रेम का बाज़ार हमेशा मंदा रहता है।
समाज के ठेकेदार चाहते हैं कि लोग हमेशा थोड़ा-थोड़ा नाराज़ रहें। नाराज़ आदमी आसानी से चलाया जा सकता है। उसे बस एक दुश्मन दिखाइए, वह आपके पीछे चल पड़ेगा। लेकिन जो प्रेम करता है, वह प्रश्न पूछता है। वह सोचता है। वह सामने वाले की पीड़ा को समझने की कोशिश करता है। ऐसे लोग सत्ता, भीड़ और प्रचार—तीनों के लिए असुविधाजनक होते हैं।
इसलिए, मेरे बच्चे, जब तुम प्रेम करना तो इतना करना कि तुम्हारे आसपास बैठे लोग असहज हो जाएँ। जब सब लोग किसी एक व्यक्ति से घृणा कर रहे हों, तब तुम उसके भीतर का मनुष्य खोजने की कोशिश करना। जब सब लोग दीवारें बना रहे हों, तब तुम खिड़कियाँ खोलना।
तुम्हें लगेगा कि यह बहुत छोटा काम है। लेकिन याद रखना, इतिहास में सबसे बड़ी क्रांतियाँ तलवारों से कम और मनुष्यता से अधिक हुई हैं।
नफ़रत हमेशा शोर करती है। प्रेम अक्सर चुप रहता है। इसलिए लोगों को भ्रम हो जाता है कि नफ़रत शक्तिशाली है। जबकि सच्चाई यह है कि नफ़रत केवल तोड़ सकती है, प्रेम ही बना सकता है।
यदि कभी तुम्हें लगे कि दुनिया बहुत कठोर हो गई है, तो कठोर मत बन जाना। दुनिया को एक और कठोर आदमी नहीं चाहिए। दुनिया को एक ऐसा मनुष्य चाहिए जो भीड़ के बीच भी मनुष्य बना रह सके।
तुम इतना प्रेम करना कि तुम्हारे मित्र सुरक्षित महसूस करें।
इतना प्रेम करना कि तुम्हारे विरोधी भी तुम्हें समझने की कोशिश करें।
इतना प्रेम करना कि किसी अकेले आदमी को लगे कि वह अकेला नहीं है।
और यदि कभी लोग तुम्हें मूर्ख कहें, आदर्शवादी कहें, अव्यावहारिक कहें, तो मुस्कुरा देना। क्योंकि इस युग में प्रेम करने वाले को मूर्ख कहना ही नफ़रत का सबसे विनम्र रूप है।
याद रखना, बेटा—
जिस दिन प्रेम सामान्य बात लगने लगेगा, उस दिन शायद समाज स्वस्थ हो जाएगा।
लेकिन जब तक प्रेम विद्रोह लगता है, तब तक प्रेम करते रहना।
क्योंकि इस समय दुनिया को क्रांतिकारियों से अधिक प्रेम करने वाले मनुष्यों की आवश्यकता है।
आचार्य प्रताप
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