विधानसभा का पंचदिवसीय महायज्ञ
अगर हरिशंकर परसाई और शरद जोशी आज होते और विधानसभा के पाँच दिवसीय सत्र की यह सूचना देखते, तो शायद कुछ ऐसा लिखते—
लोकतंत्र फिर से जाग गया है। सूचना निकली है कि विधानसभा का सत्र पाँच दिनों के लिए आयोजित होगा। यह वैसा ही है जैसे गाँव का कोई तालाब वर्ष भर सूखा रहे और बरसात में पाँच दिन पानी देखकर खुद को समुद्र समझने लगे।
जनता बड़ी भावुक प्राणी है। वह समझती है कि विधानसभा का सत्र मतलब उसकी समस्याओं पर चर्चा होगी। किसान सोचता है कि उसकी फसल पर बात होगी, बेरोज़गार सोचता है कि नौकरी पर चर्चा होगी, और महँगाई से त्रस्त गृहिणी मान लेती है कि दाल के भाव पर कोई गंभीर बहस होगी। लेकिन लोकतंत्र की असली खूबसूरती यही है कि जनता उम्मीद करती रहती है और नेता कार्यवाही।
सूचना में बड़े सम्मान से लिखा गया है कि बैठकें प्रातः 11 बजे से चलेंगी। यह पढ़कर मुझे उन विद्यार्थियों की याद आ गई जो परीक्षा में केवल रोल नंबर लिखकर उत्तरपुस्तिका जमा कर देते हैं और घर जाकर कहते हैं—“पेपर तो बहुत अच्छा हुआ था।”
पाँच दिन का सत्र है। इनमें से पहला दिन स्वागत में जाएगा, दूसरा विरोध में, तीसरा शोर-शराबे में, चौथा स्थगन में और पाँचवाँ दिन यह तय करने में कि अगले सत्र में जनता की समस्याओं पर गंभीर चर्चा की जाएगी।
लोकतंत्र में चर्चा बड़ी अद्भुत वस्तु है। समस्या जितनी पुरानी होती जाती है, चर्चा उतनी ही नई लगती है। सड़क टूटे तो चर्चा, पुल गिरे तो चर्चा, खाद न मिले तो चर्चा, बिजली न आए तो चर्चा। जनता सोचती है कि चर्चा समाधान की पहली सीढ़ी है, जबकि अनुभवी नेता जानते हैं कि कई बार चर्चा ही अंतिम मंज़िल होती है।
सत्र के लिए प्रश्न, ध्यानाकर्षण और अविश्वास प्रस्तावों की सूचनाएँ भी आमंत्रित की गई हैं। यह देखकर अच्छा लगा कि व्यवस्था अभी भी आशावादी है। उसे विश्वास है कि प्रश्न पूछे जाएँगे, उत्तर दिए जाएँगे और किसी को किसी पर विश्वास भी नहीं होगा।
दरअसल हमारी राजनीति एक विशाल रंगमंच है। यहाँ हर पात्र अपनी भूमिका निभाता है। सत्ता पक्ष साबित करता है कि सब कुछ ठीक है, विपक्ष साबित करता है कि कुछ भी ठीक नहीं है, और जनता घर बैठकर यह साबित करती रहती है कि उसने वोट दिया था।
पाँच दिन बाद सत्र समाप्त हो जाएगा। समाचारपत्रों में तस्वीरें छपेंगी, भाषणों के उद्धरण आएँगे और लोकतंत्र फिर विश्राम पर चला जाएगा। तब तक जनता अपने गड्ढों वाली सड़क, महँगी दाल, अधूरी योजनाओं और लंबी कतारों के साथ अगली बैठक की प्रतीक्षा करेगी।
क्योंकि हमारे लोकतंत्र में आशा कभी समाप्त नहीं होती। केवल सत्र समाप्त होते हैं।
आचार्य प्रताप
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