पोस्टर में भारत, परदे के पीछे हिंदुस्तान”

“पोस्टर में भारत, परदे के पीछे हिंदुस्तान”

आजकल देश को समझने का सबसे आसान तरीका यह है कि अख़बार मत पढ़िए, बजट मत देखिए, गाँव मत जाइए, अस्पताल मत देखिए। बस एक आकर्षक पोस्टर देख लीजिए। पोस्टर में भारत हमेशा मुस्कुराता हुआ मिलता है। वहाँ न बेरोज़गारी होती है, न महँगाई, न सड़क के गड्ढे। वहाँ सब कुछ ऐसा चमकता है जैसे देश नहीं, किसी नई कार का विज्ञापन हो।

यह जो चित्र सामने है, उसमें 4399 दिन की उपलब्धियाँ गिनाई गई हैं। अनुच्छेद 370 हटाया गया, राम मंदिर बना, UPI आया, GST आया, वंदे भारत चली, खुले में शौच मुक्त भारत बना और अर्थव्यवस्था दौड़ पड़ी। इन उपलब्धियों में कई बातें वास्तविक सरकारी निर्णयों और पहलों से जुड़ी हैं तथा सार्वजनिक रूप से दर्ज हैं। 

अब समस्या उपलब्धियों से नहीं है। समस्या यह है कि भारत को हम पोस्टर से देखने लगे हैं और हिंदुस्तान को देखना भूल गए हैं।

शरद जोशी होते तो शायद कहते—“देश अब दो भागों में बँट गया है। एक वह जो पोस्टर में रहता है और दूसरा वह जो पोस्टर चिपकाता है।”

पोस्टर वाला भारत कहता है—“मैं दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था हूँ।”

खेत वाला किसान पूछता है—“भइया, बढ़ रही है तो मेरे गेहूँ का दाम भी साथ लेती जाए।”

पोस्टर वाला भारत कहता है—“UPI ने दुनिया बदल दी।”

यह बात काफी हद तक सही भी है। डिजिटल भुगतान के क्षेत्र में भारत ने बड़ी छलांग लगाई है। 

लेकिन सतना, रीवा और बघेलखंड के गाँव में बैठा बुजुर्ग अभी भी कहता है—“बाबू, पैसा त फोन मा आ गओ, अब निकरिहै कहाँ से?”

प्रगति और व्यवहार के बीच जो खाई है, वह किसी सरकारी रिपोर्ट में नहीं दिखती।

राम मंदिर बना। करोड़ों लोगों की आस्था का विषय था। बना और भव्य बना। अनुच्छेद 370 भी इतिहास का हिस्सा बन गया। 

लेकिन हिंदुस्तान का एक कोना यह भी पूछता है कि क्या अब सरकारी स्कूल में मास्टर जी पूरे हैं? क्या अस्पताल में डॉक्टर मिल रहा है? क्या प्रतियोगी परीक्षा का परिणाम समय पर आ रहा है?

पोस्टर जवाब नहीं देता। पोस्टर केवल मुस्कुराता है।

GST को “एक देश, एक कर” कहा गया। सुनने में ऐसा लगता है जैसे पूरे देश को एक ही नाप का कुर्ता पहना दिया गया हो। बड़े उद्योगपति ने वह कुर्ता प्रेस करके पहन लिया, पर छोटे दुकानदार को आज भी कभी पोर्टल, कभी रिटर्न और कभी नोटिस के बटन समझ नहीं आते।

हमारे यहाँ उपलब्धियों का भी अपना लोकतंत्र है। जो उपलब्धि आपके पक्ष की हो, वह राष्ट्र निर्माण है। जो दूसरे की हो, वह प्रचार है।

एक बार हमारे गाँव के चौपाल में काका कह रहे थे—

“बेटा, पहिले नेता काम करिके पोस्टर लगावत रहिन। अब पोस्टर लगाके काम खोजत हैं।”

चौपाल में सन्नाटा छा गया। क्योंकि व्यंग्य की सबसे बड़ी ताकत यही है कि वह हँसाते-हँसाते सच बोल देता है।

बघेली में कहें तो—“कागज मा त सब बढ़िया हौ, फेर जउन मनई रोज कमाय के खाय, उहिका जिनगी मा का बदलिस, ई भी देखव।”

देश केवल उपलब्धियों की सूची नहीं होता। देश उन लोगों का भी होता है जो सूची के नीचे छोटे अक्षरों में लिखे रहते हैं।

बाहर दुनिया में भारत का नाम बढ़ा है, यह सच है। भारत की डिजिटल पहचान, कूटनीतिक उपस्थिति और वैश्विक प्रभाव पहले से अधिक चर्चा में हैं। 

पर भीतर का हिंदुस्तान अभी भी अपने हिस्से की बुनियादी सुविधाओं, रोजगार, शिक्षा और न्यायपूर्ण अवसरों की प्रतीक्षा कर रहा है।

व्यंग्य की कठिनाई यही है कि वह किसी उपलब्धि का अपमान नहीं करता, बल्कि उपलब्धि और वास्तविकता के बीच खड़े उस मौन आदमी की ओर इशारा करता है जिसे कोई पोस्टर जगह नहीं देता।

अंततः प्रश्न यह नहीं है कि 4399 दिनों में क्या-क्या हुआ।

प्रश्न यह है कि जो हुआ, वह पोस्टर से उतरकर आम आदमी के जीवन में कितना पहुँचा।

क्योंकि राष्ट्र केवल मंदिरों, ट्रेनों, कानूनों और आँकड़ों से नहीं बनता; राष्ट्र तब बनता है जब पोस्टर वाला भारत और वास्तविक हिंदुस्तान एक-दूसरे से मिल लें।

उस दिन शायद पोस्टर लगाने की ज़रूरत भी नहीं पड़ेगी। तब उपलब्धियाँ दीवारों पर नहीं, लोगों के चेहरों पर दिखाई देंगी।॥

आचार्य प्रताप 

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Achary Pratap

समालोचक , संपादक तथा पत्रकार प्रबंध निदेशक अक्षरवाणी साप्ताहिक संस्कृत समाचार पत्र

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