कॉस्मिक वाई-फाई, वैतरणी का नेटवर्क और परलोक का डेटा पैक

कॉस्मिक वाई-फाई, वैतरणी का नेटवर्क और परलोक का डेटा पैक

श्मशान बड़ा अद्भुत स्थान है। यहाँ आदमी पहली बार अपने सारे "अपडेट" बंद करके मूल संस्करण में लौटता है। जीवन भर जो महाशय मोबाइल का डेटा रिचार्ज कराते रहे, बैंक बैलेंस बढ़ाते रहे, पद और प्रतिष्ठा के स्क्रीनशॉट जमा करते रहे, वे एक दिन चिता पर लेटे हुए इतने शांत दिखते हैं कि लगता है मानो ब्रह्मांड ने उन्हें "एयरप्लेन मोड" में डाल दिया हो।

लेकिन हमारे समाज की कल्पनाशक्ति भी कमाल की है। चिता की आग अभी ठंडी भी नहीं होती कि परलोक का लॉजिस्टिक्स विभाग सक्रिय हो जाता है। कोई कहता है—जूता दान करो, रास्ता लंबा है। कोई कहता है—छाता दान करो, धूप बहुत पड़ेगी। कोई कहता है—जलपात्र दो, प्यास लगेगी। सुनकर लगता है कि यमलोक कोई आध्यात्मिक लोक नहीं, बल्कि मध्यप्रदेश के किसी ऐसे बस स्टैंड का विस्तारित संस्करण है जहाँ यात्रियों के लिए अब तक शेड नहीं बना।

इधर गीता कहती है—"आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, अग्नि जला नहीं सकती।"

उधर गरुड़ पुराण का व्यावहारिक विभाग कहता है—"जूते नहीं मिले तो पैर छिल जाएँगे।"

अब बेचारा सामान्य मनुष्य करे तो क्या करे? एक तरफ कृष्ण हैं, दूसरी तरफ कर्मकांड का पूरा परिवहन मंत्रालय।

मुझे लगता है कि हमारे पूर्वजों ने आत्मा और मनुष्य के बीच का फर्क समझाने के लिए इतनी कहानियाँ गढ़ीं कि बाद की पीढ़ियाँ कहानी को सत्य और सत्य को कहानी समझ बैठीं।

असल मज़ा तो तब आया जब आधुनिक भाषा में इन सबका अनुवाद शुरू हुआ। अब आत्मा "कॉस्मिक एनर्जी" हो गई है, सूक्ष्म शरीर "एनर्जी बॉडी" हो गया है, श्राद्ध "क्वांटम ट्रांसफर" बन गया है और पुण्य "कॉस्मिक डेटा पैकेट"।

वाह रे मनुष्य!

जिसे समझ नहीं पाया, उसे अंग्रेज़ी नाम देकर संतुष्ट हो गया।

कल तक जो वैतरणी थी, आज वह "नेगेटिव साइकोलॉजिकल फ्रिक्वेंसी" है।

कल तक जो पितृलोक था, आज वह "इंटरडायमेंशनल ट्रांज़िट ज़ोन" है।

और कल तक जो श्रद्धा थी, वह अब "कॉस्मिक वाई-फाई" हो गई है।

मुझे डर है कि कहीं अगली पीढ़ी यह न पूछ बैठे कि "पिताजी, श्राद्ध 5G पर करें या 6G पर?"

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इस पूरे विमर्श में सबसे रोचक पात्र आत्मा नहीं, बल्कि सूक्ष्म शरीर है। आत्मा तो बड़ी आरामतलब निकली। उसे न भूख, न प्यास, न दुख, न सुख। वह तो बिल्कुल किसी सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारी की तरह बैठी है—"मुझसे कोई काम मत पूछो।"

सारा झंझट सूक्ष्म शरीर के हिस्से आया है।

भूख उसी को लगती है।

प्यास उसी को लगती है।

डर उसी को लगता है।

यात्रा भी वही करता है।

कष्ट भी वही भोगता है।

और दान-पुण्य का लाभ भी वही उठाता है।

आत्मा तो इस पूरे मामले में वैसी ही है जैसे किसी विभाग का मानद अध्यक्ष, जिसका नाम हर जगह छपा रहता है लेकिन फाइलें क्लर्क ही निपटाता है।

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परसाई जी होते तो शायद पूछते—"भाई, यदि मनुष्य का मन मृत्यु के बाद भी अपनी आदतों से मुक्त नहीं होता, तो क्या वहाँ भी सुबह की चाय की दुकान होगी?"

और शरद जोशी जी शायद जोड़ते—"अगर किसी को जीवन भर व्हाट्सऐप देखने की आदत रही हो, तो क्या सूक्ष्म शरीर भी वैतरणी किनारे बैठकर नेटवर्क खोजेगा?"

कल्पना कीजिए—

एक जीव अभी-अभी शरीर छोड़कर निकला है।

यमदूत उसे बुला रहे हैं।

लेकिन वह कह रहा है—"जरा रुकिए, मेरा आखिरी स्टेटस देख लेने दीजिए।"

यमदूत परेशान हैं।

चित्रगुप्त फाइल लेकर खड़े हैं।

और जीव पूछ रहा है—"वहाँ चार्जिंग पॉइंट मिलेगा न?"

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फिर भी, इस पूरी परंपरा के भीतर एक गहरी मानवीय संवेदना छिपी हुई है, जिसे नकारना कठिन है।

मृत्यु के बाद किया जाने वाला दान वास्तव में मृतक से अधिक जीवितों के लिए होता है।

जिस पुत्र को लगता है कि वह अपने पिता के लिए कुछ नहीं कर पाया, वह किसी भूखे को भोजन कराकर अपने भीतर की ग्लानि कम करता है।

जो परिवार शोक में डूबा है, वह सेवा और दान के माध्यम से दुःख को अर्थ देता है।

जो संपत्ति एक व्यक्ति छोड़ गया, उसका एक हिस्सा समाज के जरूरतमंदों तक पहुँच जाता है।

यही वह स्थान है जहाँ धर्म, मनोविज्ञान और समाजशास्त्र एक-दूसरे का हाथ पकड़ लेते हैं।

लेकिन मनुष्य की आदत है कि वह प्रतीक को पकड़ लेता है और उद्देश्य को भूल जाता है।

गाय की पूँछ पकड़कर वैतरणी पार करने का अर्थ सात्विकता का सहारा लेना था। हमने गाय तो पकड़ ली, सात्विकता छोड़ दी।

श्राद्ध का उद्देश्य कृतज्ञता था। हमने भोज तो रखा, कृतज्ञता भूल गए।

दान का उद्देश्य करुणा था। हमने रसीद संभाल ली, करुणा गुम कर दी।

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बघेली में एक कहावत है—"गगरी के पानी से जियादा, ओकर ठनक सुनाई देत है।"

आज धर्म के साथ भी कुछ वैसा ही हो रहा है। भीतर का जल कम हो रहा है, बाहर की ठनक बढ़ती जा रही है।

सवाल यह नहीं है कि वैतरणी सचमुच है या नहीं।

सवाल यह भी नहीं कि सूक्ष्म शरीर भूखा-प्यासा होता है या नहीं।

असल सवाल यह है कि जीवित रहते हुए हमने अपने भीतर कितनी वैतरणी जमा कर ली है—लोभ की, क्रोध की, ईर्ष्या की और अहंकार की।

क्योंकि यदि मनुष्य जीवन में ही इन नदियों को पार नहीं कर पाया, तो मृत्यु के बाद की सारी नावें भी शायद कम पड़ जाएँ।

और यदि उसने जीवन में करुणा, सेवा, सत्य और विवेक का दीप जला लिया, तो संभव है कि उसे किसी कॉस्मिक वाई-फाई, किसी जूते-छाते और किसी विशेष डेटा पैक की आवश्यकता ही न पड़े।

आख़िरकार, सबसे बड़ा श्राद्ध मृतकों के नाम पर किया गया भोज नहीं, बल्कि उनके अच्छे संस्कारों को अपने जीवन में जीवित रखना है।

बाकी जहाँ तक परलोक की बात है—वहाँ का नेटवर्क कैसा है, इसका सटीक विवरण अभी तक किसी ने ग्राहक सेवा केंद्र में दर्ज नहीं कराया है। लेकिन इतना तय है कि यदि मनुष्य अपने भीतर की वैतरणी पार कर ले, तो उसे किसी बाहरी पुल की आवश्यकता नहीं पड़ती।

जय सियाराम। 🙏🏻

आचार्य प्रताप

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Achary Pratap

समालोचक , संपादक तथा पत्रकार प्रबंध निदेशक अक्षरवाणी साप्ताहिक संस्कृत समाचार पत्र

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