“समय अच्छा हो तो आपकी गलती भी मजाक लगती है और समय खराब हो तो मजाक भी गलती बन जाती है।”
हमारे समाज में न्यायालय तो अनेक हैं—जिला न्यायालय, उच्च न्यायालय, सर्वोच्च न्यायालय—पर सबसे बड़ा न्यायालय यदि कोई है तो वह है समय का न्यायालय। इसकी अदालत में न कोई वकील चलता है, न कोई अपील। यहाँ वही सच माना जाता है जो समय की कुर्सी पर बैठा हुआ न्यायाधीश तय कर दे।
मैंने देखा है कि आदमी वही रहता है, उसके शब्द वही रहते हैं, उसके कर्म भी बहुत नहीं बदलते; बदलता है तो केवल समय। और समय बदलते ही वही व्यक्ति कभी प्रतिभाशाली कहलाने लगता है और कभी मूर्ख।
गाँव में एक बुजुर्ग कहा करते थे—“बबुआ, जब भाग खुला होय त गदहा भी घोड़ा दिखे, अउ जब भाग रूठ जाय त घोड़ा भी गदहा लगय।” उस समय हम हँस देते थे। अब लगता है कि वे किसी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर से कम विद्वान नहीं थे।
आजकल सफलता को लोग चरित्र का प्रमाणपत्र समझने लगे हैं। यदि कोई आदमी सफल है तो उसकी हर बात में दर्शन दिखाई देता है। वह देर से आए तो लोग कहते हैं—“देखिए, कितना व्यस्त व्यक्ति है।” और यदि वही आदमी असफल हो जाए तो उसकी समय-पालन की कमी पर संगोष्ठियाँ होने लगती हैं।
राजनीति में तो यह खेल और भी अद्भुत है। जब नेता सत्ता में होता है तो उसका हर निर्णय दूरदर्शी कहलाता है। वही निर्णय विपक्ष में पहुँचते ही मूर्खता का स्मारक बन जाता है। जनता भी बड़ी भोली है। कल तक जिस बात पर ताली बजा रही थी, आज उसी बात पर हूटिंग कर रही है। समय ने कुर्सी बदल दी और विचारधारा भी बदल गई।
शिक्षा जगत में भी समय का यह चमत्कार कम नहीं। परीक्षा में यदि छात्र अच्छे अंक ले आए तो उसकी शरारतों को “रचनात्मक ऊर्जा” कहा जाता है। वही बच्चा कम अंक ले आए तो माता-पिता कहते हैं—“हम तो पहले से जानते थे, लड़का बहुत लापरवाह है।”
एक विद्यालय में दो छात्र थे। पहला पढ़ाई में अव्वल था। एक दिन उसने विज्ञान प्रयोगशाला में गलती से एक बीकर तोड़ दिया। शिक्षक मुस्कुराए और बोले—“कोई बात नहीं, वैज्ञानिक प्रयोगों में ऐसा होता रहता है।”
दूसरे छात्र ने अगले सप्ताह वही बीकर तोड़ दिया। इस बार शिक्षक का चेहरा ऐसा हो गया जैसे राष्ट्र की अर्थव्यवस्था उसी बीकर पर टिकी हो। बोले—“तुमसे यही उम्मीद थी। तुम कभी नहीं सुधरोगे।”
बीकर दोनों ने तोड़ा था। अंतर केवल इतना था कि पहले छात्र का समय अच्छा था और दूसरे का समय खराब।
कार्यालयों में भी यही हाल है। एक अधिकारी यदि पदोन्नति पा ले तो उसके पुराने चुटकुले भी लोगों को हास्य साहित्य की उत्कृष्ट रचनाएँ लगने लगते हैं। लोग ठहाके लगाकर हँसते हैं। वही अधिकारी यदि किसी कारण पद से हट जाए तो वही चुटकुले असभ्य और फूहड़ घोषित कर दिए जाते हैं।
समाज में प्रतिष्ठा का तराजू बड़ा विचित्र है। यहाँ व्यक्ति को उसके कर्मों से कम और उसकी वर्तमान स्थिति से अधिक तौला जाता है। आदमी का मूल्यांकन उसके विचारों से नहीं, उसके समय से होता है।
मुझे एक काल्पनिक प्रसंग याद आता है।
एक नगर में समय महाराज स्वयं प्रकट हुए। उन्होंने घोषणा की—“आज मैं सबको उनकी वास्तविक औकात दिखाऊँगा।”
पहले एक व्यापारी को बुलाया गया। जब उसका व्यापार खूब चल रहा था तब लोग उसे ‘दूरदर्शी उद्योगपति’ कहते थे। समय महाराज ने उसके कारोबार में थोड़ी मंदी ला दी। अगले ही दिन वही लोग कहने लगे—“हमें तो पहले से पता था कि इसका हिसाब-किताब ठीक नहीं है।”
फिर एक कवि को बुलाया गया। पुरस्कार मिलने पर लोग उसे युगद्रष्टा बता रहे थे। पुरस्कार छिनते ही वही कवि ‘अतिशयोक्तिपूर्ण लेखक’ घोषित कर दिया गया।
अंत में समय महाराज मुस्कुराए और बोले—“तुम लोग व्यक्ति को नहीं, परिस्थिति को प्रणाम करते हो।”
सभा में सन्नाटा छा गया।
सच पूछा जाए तो समय केवल घड़ी की सुई नहीं है। वह समाज की सामूहिक मानसिकता का नाम है। जब समय अनुकूल होता है तो लोग हमारी कमियों पर पर्दा डाल देते हैं। और जब समय प्रतिकूल होता है तो हमारे गुणों पर भी प्रश्नचिह्न लगा देते हैं।
यही कारण है कि समझदार लोग सफलता में अधिक उछलते नहीं और असफलता में अधिक टूटते नहीं। वे जानते हैं कि आज जो प्रशंसा मिल रही है, वह पूरी तरह उनकी नहीं है; उसमें समय का भी योगदान है। और जो आलोचना मिल रही है, उसमें भी समय का हिस्सा कम नहीं।
बघेली में कहें तो—“समय के संग सब रंग बदलथें। जउन आज जय-जयकार करत हैं, उहे काल हू-हू करय लगिहैं।”
इसलिए मनुष्य को न प्रशंसा से मदमस्त होना चाहिए, न आलोचना से निराश। समय की अदालत में फैसले बदलते रहते हैं, पर चरित्र का दस्तावेज़ स्थायी रहता है।
समय अच्छा हो तो हमारी भूलें भी लोगों को विनोद लगती हैं और समय बुरा हो तो हमारा विनोद भी अपराध बन जाता है। इसलिए जीवन का सबसे बड़ा कौशल दूसरों की वाहवाही बटोरना नहीं, बल्कि परिस्थितियों के उतार-चढ़ाव में अपने विवेक और संतुलन को बचाए रखना है। क्योंकि अंततः समय बदलता रहता है, पर मनुष्य की असली पहचान उसके आचरण से बनती है, उसके भाग्य से नहीं।
आचार्य प्रताप
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