दो बच्चे वाले नियम की विदाई: अब जनसंख्या भी मुस्कुरा रही है
मध्य प्रदेश की राजनीति में इन दिनों एक नई खुशखबरी ने दस्तक दी है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने वह नियम समाप्त कर दिया है जिसके अनुसार दो से अधिक बच्चों वाले लोगों को सरकारी नौकरी के लिए अयोग्य माना जाता था। पोर्टल से भी संबंधित प्रारूप हटाने के निर्देश दिए गए हैं। यह समाचार सुनकर न केवल कुछ परिवारों में मिठाई बंटी होगी, बल्कि कई अधूरे सपनों ने भी अंगड़ाई ली होगी।
वैसे यह नियम बड़ा दिलचस्प था। सरकार कहती थी कि दो बच्चों से अधिक नहीं होने चाहिए। उधर गाँव-कस्बों में लोग कहते थे कि बच्चे तो भगवान की देन हैं। बीच में बेचारा नौकरी का फॉर्म फँसा रहता था। आदमी नौकरी के लिए आवेदन करता तो पहले अपने बच्चों की गिनती करता। कहीं ऐसा न हो कि तीसरे बच्चे की किलकारी सरकारी नौकरी की विदाई घंटी बन जाए।
हमारे यहाँ नियम बनाने और बदलने की परंपरा भी बड़ी निराली है। एक समय लगा कि जनसंख्या नियंत्रण ही देश का सबसे बड़ा धर्म है। फिर धीरे-धीरे पता चला कि कुछ प्रदेशों में आबादी बूढ़ी होने लगी है, श्रमशक्ति कम पड़ रही है और समाज का गणित बदल रहा है। तब जाकर समझ में आया कि जीवन सिर्फ आँकड़ों की एक्सेल शीट नहीं है।
कल्पना कीजिए, एक सज्जन वर्षों से प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे थे। पढ़ाई कम और बच्चों की संख्या अधिक हो गई। परिणाम यह हुआ कि वे सरकारी नौकरी के दरवाजे तक पहुँचकर लौट आते थे। अब नियम हट गया है तो वे सोच रहे होंगे कि "चलो, देर आए दुरुस्त आए। अब बच्चों के नाम पर नहीं, अंक के नाम पर असफल होंगे।"
बघेली में कहें तो, "भइया, अब तौ नौकरी के रास्ता मा लइका-फइका गिनै के झंझट खतम भवा।" पहले आवेदन पत्र भरते समय अभ्यर्थी अपने प्रमाणपत्र कम और परिवार रजिस्टर ज्यादा खोजता था। अब शायद फिर से किताबों की ओर लौटे।
हालाँकि व्यंग्य का एक पक्ष यह भी है कि सरकारें अक्सर जनता को राहत देती रहती हैं और जनता राहत पाते-पाते भ्रमित हो जाती है। कल तक जो नियम समाज सुधार का साधन बताया जाता था, आज वह अनुपयोगी घोषित हो जाता है। जनता सोचती है कि आखिर सही कौन था—नियम बनाने वाला या नियम हटाने वाला? लेकिन लोकतंत्र में ऐसे प्रश्न पूछना कभी-कभी उतना ही कठिन होता है जितना सरकारी कार्यालय में बिना किसी कमी के फॉर्म जमा करना।
फिर भी इस निर्णय का एक मानवीय पक्ष है। सरकारी नौकरी की पात्रता किसी व्यक्ति की योग्यता, मेहनत और क्षमता से तय होनी चाहिए, परिवार के आकार से नहीं। समाज की परिस्थितियाँ अलग-अलग होती हैं और हर परिवार की अपनी कहानी होती है। एक समान नियम कई बार उन कहानियों को समझ नहीं पाते।
अंततः यह निर्णय केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि नीति-निर्माण के बदलते दृष्टिकोण का संकेत है। प्रश्न यह नहीं कि नियम हटा या बचा रहा। प्रश्न यह है कि क्या हमारी नीतियाँ व्यक्ति की गरिमा और अवसर की समानता को केंद्र में रखती हैं?
क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ा सुधार नियम बदलना नहीं, बल्कि यह स्वीकार करना है कि समय के साथ सोच भी बदलनी चाहिए। और जब सोच बदलती है, तब केवल पोर्टल से प्रारूप नहीं हटते, लोगों के मन से भी कई अनावश्यक डर हट जाते हैं।
आचार्य प्रताप
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