खाद की कतार में खड़ा लोकतंत्र

खाद की कतार में खड़ा लोकतंत्र

बरसात की पहली फुहार गिरते ही किसान का मन वैसे ही हरा हो जाता है जैसे चुनाव के पहले नेता का भाषण। खेत तैयार हैं, बैल की जगह ट्रैक्टर तैयार है, धान, उड़द, मूंग, ज्वार, बाजरा और सब्जियों के बीज भी अपनी नियति की प्रतीक्षा में बोरी के भीतर करवटें बदल रहे हैं। बस एक छोटी-सी चीज़ नहीं है—खाद। और दूसरी छोटी-सी चीज़ नहीं है—डीजल।

अब आप कहेंगे कि ये तो बहुत बड़ी चीज़ें हैं। लेकिन राजनीति में बड़ी चीज़ वही होती है जो भाषण में फिट बैठ जाए। किसान की समस्या तो आंकड़ों के नीचे दबा हुआ वह फुटनोट है जिसे पढ़ने की फुर्सत किसी के पास नहीं होती।

सतना जिले के कोटर तहसील क्षेत्र में इन दिनों बड़ा मनोरम दृश्य है। खेतों से अधिक भीड़ खाद की दुकानों पर दिखाई देती है। किसान सुबह से लाइन में खड़ा है। उसकी जेब में पैसे हैं, खेत में उम्मीद है, बादलों में पानी है, लेकिन दुकान में खाद नहीं है। यह वही स्थिति है जैसे विद्यालय में छात्र हो, शिक्षक हो, परीक्षा हो, पर प्रश्नपत्र न हो।

किसान सोचता है कि शायद अगली गाड़ी आ जाएगी। दुकान वाला कहता है—"भैया, ऊपर से सप्लाई नहीं आई।" ऊपर कौन है, यह आज तक किसी किसान को समझ नहीं आया। ऊपर भगवान हैं या विभाग, यह रहस्य वेदों से भी पुराना है।

उधर पेट्रोल पंपों पर डीजल की तलाश में ट्रैक्टर ऐसे घूम रहे हैं जैसे नौकरी की तलाश में डिग्रीधारी युवक। पंप वाला मुस्कराकर कह देता है—"डीजल खत्म है।" यह सुनकर किसान के चेहरे पर वही भाव आते हैं जो किसी दूल्हे को बारात के दिन घोड़ी न मिलने पर आते होंगे।

लेकिन सबसे सुखद दृश्य तो तब आता है जब कोई नेता या अधिकारी बयान देता है—"स्थिति पूरी तरह सामान्य है।"

भारतीय राजनीति में "सब ठीक है" एक ऐसा मंत्र है जो हर संकट में काम आता है। पुल टूट जाए—सब ठीक है। सड़क बह जाए—सब ठीक है। अस्पताल में दवा न हो—सब ठीक है। किसान खाद के लिए भटक रहा हो—सब ठीक है।

लगता है "सब ठीक है" कहने के लिए कोई विशेष प्रशिक्षण दिया जाता होगा।

कोटर तहसील के किसान इन दिनों खेत कम और कतारें ज्यादा नाप रहे हैं। कोई खाद की दुकान की लाइन में है, कोई डीजल के लिए पेट्रोल पंप पर है। एक किसान ने मजाक में कहा—"अब खेती कम, परिक्रमा ज्यादा कर रहे हैं।" उसकी बात सुनकर दूसरे किसान ने बघेली में जवाब दिया—"दद्दा, अब तो लागत है खेती नाय, तीर्थ यात्रा चलत है।"

वास्तव में किसान इस देश का सबसे बड़ा आशावादी प्राणी है। हर वर्ष संकट झेलता है, फिर भी अगली फसल की उम्मीद नहीं छोड़ता। यदि उसकी जगह कोई नेता होता तो शायद तीन बार प्रेस कॉन्फ्रेंस कर चुका होता और चार बार विरोधियों को दोष दे चुका होता।

किंतु किसान न प्रेस बुलाता है, न ट्वीट करता है। वह केवल लाइन में खड़ा रहता है। उसके धैर्य का लाभ सब उठाते हैं—प्रशासन भी, राजनीति भी और व्यवस्था भी।

कल्पना कीजिए, यदि खाद की दुकान के बाहर लगी कतार को चुनावी रैली घोषित कर दिया जाए तो शायद अगले ही दिन खाद के ट्रक पहुँच जाएँ। यदि किसान अपने ट्रैक्टरों पर पार्टी के झंडे लगा लें तो संभव है डीजल भी प्रकट हो जाए। क्योंकि इस देश में समस्या का समाधान अक्सर उसकी गंभीरता से नहीं, उसकी राजनीतिक उपयोगिता से तय होता है।

सबसे मजेदार बात यह है कि किसान की परेशानी पर चर्चा कम और आंकड़ों पर चर्चा ज्यादा होती है। कोई बताता है कि रिकॉर्ड उत्पादन होगा, कोई बताता है कि पर्याप्त भंडारण है। किसान सोचता है कि जब सब कुछ पर्याप्त है तो फिर उसकी बोरी खाली क्यों है?

कभी-कभी लगता है कि सरकारी रिपोर्ट और खेत की वास्तविकता दो अलग-अलग ग्रहों पर रहती हैं। रिपोर्ट में हरियाली लहलहाती है और किसान की आँखों में चिंता।

बरसात इंतजार नहीं करती। खेत भी इंतजार नहीं करते। बीज भी ज्यादा दिन तक धैर्य नहीं रखते। लेकिन व्यवस्था बड़े आराम से प्रतीक्षा कर सकती है। उसे मालूम है कि आखिरकार किसान ही झुकेगा, किसान ही रुकेगा और किसान ही फिर अगली फसल बो देगा।

यही उसकी ताकत भी है और यही उसकी सबसे बड़ी त्रासदी भी।

आज कोटर तहसील का किसान खाद और डीजल की तलाश में भटक रहा है। उसके पैरों की धूल में इस देश की खाद्य सुरक्षा छिपी है। किंतु विडंबना देखिए, जो व्यक्ति पूरे देश का पेट भरता है, वह स्वयं व्यवस्था की भूख का शिकार बना हुआ है। और यह मात्र एक तहसील की बात नहीं है संभवतः हर तहसील , हर जिले और संपूर्ण मध्यप्रदेश की यही हालात है।

प्रश्न यह बनता है कि इसका उत्तरदाई कौन है?
कौन इसका उत्तरदायित्व लेकर अगुआ बने और समस्या का समाधान हो?
अंत में बस इतना ही कि खेत में फसल उगाने के लिए केवल बारिश नहीं, व्यवस्था की ईमानदारी भी चाहिए। वरना आने वाले समय में किसान खेत कम और कतारें ज्यादा बोएगा। और तब भी शायद कोई नेता मंच से कहेगा—"चिंता की कोई बात नहीं, सब ठीक है।"

क्योंकि हमारे लोकतंत्र में कभी-कभी सबसे बड़ी समस्या समस्या नहीं होती, बल्कि उसका "सब ठीक है" घोषित कर दिया जाना होता है।

आचार्य प्रताप 

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Achary Pratap

समालोचक , संपादक तथा पत्रकार प्रबंध निदेशक अक्षरवाणी साप्ताहिक संस्कृत समाचार पत्र

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