नाम बदलो, ज्ञान बाद में देंगे!
मध्य प्रदेश में शिक्षा इन दिनों बड़ी प्रगतिशील हो गई है। पहले विद्यालय बच्चों को पढ़ाते थे, अब स्वयं अपना परिचय ढूँढ़ रहे हैं। कभी वे "शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय" हुआ करते थे। फिर एक दिन उन्हें लगा कि यह नाम कुछ साधारण है। अतः वे "सीएम राइज विद्यालय" बन गए। जनता ने सोचा कि अब विद्यालय तो नहीं, कम से कम शिक्षा अवश्य राइज होगी। किंतु कुछ वर्षों बाद पता चला कि शिक्षा वहीं खड़ी है, केवल बोर्ड बदल गया है।
अब नया दौर आया है। विद्यालयों को "शासकीय संदीपनी विद्यालय" बनाया जा रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार शिक्षा नहीं, विद्यालयों के नामों का पुनर्जन्म करा रही है। विद्यालय बेचारा हर पाँच वर्ष में अपना नाम बदल-बदलकर इतना भ्रमित हो चुका है कि यदि उससे उसका परिचय पूछा जाए तो वह स्वयं उपस्थिति पंजिका देखने लगे।
हमारे बघेली अंचल में एक कहावत है—"नांव बदलयँ से बइल घोड़ न होयी।" अर्थात नाम बदल देने से बैल घोड़ा नहीं बन जाता। किंतु शासन को शायद विश्वास है कि नाम में ही समस्त ब्रह्मांड का सार छिपा है। यदि विद्यालय का नाम दस बार बदल दिया जाए तो संभवतः बिना शिक्षक के भी बच्चे न्यूटन और आइंस्टीन बनने लगेंगे।
सरकार की शिक्षा नीति को देखकर कभी-कभी लगता है कि मंत्रालय में दो विभाग होंगे। एक विभाग शिक्षक भर्ती का होगा, जहाँ वर्षों से ताला लटका होगा। दूसरा विभाग नाम परिवर्तन का होगा, जहाँ चौबीसों घंटे टाइपिंग मशीन चलती होगी।
एक बाबू फाइल लेकर दौड़ता होगा—
"सर, विद्यालय में गणित का शिक्षक नहीं है।"
अधिकारी गंभीर होकर कहेंगे—"नाम क्या है विद्यालय का?"
"शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय।"
"बस यही समस्या है। पहले इसका नाम बदलो। गणित अपने आप आ जाएगा।"
दूसरा कर्मचारी घबराते हुए आएगा—
"सर, विज्ञान प्रयोगशाला में उपकरण नहीं हैं।"
"अरे भाई, उपकरण बाद में खरीदेंगे। पहले बोर्ड बदलवाओ। जब तक नया नाम नहीं लगेगा, बीकर और टेस्ट ट्यूब भी आने में संकोच करेंगे।"
ऐसा लगता है कि शिक्षा का सारा संकट विद्यालय के नाम में ही छिपा हुआ था। शिक्षक कम हैं, यह समस्या नहीं। विद्यार्थियों का अनुपात बिगड़ रहा है, यह समस्या नहीं। वर्षों से रिक्त पद पड़े हैं, यह भी समस्या नहीं। समस्या केवल यह है कि विद्यालय का नाम पर्याप्त आधुनिक, आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, राष्ट्रीय और चुनावी नहीं था।
शिक्षक भर्ती की स्थिति तो और भी रोचक है। विद्यालयों में शिक्षक ऐसे मिलते हैं जैसे बरसात में धूप निकल आए। एक शिक्षक पाँच विषय पढ़ा रहा है। सुबह गणित, दोपहर में विज्ञान, फिर इतिहास, और आवश्यकता पड़ने पर खेलकूद भी। शाम को घर जाकर वह स्वयं सोचता होगा कि आखिर उसकी नियुक्ति किस विषय में हुई थी।
उधर अतिथि शिक्षक हैं। नाम बड़ा सम्मानजनक है—"अतिथि"। भारतीय संस्कृति में कहा गया है "अतिथि देवो भवः"। किंतु यहाँ स्थिति कुछ भिन्न है। देवता जैसी उपाधि देकर उन्हें सुविधाएँ ऐसी दी जाती हैं कि देवता भी पुनः पृथ्वी पर जन्म लेने से डर जाएँ।
अतिथि शिक्षक वर्षों तक विद्यालय का भार उठाते हैं। बच्चों को पढ़ाते हैं, परीक्षा कराते हैं, अभिलेख भरते हैं, निरीक्षण झेलते हैं। किंतु जब अधिकारों की बात आती है तो उन्हें याद दिला दिया जाता है कि वे अतिथि हैं। मानो शिक्षा विभाग ने उन्हें विवाह में आए उस रिश्तेदार की तरह समझ रखा हो जिसे खाना खिला दो, पर घर के निर्णयों में मत शामिल करो।
इधर शिक्षक सेवानिवृत्त हो रहे हैं। हर महीने कुछ कुर्सियाँ खाली हो जाती हैं। किंतु नई भर्ती का समाचार ऐसा है जैसे किसी गाँव में सौ वर्ष से लोग किसी चमत्कारी साधु के आने की प्रतीक्षा कर रहे हों। सबको विश्वास है कि भर्ती आएगी, लेकिन कब आएगी, यह स्वयं भर्ती को भी नहीं मालूम।
एक काल्पनिक प्रसंग सुनिए।
एक दिन एक विद्यालय के मुख्य द्वार पर नया बोर्ड लगाया जा रहा था। उसी समय एक विद्यार्थी ने पूछा—
"गुरुजी, हमारे विद्यालय का नाम फिर बदल गया?"
गुरुजी बोले—"हाँ बेटा।"
"तो क्या अब हमारी पढ़ाई भी बदल जाएगी?"
गुरुजी मुस्कुराए—"नहीं बेटा, पढ़ाई तो वही रहेगी।"
"फिर बदला क्या?"
गुरुजी ने लंबी साँस ली—"बोर्ड।"
बच्चा कुछ देर सोचता रहा। फिर बोला—
"गुरुजी, अगर मेरा रिपोर्ट कार्ड खराब आए तो क्या मैं भी अपना नाम बदल लूँ?"
गुरुजी ने कहा—"चुप रहो बेटा, तुम बहुत खतरनाक प्रश्न पूछ रहे हो। आगे चलकर तुम्हें नीति-निर्माता नहीं बनने देंगे।"
दरअसल हमारी राजनीति में नामों का एक अलग ही महत्व है। सड़कें, योजनाएँ, भवन, नगर, स्टेशन—सबका नाम बदलता रहता है। अब विद्यालय भी इस पवित्र परंपरा में सम्मिलित हो गए हैं। लगता है शासन यह मान बैठा है कि विकास एक प्रकार का बोर्ड है जिसे पुराने नाम के ऊपर ठोक देना चाहिए।
पर शिक्षा का सच बोर्डों पर नहीं लिखा जाता। वह कक्षाओं में लिखा जाता है। वह शिक्षक की उपस्थिति में लिखा जाता है। वह पुस्तकालय की अलमारियों, प्रयोगशालाओं के उपकरणों और विद्यार्थियों की जिज्ञासाओं में लिखा जाता है।
विद्यालय का नाम चाहे "संदीपनी" हो, "राइज" हो या "शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय"—यदि कक्षा में शिक्षक नहीं है तो वह नाम केवल रंगीन अक्षरों का समूह भर है।
शायद अब समय आ गया है कि शिक्षा विभाग नामकरण महोत्सव से थोड़ा विराम ले और विद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तथा अतिथि शिक्षकों की स्थिति पर भी उतनी ही गंभीरता से विचार करे जितनी गंभीरता से नए बोर्ड के फ़ॉन्ट और रंग पर करता है।
अन्यथा आने वाली पीढ़ियाँ इतिहास की पुस्तक में पढ़ेंगी कि इक्कीसवीं सदी का सबसे बड़ा शैक्षिक सुधार यह था कि विद्यालयों के नाम बहुत सुंदर हो गए थे। बस, विद्यालयों में पढ़ाने वाला कोई नहीं बचा था।
और तब बघेली में कोई बूढ़ा किसान मुस्कुराकर कहेगा—
"पढ़ाई त भूखी बैठी रहिगै, अउ सरकार नांव के हलुआ बाँटत रहिगै।"
यही इस युग का सबसे बड़ा शैक्षिक व्यंग्य होगा।
आचार्य प्रताप
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