बंदरों का विजय उत्सव और उजड़ते खेत का लोकतंत्र

बंदरों का विजय उत्सव और उजड़ते खेत का लोकतंत्र

गाँव के बाहर एक मक्के का खेत था। खेत का मालिक बड़ा निर्दयी आदमी माना जाता था। निर्दयी इसलिए नहीं कि वह किसी का हक मारता था, बल्कि इसलिए कि वह अपने खेत में घुसकर मक्का तोड़ने वाले बंदरों को भगाता था। बंदरों की दृष्टि में वह अत्याचारी था, शोषक था, लोकतंत्र-विरोधी था और संभवतः जंगल-विरोधी ताकतों का एजेंट भी था।

जब भी बंदर खेत में उतरते, वह लाठी लेकर दौड़ पड़ता। बंदरों की सभाओं में उसके विरुद्ध प्रस्ताव पारित होते। युवा बंदर उसे "कृषि तानाशाह" कहते और बूढ़े बंदर अपने बच्चों को उसके अत्याचारों की कहानियाँ सुनाते।

फिर एक दिन खबर आई कि किसान मर गया।

जंगल में खुशी की लहर दौड़ गई। बंदरों ने पेड़ों पर चढ़-चढ़कर कलाबाज़ियाँ खाईं। कई बंदरों ने एक-दूसरे को गले लगाया। कुछ ने इसे "स्वतंत्रता दिवस" घोषित कर दिया। बंदर मीडिया ने विशेष कार्यक्रम चलाए—"लाठी युग का अंत", "बंदर अधिकारों की ऐतिहासिक विजय", "अब मक्का हमारा है"।

एक युवा बंदर ने उत्साह में कहा—"देखा! अत्याचार का अंत होकर रहता है।"

दूसरे ने कहा—"इतिहास गवाह है कि जनता हमेशा जीतती है।"

तीसरे ने पूछा—"लेकिन अब खेत कौन बोएगा?"

उसकी बात को तुरंत राष्ट्रविरोधी घोषित कर दिया गया। उसे किसान समर्थक गिरोह का सदस्य बताया गया। बंदरों की भीड़ में विवेक का प्रश्न पूछना हमेशा से खतरनाक काम रहा है।

उत्सव कई दिन चला।

उधर खेत सूना पड़ा रहा।

बरसात आई। खरपतवार उग आए। मेड़ टूट गई। किसी ने बीज नहीं डाले। किसी ने खाद नहीं डाली। किसी ने रात-रात भर जागकर नीलगायों से खेत नहीं बचाया। किसी ने तपती दोपहर में पसीना नहीं बहाया।

बंदरों को लगा कि यह तो प्रारंभिक कठिनाई है। स्वतंत्रता के बाद थोड़ी अव्यवस्था स्वाभाविक होती है।

मगर मौसम बीत गया।

जहाँ पिछले साल मक्के की बालियाँ लहलहाती थीं, वहाँ इस बार केवल घास उगी थी। बंदर पेड़ पर बैठकर दूर तक देखते रहे। उन्हें पहली बार समझ आया कि मक्का खेत में सरकार की घोषणा से नहीं उगता, नारे लगाने से नहीं उगता और किसान को गाली देने से तो बिल्कुल नहीं उगता।

मक्का उगता है श्रम से।

यह खोज बंदरों के लिए उतनी ही चौंकाने वाली थी जितनी हमारे समय के कई बुद्धिजीवियों के लिए यह खोज कि बिजली ट्वीट करने से नहीं, बिजलीघर चलाने से आती है।

बंदरों ने आपातकालीन बैठक बुलाई।

एक वरिष्ठ बंदर ने कहा—"साथियो! हमें षड्यंत्र की बू आ रही है।"

दूसरे ने कहा—"हाँ, जरूर किसी ने मक्का गायब कर दिया है।"

तीसरे ने सुझाव दिया—"एक जांच समिति बननी चाहिए।"

चौथे ने कहा—"नहीं, पहले किसान की विरासत की आलोचना होनी चाहिए।"

घंटों बहस हुई, लेकिन खेत में एक दाना नहीं उगा।

यह दृश्य देखकर मुझे कई बार मनुष्य समाज की याद आती है। हम भी अक्सर उसी बंदर जाति के गौरवशाली सदस्य प्रतीत होते हैं। जो व्यक्ति, संस्था या व्यवस्था हमारी सुविधाओं का आधार होती है, हम सबसे पहले उसी को कोसते हैं।

शिक्षक पढ़ाए तो उसकी आलोचना।
डॉक्टर इलाज करे तो उसकी आलोचना।
किसान अन्न उगाए तो उसकी आलोचना।
सैनिक सीमा पर खड़ा रहे तो उसकी आलोचना।

और जिस दिन वे हट जाएँ, तब हमें पता चलता है कि जिन पत्थरों को हम रास्ते की बाधा समझ रहे थे, वे दरअसल पुल के खंभे थे।

आज राजनीति में भी यही हो रहा है। जनता का एक वर्ग किसी नेता के जाने पर ऐसे पटाखे छोड़ता है मानो अब स्वर्ग पृथ्वी पर उतर आएगा। दूसरा वर्ग किसी संस्था के कमजोर होने पर ऐसे प्रसन्न होता है जैसे सारी समस्याओं का समाधान हो गया हो।

लेकिन प्रश्न यह नहीं है कि कौन गया।

प्रश्न यह है कि उसके बाद खेत कौन बोएगा?

लोकतंत्र में सबसे आसान काम विरोध करना है। सबसे कठिन काम निर्माण करना है।

एक आदमी को गिराने में पाँच मिनट लगते हैं, लेकिन उसकी जगह खड़ा होने योग्य आदमी तैयार करने में पाँच दशक भी कम पड़ सकते हैं।

बंदरों ने भी यही गलती की थी। उन्होंने किसान को केवल लाठी के रूप में देखा। उन्होंने कभी उसके फटे हुए हाथ नहीं देखे। उन्होंने केवल अपना अपमान देखा, खेत की मेहनत नहीं देखी।

हमारे समाज की सबसे बड़ी विडम्बना भी यही है। हम परिणाम का उपभोग करते हैं, प्रक्रिया का सम्मान नहीं करते।

हम रोटी खाते हैं, किसान को भूल जाते हैं।
हम ज्ञान लेते हैं, शिक्षक को भूल जाते हैं।
हम सुरक्षा चाहते हैं, प्रहरी को भूल जाते हैं।

और जब वे नहीं रहते तो हमें अचानक पता चलता है कि व्यवस्था का इंजन नारों से नहीं, जिम्मेदारियों से चलता है।

अगले वर्ष जंगल में फिर सभा हुई।

इस बार कोई नारा नहीं लगा।

एक बूढ़ा बंदर धीरे से बोला—"जिस आदमी को हम अपना शत्रु समझते रहे, वह दरअसल हमारी भूख और हमारे बीच खड़ा नहीं था; वह हमारी भूख और मक्का के बीच का पुल था।"


सभा में पहली बार सन्नाटा छाया।

क्योंकि सच्चाई जब आती है तो वह ताली नहीं बजवाती, आत्ममंथन करवाती है।

और शायद यही इस कथा का सार है कि किसी व्यक्ति, संस्था या व्यवस्था के विरोध में इतना मत बहक जाइए कि उसके अस्तित्व से मिलने वाले लाभों को ही भूल बैठें।

कई बार जिस आदमी के जाने पर हम उत्सव मना रहे होते हैं, वही अनजाने में हमारे कल का आधार होता है।

बंदरों को यह बात एक उजड़े हुए खेत ने सिखाई।

मनुष्य को यह बात इतिहास बार-बार सिखाता है।

लेकिन इतिहास की सबसे बड़ी समस्या यही है कि वह परीक्षा पहले लेता है और पाठ बाद में पढ़ाता है।

आचार्य प्रताप

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Achary Pratap

समालोचक , संपादक तथा पत्रकार प्रबंध निदेशक अक्षरवाणी साप्ताहिक संस्कृत समाचार पत्र

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