चींटियाँ, गन्ना और लोकतंत्र का गणित
किसी गाँव के बुजुर्ग ने एक दिन बड़ी गूढ़ बात कही— "चींटियाँ तादात में चाहे कितनी भी हो जाएँ, लेकिन गन्ना घरीट (घसीट) कर नहीं ले जा सकतीं।"
अब यह बात सुनकर मुझे लोकतंत्र की याद आ गई। हमारे यहाँ भी संख्या का बड़ा महिमामंडन है। चुनाव आते ही हर दल चींटियों की गिनती करने लगता है। कोई जाति की चींटियाँ गिनता है, कोई धर्म की, कोई क्षेत्र की। नेता लोग मानकर चलते हैं कि यदि चींटियाँ बहुत हो जाएँ तो गन्ना क्या, पूरा खेत ही उठा ले जाएँगी।
लेकिन प्रकृति का अपना संविधान है। वह बताती है कि संख्या और सामर्थ्य में उतना ही अंतर है जितना घोषणा और उपलब्धि में होता है।
सरकारें अक्सर संख्या के नशे में रहती हैं। विधानसभा और संसद में बहुमत मिल जाए तो लगता है कि अब सूरज भी सरकारी आदेश से उगेगा। मंत्री जी प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताते हैं कि हमने इतने करोड़, इतने लाख और इतने हजार की योजनाएँ बना दी हैं। आँकड़ों की चींटियाँ इतनी लंबी कतार में निकलती हैं कि जनता को लगता है अब गन्ना क्या, शक्कर का कारखाना ही घर पहुँच जाएगा।
लेकिन कुछ दिन बाद पता चलता है कि गन्ना वहीं पड़ा है। चींटियाँ अब भी उसके चारों ओर परिक्रमा कर रही हैं। प्रेस विज्ञप्तियों में गन्ना पाँच बार उठ चुका है, फाइलों में सात बार स्थानांतरित हो चुका है, उद्घाटन पत्थरों पर दस बार चमक चुका है, पर जमीन पर वह वहीं का वहीं पड़ा है।
लोकतंत्र का एक विचित्र सौंदर्य है। यहाँ चींटियाँ स्वयं तय करती हैं कि गन्ना कौन उठाएगा। फिर पाँच साल तक बैठकर देखती हैं कि चुनी हुई चींटियाँ गन्ना उठाती हैं या केवल भाषण देती हैं। यदि गन्ना नहीं हिलता तो अगली बार वे दूसरी चींटियों को चुन लेती हैं। नई चींटियाँ पुराने गन्ने के सामने खड़ी होकर घोषणा करती हैं— "पिछली चींटियों ने काम नहीं किया। हम गन्ना अवश्य उठाएँगे।"
फिर पाँच साल बीत जाते हैं।
हमारे यहाँ योजनाओं का हाल भी गन्ने जैसा है। सड़क, पानी, शिक्षा, अस्पताल— सबके सब लोकतंत्र के खेत में पड़े हुए गन्ने हैं। हर चुनाव में उनके चारों ओर नई-नई चींटियाँ जमा हो जाती हैं। कोई कहता है, "बस एक मौका और।" कोई कहता है, "इस बार ऐतिहासिक होगा।" कोई कहता है, "विश्वगुरु स्तर का गन्ना बनेगा।"
जनता तालियाँ बजाती है और गन्ना मुस्कुराता है।
बघेली में कहावत है— "बातन के बताशा मीठ रहैं, पेट त रोटी ले भरत है।" अर्थात बातों के बताशे मीठे लग सकते हैं, पर पेट तो रोटी से ही भरता है। लोकतंत्र भी आखिरकार परिणाम मांगता है, केवल परेड नहीं।
यह व्यंग्य सरकार पर उतना नहीं है जितना हमारी सामूहिक आदत पर है। हम अक्सर संख्या को शक्ति समझ लेते हैं और संगठन को समाधान। जबकि सच्चाई यह है कि हजारों चींटियाँ मिलकर भी वह काम नहीं कर सकतीं जिसके लिए सामर्थ्य, दिशा और ईमानदार प्रयास चाहिए।
लोकतंत्र में बहुमत आवश्यक है, पर पर्याप्त नहीं। बहुमत गन्ना उठाने की अनुमति देता है, क्षमता उसे उठाती है। संख्या रास्ता बनाती है, नीयत मंज़िल तक पहुँचाती है।
इसलिए जब अगली बार कोई नेता, दल या समर्थक केवल संख्या का ढोल पीटे, तो उस बुजुर्ग की बात याद कर लीजिए—
"चींटियाँ तादात में चाहे कितनी भी हो जाएँ, लेकिन गन्ना घरीट कर नहीं ले जा सकतीं।"
और लोकतंत्र की असली परीक्षा यही है कि गन्ना आखिर उठा कौन रहा है— चींटियाँ, या सिर्फ़ उनके भाषण।
आचार्य प्रताप
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