मोदी है तो मुमकिन है : ए.सी. कोच का लोकतंत्रीकरण”

मोदी है तो मुमकिन है : ए.सी. कोच का लोकतंत्रीकरण”

रेल यात्रा भी बड़ी अद्भुत चीज है। यह केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचने का साधन नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र का चलता-फिरता प्रयोगशाला संस्करण है। पहले के जमाने में रेल के डिब्बों का भी अपना-अपना सामाजिक चरित्र हुआ करता था। जनरल डिब्बा जनता का था, स्लीपर मध्यमवर्ग का था और ए.सी. कोच एक प्रकार से रेल का "संविधान-सम्मत वी.आई.पी. क्षेत्र" माना जाता था।

जनरल डिब्बे में चिप्स वाले, मूँगफली वाले, "चाय-चाय" वाले, खिलौने वाले, गुटखा छोड़ने की दवा बेचने वाले और कभी-कभी तो ऐसा लगता था मानो पूरा हाट-बाजार ही पटरी पर दौड़ रहा हो। स्लीपर कोच तक आते-आते यह भीड़ थोड़ी शालीन हो जाती थी। भिक्षुक और किन्नर भी अपने अधिकार क्षेत्र को समझते थे। उन्हें मालूम था कि लोकतंत्र में भी कुछ सीमाएँ होती हैं।

किन्तु समय परिवर्तनशील है। लोकतंत्र का पहिया रेल के पहिए से तेज घूमता है।
इस बार मैंने सोचा कि चलो, थोड़ा आराम किया जाए। ए.सी. का टिकट कराया। मन में विश्वास था कि यहाँ कम से कम शांति मिलेगी। पर जैसे ही यात्रा शुरू हुई, मुझे लगा कि मैं किसी वातानुकूलित बाजार में बैठा हूँ।

पहले एक सज्जन आए—"सर, पॉपकॉर्न ले लीजिए।"

मैंने सोचा, शायद रेलवे ने अब मनोरंजन के साथ स्नैक्स की नई सुविधा शुरू की है।

थोड़ी देर बाद दूसरे महाशय आए—"चॉकलेट ले लीजिए।"

फिर तीसरे आए—"विशेष ऑफर है।"

फिर चौथे आए, जिनके सामान का उद्देश्य मुझे आज तक समझ नहीं आया।

मैं खिड़की के बाहर भागते खेतों को देख रहा था और भीतर भारतीय उद्यमिता दौड़ रही थी।

ऐसा प्रतीत हुआ कि रेलवे ने "स्टार्टअप इंडिया" को सीधे ए.सी. कोच तक पहुँचा दिया है। जिसे जहाँ अवसर मिला, वहीं अपना व्यवसाय प्रारंभ कर दिया।

मुझे बरबस लोकतंत्र पर गर्व होने लगा। आखिर समानता का यही तो अर्थ है। यदि जनरल डिब्बे में मूँगफली वाला जा सकता है तो ए.सी. में पॉपकॉर्न वाला क्यों नहीं? यदि स्लीपर में चॉकलेट बिक सकती है तो वातानुकूलित वातावरण में उसका क्या अपराध?

रेलवे शायद सामाजिक समरसता का नया अध्याय लिख रहा है।

अब तो स्थिति यह है कि यात्री को यह समझ नहीं आता कि वह ट्रेन में सफर कर रहा है या किसी चलते-फिरते मेले में बैठा है। टिकट पर "ए.सी. थ्री टियर" लिखा होता है, लेकिन अनुभव "मिनी बाजार एक्सप्रेस" का मिलता है।

हमारे गाँव के एक बुजुर्ग कह रहे थे—"बाबू, पहिले ए.सी. डब्बा मा घुसना वैसा रहै जइसे कचहरी मा बिना बुलाए कलेक्टर साहब के कमरा मा घुस जाओ। अब त सब्बे के लिए दरवज्जा खुला है।"

उनकी बात में बघेली का रस भी था और लोकतंत्र का दर्शन भी।

रेलवे प्रशासन की भी अपनी विवशताएँ होंगी। आखिर वह भी भारतीय लोकतंत्र का ही अंग है। लोकतंत्र का मूल मंत्र है—सबको अवसर मिले। बस कभी-कभी यह अवसर टिकटधारी यात्री की अपेक्षाओं से थोड़ा अधिक व्यापक हो जाता है।

अब प्रश्न यह नहीं कि ए.सी. कोच में कौन प्रवेश कर रहा है। प्रश्न यह है कि जिस सुविधा के लिए यात्री अतिरिक्त किराया देता है, उसका अनुभव कितना सुरक्षित, व्यवस्थित और गरिमापूर्ण रह पाता है।

व्यंग्य की बात अलग है, पर सच यही है कि रेलवे ने देश को जोड़ा है। लाखों लोग प्रतिदिन इसकी सेवा लेते हैं। इसलिए यात्रियों की सुविधा और सुरक्षा के नियम केवल किताबों में नहीं, डिब्बों में भी दिखाई देने चाहिएँ। उद्यमिता अच्छी बात है, आजीविका भी आवश्यक है, पर व्यवस्था की अपनी मर्यादा होती है। रेल यदि पटरी छोड़ दे तो दुर्घटना होती है, और नियम यदि पटरी छोड़ दें तो अव्यवस्था।

अंततः मुझे लगा कि भारतीय लोकतंत्र की सबसे सुंदर तस्वीर शायद रेलगाड़ी ही है। यहाँ हर वर्ग, हर भाषा, हर विचार और हर प्रकार का विक्रेता मिल जाता है। फर्क सिर्फ इतना है कि कभी-कभी यात्री टिकट ए.सी. का खरीदता है और अनुभव जनरल डिब्बे की जीवंतता का प्राप्त कर लेता है।

रेलवे विभाग से शिकायत कम, विनम्र प्रार्थना अधिक है—लोकतंत्र बना रहे, समानता भी बनी रहे, पर यात्रियों को यह भरोसा भी बना रहे कि उन्होंने जिस श्रेणी का टिकट लिया है, उसकी गरिमा और सुविधा भी उनके साथ यात्रा कर रही है।

क्योंकि "मोदी है तो मुमकिन है" का अर्थ यह तो नहीं कि पॉपकॉर्न वाला भी वातानुकूलित लोकतंत्र का स्थायी सदस्य बन जाए!

आचार्य प्रताप 

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Achary Pratap

समालोचक , संपादक तथा पत्रकार प्रबंध निदेशक अक्षरवाणी साप्ताहिक संस्कृत समाचार पत्र

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