स्कोरकार्ड महाराज की जय हो!

स्कोरकार्ड महाराज की जय हो!

कहा जाता है कि लोकतंत्र जनता का, जनता के द्वारा और जनता के लिए होता है। पर हमारे यहाँ लोकतंत्र कभी-कभी ऐसा प्रतीत होता है मानो वह “तारीख का, तारीख के द्वारा और तारीख के लिए” संचालित हो रहा हो। न्यायालयों में तारीख पर तारीख की परंपरा तो पुरानी है, किंतु अब लगता है कि यह परंपरा प्रशासनिक गलियारों में भी बड़े सम्मान के साथ स्थापित हो चुकी है।

मध्यप्रदेश के अतिथि शिक्षक इन दिनों इसी लोकतांत्रिक उत्सव के सहभागी बने हुए हैं। वर्षों से विद्यालयों में बच्चों को पढ़ाने वाले ये शिक्षक अब शिक्षा से अधिक स्कोरकार्ड की तिथियों का अध्ययन कर रहे हैं। कोई पंचांग देखता है, कोई राशिफल, तो अतिथि शिक्षक नई अधिसूचना देखता है कि इस बार स्कोरकार्ड सत्यापन की तिथि कितने दिन और बढ़ी।
अतिथि शिक्षक ने जब पहली बार कहा गया कि “स्कोरकार्ड बनवाइए”, तो उसने बनवा लिया। जब कहा गया “सत्यापन कराइए”, तो उसने करा लिया। जब कहा गया “दस्तावेज़ जमा करिए”, तो वह भी कर दिया। अब बेचारा सोच रहा था कि अगला चरण भर्ती होगा। लेकिन सरकार की कल्पनाशक्ति उससे कहीं अधिक विकसित निकली। भर्ती की जगह फिर एक नई तारीख आ गई।

लगता है स्कोरकार्ड अब कोई दस्तावेज़ नहीं, बल्कि लोकतंत्र का नया राष्ट्रीय त्योहार बन गया है, जिसे बार-बार मनाया जाना आवश्यक है। हर कुछ दिनों बाद इसकी अवधि बढ़ा दी जाती है, मानो प्रशासन कह रहा हो—“अभी मत जाओ, थोड़ा और इंतजार करो, तुम्हारी धैर्य-शक्ति का परीक्षण अभी पूरा नहीं हुआ है।”

बघेली में कहें तो अतिथि शिक्षक अब पूछ रहा है—“भइया, ई स्कोरकार्ड हय कि रामचरितमानस के अखंड पाठ? खतमै न होवत!”

सबसे रोचक बात यह है कि अधिकांश अतिथि शिक्षक तो पहली ही बार में अपना सत्यापन कार्य पूरा कर चुके हैं। वे आज भी उसी श्रद्धा से भर्ती प्रक्रिया की राह देख रहे हैं, जैसे गाँव का किसान बादलों को देखकर आसमान निहारता है। फर्क बस इतना है कि किसान को कभी न कभी बरसात मिल जाती है, पर अतिथि शिक्षक को नई तारीख मिल जाती है।

एक काल्पनिक दृश्य की कल्पना कीजिए।

एक अतिथि शिक्षक सरकारी कार्यालय पहुँचता है और विनम्रता से पूछता है— “महोदय, अब भर्ती कब होगी?”

अधिकारी मुस्कुराते हुए कहते हैं— “पहले स्कोरकार्ड की तिथि बढ़ेगी।”

“फिर?”

“फिर समीक्षा होगी।”

“फिर?”

“फिर विचार होगा।”

“फिर?”

“फिर समिति बैठेगी।”

“और उसके बाद?”

“उसके बाद अगली तिथि घोषित होगी।”

शिक्षक बेचारा घर लौट आता है। रास्ते में उसे विद्यालय के बच्चे मिलते हैं। वे पूछते हैं— “सर, आप कब से पढ़ाने आएँगे?”

शिक्षक कहता है— “बेटा, मैं तो तैयार हूँ। बस सरकार अभी मेरी प्रतीक्षा का पाठ पढ़ा रही है।”

विडंबना यह है कि विद्यालय खुल चुके हैं, कक्षाएँ शुरू हो चुकी हैं, बच्चे शिक्षकों की प्रतीक्षा कर रहे हैं, लेकिन व्यवस्था अभी भी कागज़ों के साथ लुका-छिपी खेल रही है। शिक्षा का रथ खड़ा है और सारथी को बार-बार पहचान पत्र दिखाने के लिए कहा जा रहा है।

सरकार का तर्क भी अपने स्थान पर होगा। व्यवस्थाएँ बड़ी होती हैं, प्रक्रियाएँ जटिल होती हैं। परंतु कभी-कभी अत्यधिक प्रक्रिया स्वयं समस्या बन जाती है। जब खिलाड़ी मैदान में उतरने को तैयार हो और आयोजक अभी तक प्रवेश-पत्र ही जाँचता रहे, तो मैच शुरू होने में देर होना स्वाभाविक है।

अतिथि शिक्षक कोई विशेष अनुग्रह नहीं मांग रहा। वह केवल इतना कह रहा है कि यदि स्कोरकार्ड और सत्यापन का कार्य अधिकांशतः पूर्ण हो चुका है, तो अब भर्ती प्रक्रिया प्रारंभ की जाए। आखिर शिक्षा का संबंध केवल नियुक्ति आदेश से नहीं, विद्यार्थियों के भविष्य से भी है।

लोकतंत्र की खूबसूरती निर्णय लेने में है, केवल निर्णय टालने में नहीं। तारीखें आवश्यक हैं, पर वे मंज़िल तक पहुँचाने का माध्यम हों, मंज़िल का विकल्प नहीं।

इसलिए अतिथि शिक्षक की विनम्र पुकार शायद यही है—

“स्कोरकार्ड का अध्याय पूरा हो चुका है, अब भर्ती की पुस्तक खोलिए।
तारीखों के पौधे बहुत सींच लिए, अब नियुक्ति का फल भी आने दीजिए।”

क्योंकि विद्यार्थियों का भविष्य किसी अगली अधिसूचना का इंतजार नहीं करता, और शिक्षा का समय एक बार निकल जाए तो वह भी स्कोरकार्ड की तरह बढ़ाया नहीं जा सकता।

आचार्य प्रताप 

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Achary Pratap

समालोचक , संपादक तथा पत्रकार प्रबंध निदेशक अक्षरवाणी साप्ताहिक संस्कृत समाचार पत्र

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